नई दिल्ली में कल से ही रसोई गैस की कीमतों और राहत को लेकर चर्चाओं का दौर तेज चल रहा है। केंद्र सरकार ने देश की आम जनता को मंहगाई के मोर्चे पर एक बड़ी राहत देने का बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने एलपीजी सिलेंडर पर दो सौ रुपये की सब्सिडी को फिर से बहाल कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश का आम नागरिक रसोई के बढ़ते खर्चों और घरेलू बजट को लेकर पहले से ही काफी परेशान था।
इस नई घोषणा के बाद अब हर रसोई गैस सिलेंडर पर उपभोक्ताओं के खाते में सीधे दो सौ रुपये की छूट पहुंचाई जाएगी। इस पूरी योजना से देश के करोड़ों परिवारों को सीधा फायदा मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन इस राहत के पीछे सरकार के खजाने पर पड़ने वाले असर को लेकर भी बड़े आंकड़े सामने आए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार के इस एक फैसले से देश के टैक्स देने वाले नागरिकों और सरकारी खजाने पर सालाना करीब दस हजार करोड़ रुपये का भारी-भरकम बोझ पड़ेगा।
रसोई गैस की कीमतों पर आम जनता की प्रतिक्रिया
द फ्रीलान्स की टीम ने जब राजधानी के स्थानीय बाजारों और रिहायशी इलाकों में जाकर आम गृहणियों से बात की तो मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई। कई लोगों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में दो सौ रुपये की यह राहत थोड़ी कम जरूर है, लेकिन फिर भी यह जख्म पर मरहम जैसी है। पिछले कुछ महीनों में गैस सिलेंडर के दाम इतने बढ़ गए थे कि हर महीने का बजट पूरी तरह से बिगड़ गया था। अब इस सब्सिडी के दोबारा शुरू होने से थोड़ी बहुत राहत जरूर महसूस हो रही है।
दूसरी तरफ, अर्थशास्त्रियों और जानकारों का मानना है कि इस तरह की सब्सिडी से भले ही आम आदमी को तात्कालिक राहत मिलती हो, लेकिन इससे देश की अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव भी पड़ता है। सरकार को यह भी सोचना होगा कि इस दस हजार करोड़ रुपये के सालाना खर्च की भरपाई कैसे की जाएगी। क्या आने वाले दिनों में कर व्यवस्था में कोई बदलाव होगा या फिर सरकार किसी अन्य मोर्चे पर खर्च कम करेगी, यह देखने वाली बात होगी।
सरकारी खजाने पर दस हजार करोड़ का असर
इस पूरी वित्तीय स्थिति को अगर गहराई से समझें तो पता चलता है कि सरकार के पास ऐसे लोकलुभावन फैसले लेने के अलावा कोई खास विकल्प नहीं बचा था। चुनावों का मौसम नजदीक आते ही जनता की नाराजगी को दूर करना हर सरकार की प्राथमिकता बन जाता है। एलपीजी सिलेंडर की कीमतें सीधे तौर पर हर घर के वोटर को प्रभावित करती हैं, इसलिए इस मोर्चे पर सरकार कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती थी।
हालांकि जमीनी स्तर पर अभी भी कई लोगों को यह शिकायत है कि सब्सिडी का पैसा समय पर उनके बैंक खातों में नहीं पहुंचता है। कई उपभोक्ताओं का कहना है कि डीबीटी यानी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर प्रक्रिया में तकनीकी दिक्कतों के कारण उन्हें महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि दो सौ रुपये की यह सब्सिडी बिना किसी रुकावट के सीधे पात्र लोगों के खातों में पहुंचे।
सब्सिडी बहाल होने के बाद आगे की राह
अब जबकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस सब्सिडी को बहाल कर दिया है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि इसका राजनीतिक और आर्थिक फायदा कितना लंबा टिकता है। गैस एजेंसियों के बाहर और स्थानीय गैस वितरकों के दफ्तरों में आज सुबह से ही लोग यह पूछताछ करते नजर आए कि उनके खाते में पैसे कब आएंगे। हमारी ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आम जनता को इस घोषणा पर पूरा भरोसा तो है, लेकिन वे इसके जमीनी क्रियान्वयन को लेकर अब भी सतर्क हैं।
द फ्रीलान्स की इस विशेष रिपोर्ट का लब्बोलुआब यही है कि मंहगाई के इस दौर में दो सौ रुपये की राहत एक अस्थायी मरहम की तरह है। जब तक देश में महंगाई की मूल वजहों पर लगाम नहीं लगाई जाती, तब तक ऐसी सब्सिडी केवल एक आंशिक इलाज ही साबित होगी। आने वाले हफ्तों में यह देखना अहम होगा कि क्या इस सब्सिडी का दायरा और बढ़ाया जाता है या फिर यह सिर्फ यहीं तक सीमित रहती है।






