व्यवस्थाओं की पोल खोलती एक दर्दनाक घटना
देश के तमाम ग्रामीण इलाकों में विकास के दावों के बीच आज भी कुछ ऐसी बुनियादी समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं, जो इंसान की जिंदगी से लेकर उसकी मौत तक की गरिमा को छीन लेती हैं। उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से एक ऐसा ही झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां व्यवस्था की लाचारी ने एक मृत व्यक्ति और उसके शोक संतप्त परिजनों को अमानवीय पीड़ा से गुजरने पर मजबूर कर दिया। श्मशान भूमि पर शेड न होने और आवागमन का रास्ता बदहाल होने के कारण एक परिवार को अपने अपने प्रियजन का शव दो दिनों तक घरों के भीतर ही सुरक्षित रखना पड़ा।
यह पूरा वाकया प्रशासनिक उदासीनता और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को साफ तौर पर उजागर करता है। जब किसी परिवार के सदस्य की लंबी बीमारी के बाद मौत हो जाती है, तो वैसे ही पूरा घर गहरे सदमे में होता है। ऐसे नाजुक वक्त पर अगर अंतिम संस्कार जैसी बेहद संवेदनशील प्रक्रिया के लिए भी संघर्ष करना पड़े, तो इसे व्यवस्था की बड़ी नाकामी ही कहा जाएगा। इस घटना ने पूरे गांव के लोगों को झकझोर कर रख दिया है और स्थानीय नागरिकों में प्रशासन के खिलाफ भारी गुस्सा व्याप्त है।
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कैंसर से लंबी जंग के बाद तोड़ा दम
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला जिले के एक सुदूर ग्रामीण आंचल का है, जहां महेबा गांव के रहने वाले मनोज कुमार पिछले काफी समय से गंभीर बीमारी यानी कैंसर से जूझ रहे थे। परिवार ने अपनी तरफ से उनके इलाज में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। आखिरकार, बीमारी से लंबी और दर्दनाक जंग हारने के बाद दो दिन पहले उनका अस्पताल में निधन हो गया। मौत की खबर मिलते ही घर में कोहराम मच गया और रिश्तेदारों तथा आसपास के लोगों का आना-जाना शुरू हो गया।
लेकिन परिवार का दुख उस समय और अधिक बढ़ गया जब उन्हें पता चला कि इस भारी बारिश के मौसम में मृतक का अंतिम संस्कार करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। गांव में अंतिम संस्कार के लिए कोई ढंग का मोक्षधाम या टीन शेड नहीं है। लगातार हो रही झमाझम बारिश के बीच खुले आसमान के नीचे चिता जलाना तकनीकी रूप से असंभव था, क्योंकि पानी की बौछारें तुरंत आग को बुझा देतीं। इस मजबूरी के चलते परिवार को लाचार होकर पार्थिव शरीर को दो दिनों तक घर के अंदर ही संभाल कर रखना पड़ा।
दलदल और कीचड़ से अटे रास्ते ने बढ़ाई मुश्किलें
मौसम की मार के साथ-साथ इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक लापरवाही का एक और बदसूरत पहलू सामने आया। ग्रामीणों ने बताया कि जिस रास्ते से होकर श्मशान घाट तक जाया जाता है, उसकी स्थिति बेहद दयनीय है। लगातार हो रही बारिश के कारण यह रास्ता पूरी तरह से कीचड़ और गहरे दलदल में तब्दील हो चुका था। हालात इतने बदतर थे कि वहां से चार लोगों का एक साथ कंधे पर अर्थी लेकर गुजरना भी खतरे से खाली नहीं था। पैर रखने के लिए भी सूखी जमीन नहीं बची थी, जिससे अंतिम यात्रा निकालना बेहद जोखिम भरा हो गया था।
गांव के वरिष्ठ नागरिकों और जिम्मेदार लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार स्थानीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने इस रास्ते और श्मशान घाट के निर्माण की गुहार लगाई थी। हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिले, लेकिन जमीन पर कभी कोई काम नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि आज जब परिवार पर विपदा आई, तो उन्हें बुनियादी पगडंडी तक मयस्सर नहीं हुई। प्रशासनिक उपेक्षा का यह आलम ग्रामीणों के लिए किसी अभिशाप से कम साबित नहीं हो रहा है।
तिरपाल के नीचे मजबूरी में दी गई मुखाग्नि
जब दो दिनों का लंबा इंतजार करने के बाद भी बारिश रुकने का नाम नहीं ली, तो परिवार और गांव के युवाओं ने मिलकर खुद ही मोर्चा संभालने का फैसला किया। उन्होंने किसी तरह हिम्मत जुटाई और श्मशान भूमि पर पहुंचकर अस्थायी इंतजाम करने की सोची। युवाओं ने कीचड़ और पानी के बीच जमीन में बांस और बल्लियां गाड़ीं और उनके ऊपर किसी तरह एक बड़ी तिरपाल तानी ताकि बारिश का पानी सीधे चिता पर न गिर सके।
"हमारे गांव में आज तक न तो मोक्षधाम के लिए कोई शेड बना है और न ही श्मशान तक जाने वाला रास्ता चलने लायक है। प्रशासन की अनदेखी की वजह से हमें अपने परिजन का अंतिम संस्कार तिरपाल के नीचे बेहद अपमानजनक और लाचार परिस्थितियों में करना पड़ा। अगर जल्द सुनवाई नहीं हुई, तो हम बड़ा आंदोलन करेंगे।" — स्थानीय ग्रामीण, महोबा
इस प्रकार, बेहद कठिन और अपमानजनक परिस्थितियों के बीच उसी अस्थायी तिरपाल की छत के नीचे चिता सजाई गई और नम आंखों के बीच मनोज के पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी गई। एक इंसान के इस दुनिया से जाने के बाद उसकी अंतिम विदाई भी गरिमापूर्ण तरीके से न हो पाना, हमारी सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ जाता है।
ग्रामीणों की दो टूक चेतावनी और आगे की राह
इस अमानवीय घटना के बाद से पूरे इलाके में रोष का माहौल है। गांव के लोगों ने एकजुट होकर जिला प्रशासन को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। उनका साफ कहना है कि यदि अब भी शासन-प्रशासन की आंखें नहीं खुलीं, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। ग्रामीणों की मांग है कि तत्काल प्रभाव से गांव में एक पक्के मोक्षधाम का निर्माण कराया जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को इस तरह की जिल्लत का सामना न करना पड़े।
इसके साथ ही, श्मशान घाट तक पहुंचने वाले बदहाल रास्ते को मिट्टी डलवाकर और सीसी रोड बनाकर दुरुस्त किए जाने की मांग भी जोर पकड़ रही है। लोगों का कहना है कि विकास के तमाम बड़े-बड़े दावों के बीच यदि गांवों की ऐसी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होती हैं, तो ऐसे विकास का कोई मतलब नहीं रह जाता है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस चेतावनी के बाद कितनी जल्दी नींद से जागता है और पीड़ित ग्रामीणों की सुध लेता है।






