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महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव पर सियासी घमासान: महाविकास अघाड़ी में टिकट बंटवारे को लेकर भारी रार, महायुति ने साधा फॉर्मूला

महाराष्ट्र विधान परिषद चुनावों की सुगबुगाहट तेज होने के साथ ही राजनीतिक दलों के भीतर खींचतान शुरू हो चुकी है। विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी में सीटों के तालमेल को लेकर गतिरोध बना हुआ है, जबकि सत्ताधारी महायुति ने सीटों का फॉर्मूला तय कर लिया है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•4 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•43
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महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव पर सियासी घमासान: महाविकास अघाड़ी में टिकट बंटवारे को लेकर भारी रार, महायुति ने साधा फॉर्मूला
📷 महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव पर सियासी घमासान: महाविकास अघाड़ी में टिकट बंटवारे को लेकर भारी रार, महायुति ने साधा फॉर्मूला — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव को लेकर महाविकास अघाड़ी में सीटों के बंटवारे पर फंसा पेंच।
  • विपक्षी गठबंधन के घटक दलों के बीच आपसी खींचतान को दूर करने के लिए आज फिर बुलाई गई अहम बैठक।
  • सत्ताधारी गठबंधन महायुति ने 3-1-1 का फॉर्मूला तय कर चुनावी रणनीति को दिया अंतिम रूप।
  • विधान परिषद की खाली हो रही सीटों पर कब्जा जमाने के लिए सभी दलों ने अपनी सियासी बिछ बिछानी शुरू की।

महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव और राजनीतिक सरगर्मी

महाराष्ट्र की राजनीतिक जमीन पर एक बार फिर उठापटक का दौर शुरू हो गया है। विधान परिषद (MLC) के आगामी चुनावों की तारीखों के नजदीक आने के साथ ही राजनीतिक दलों के भीतर हलचल तेज हो गई है। एक तरफ जहां सत्ताधारी महायुति गठबंधन ने आपसी समन्वय बनाते हुए अपने उम्मीदवारों की रूपरेखा तय कर ली है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर घमासान मचा हुआ है। दोनों ही गठबंधनों के लिए यह चुनाव अपनी राजनीतिक जमीन को और मजबूत करने का एक बड़ा जरिया माना जा रहा है, यही वजह है कि टिकटों के चयन और सीटों की संख्या को लेकर खींचतान चरम पर पहुंच चुकी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधान परिषद के ये चुनाव आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों की ताकत का आकलन करने का एक पैमाना साबित होंगे। यही कारण है कि महाविकास अघाड़ी और महायुति दोनों ही खेमे किसी भी तरह की कमजोरी दिखाने के मूड में नहीं हैं। सत्ताधारी गठबंधन ने जहां समय रहते आपसी मतभेदों को दरकिनार करते हुए सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर मुहर लगा दी है, वहीं विपक्षी खेमे में अभी भी अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ रही है। कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) के बीच तालमेल बिठाना नेताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

इस बीच, महाविकास अघाड़ी के भीतर चल रहे गतिरोध को खत्म करने के लिए आज एक बार फिर से उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में सभी घटक दलों के शीर्ष नेता शामिल होकर सीटों के बंटवारे के फार्मूले को अंतिम रूप देने का प्रयास करेंगे। पिछले कुछ दिनों से चल रही बैठकों का दौर अभी तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सका है, जिससे कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपने सभी सहयोगियों को संतुष्ट करते हुए एक मजबूत उम्मीदवार सूची तैयार करें, ताकि चुनाव में किसी तरह के भीतरघात का सामना न करना पड़े।

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महायुति ने तय किया 3-1-1 का फॉर्मूला

विपक्षी खेमे में जहां रार मची हुई है, वहीं ठीक इसके विपरीत सत्ताधारी महायुति गठबंधन ने अपनी रणनीति को बेहद करीने से अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। अंदरूनी सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, महायुति ने विधान परिषद चुनाव के लिए 3-1-1 का एक स्पष्ट और प्रभावी फॉर्मूला तय कर लिया है। इस फॉर्मूले के तहत गठबंधन के प्रमुख दलों के बीच सीटों का बंटवारा इस तरह से किया गया है कि किसी भी दल को असंतोष का मौका न मिले। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और अन्य वरिष्ठ नेताओं की सूझबूझ से सत्ताधारी गठबंधन ने टिकट वितरण के विवादों को समय रहते सुलझा लिया है।

महायुति के इस फॉर्मूले के तहत भारतीय जनता पार्टी (BJP) को सबसे ज्यादा सीटें मिलने की संभावना है, जो संख्या बल के आधार पर बिल्कुल स्वाभाविक भी है। इसके साथ ही शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) के बीच भी बाकी सीटों का तालमेल तय कर लिया गया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि महायुति ने समय पर फैसले लेने की जो खूबी दिखाई है, वह चुनाव के दौरान उन्हें रणनीतिक बढ़त दिला सकती है। गठबंधन के नेताओं का दावा है कि उनके सभी उम्मीदवार भारी बहुमत के साथ विधान परिषद में पहुंचेंगे और विपक्ष के पास उनके खिलाफ कोई ठोस रणनीति नहीं है।

सत्ताधारी गठबंधन के भीतर सीटों के इस सुचारू बंटवारे से कार्यकर्ताओं में भी एक सकारात्मक संदेश गया है। महायुति के नेता लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनका गठबंधन पूरी तरह एकजुट है और विपक्ष की आपसी फूट का उन्हें सीधा फायदा मिलेगा। हालांकि, राजनीति में अंतिम समय तक कुछ भी कहना मुश्किल होता है, लेकिन फिलहाल महायुति इस मुकाबले में एमवीए से एक कदम आगे नजर आ रही है। उनके लिए अब मुख्य फोकस अपने सभी विधायकों और समर्थकों के वोटों को एकजुट रखना है ताकि क्रॉस वोटिंग जैसी किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से बचा जा सके।

महाविकास अघाड़ी में क्यों फंसा है पेंच?

दूसरी तरफ, महाविकास अघाड़ी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। गठबंधन के भीतर हर दल अधिक से अधिक सीटों पर अपनी दावेदारी ठोक रहा है। कांग्रेस पार्टी जहां अपने सांगठनिक आधार का हवाला देकर ज्यादा सीटें मांग रही है, वहीं उद्धव ठाकरे गुट और शरद पवार गुट भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। पिछले कुछ चुनावों में एमवीए ने मिलकर भले ही अच्छा प्रदर्शन किया हो, लेकिन जब बात विधान परिषद या राज्यसभा जैसी सीटों के बंटवारे की आती है, तो आपसी महत्वाकांक्षाएं आड़े आ जाती हैं। यही वजह है कि आज बुलाई गई आपात बैठक पर पूरे राज्य की राजनीतिक निगाहें टिकी हुई हैं।

बैठक में शामिल होने वाले नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे किस प्रकार अपने बागी तेवर दिखाने वाले नेताओं को मनाएं। कई स्थानीय नेता और पदाधिकारी भी अपने-अपने क्षेत्र से टिकट पाने के लिए दिल्ली और मुंबई के चक्कर काट रहे हैं। यदि समय रहते इस अंतर्कलह को नहीं सुलझाया गया, तो इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है। एमवीए के वरिष्ठ नेताओं का यह भी मानना है कि यदि वे एकजुट होकर मैदान में नहीं उतरे, तो सत्ता पक्ष इसका पूरा फायदा उठा ले जाएगा, जिससे आगामी बड़े चुनावों से पहले कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर सकता है।

"राजनीति में सीटों का तालमेल कोई आसान काम नहीं होता, खासकर तब जब गठबंधन में कई मजबूत दल शामिल हों। हमारी प्राथमिकता महाविकास अघाड़ी को एकजुट रखना और आपसी सहमति से सबसे योग्य उम्मीदवारों को मैदान में उतारना है। आज की बैठक में सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।" — महाविकास अघाड़ी के वरिष्ठ नेता

चुनावी समीकरण और भविष्य की राजनीतिक चालें

महाराष्ट्र विधान परिषद के ये चुनाव केवल कुछ सीटों पर जीत-हार का मामला नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले दिनों की राजनीतिक दिशा तय करने वाले हैं। दोनों ही गठबंधन इन चुनावों को एक लिटमस टेस्ट के रूप में देख रहे हैं। महायुति जहां अपनी सरकार के कामकाज और बेहतर समन्वय के दम पर मैदान में उतर रही है, वहीं महाविकास अघाड़ी बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय मुद्दों को आधार बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। विधान परिषद के इस रण में जो दल बेहतर प्रबंधन और अनुशासन दिखाएगा, जीत उसी के पाले में जाएगी।

अब देखना यह होगा कि आज महाविकास अघाड़ी की बैठक में क्या कोई सर्वमान्य फॉर्मूला निकल पाता है या फिर आपसी खींचतान और लंबी खिंचती है। राज्य की राजनीति के जानकारों का मानना है कि अगर एमवीए जल्द ही अपने मतभेदों को नहीं सुलझाती है, तो इसका खामियाजा उन्हें मतदान के दिन भुगतना पड़ सकता है। फिलहाल, महाराष्ट्र का सियासी पारा पूरी तरह से चढ़ा हुआ है और हर दल की अगली चाल पर सबकी पैनी नजर बनी हुई है।

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