नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — केंद्र सरकार ने देश की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा फेरबदल करते हुए तीन प्रमुख पेंशन योजनाओं के नाम और उनके संचालन से जुड़े नियमों में संशोधन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में यह अहम निर्णय लिया गया है। इस फैसले के बाद अब इन कल्याणकारी योजनाओं के नाम से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम हटा दिया गया है। सरकार के इस कदम को प्रशासनिक सुधार और योजनाओं के नामकरण की नीति में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। द फ्रीलान्स की टीम ने इस मामले की गहराई से पड़ताल की और जाना कि इन बदलावों का आम जनता और देश की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर क्या असर पड़ेगा।
मंत्रालय से मिले आधिकारिक ब्योरे के अनुसार, जिन तीन योजनाओं के नाम बदले गए हैं, वे लंबे समय से पूर्व प्रधानमंत्री के नाम पर चलाई जा रही थीं। इन योजनाओं के तहत देश के बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगजनों को हर महीने आर्थिक मदद दी जाती है। सरकार का कहना है कि इन योजनाओं का लाभ देश के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक बिना किसी रुकावट के पहुंचे, इसके लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को भी बहुत सरल बनाया जा रहा है। नाम बदलने के साथ ही योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता लाने के लिए डिजिटल पोर्टल्स का दायरा भी बढ़ाया जा रहा है ताकि बिचौलियों की भूमिका को पूरी तरह से खत्म किया जा सके।
दिव्यांग पेंशन के नियमों में हुआ बड़ा बदलाव
इस पूरे फैसले का सबसे बड़ा और राहत भरा पहलू दिव्यांग पेंशन से जुड़ा हुआ है। सरकार ने दिव्यांग पेंशन के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए अब जन्म से ही दिव्यांगता का शिकार बच्चों को इस योजना के दायरे में शामिल कर लिया है। नए नियमों के मुताबिक अब विकलांगता प्रमाण पत्र और उम्र की जटिल शर्तों को आसान बनाया गया है ताकि बच्चों को मिलने वाली आर्थिक मदद में कोई अड़चन न आए। देश के दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले दिव्यांग परिवारों के लिए यह नियम किसी बड़े वरदान से कम नहीं है क्योंकि पहले कागजी कार्रवाई पूरी करने में ही महीनों निकल जाते थे और पात्र लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहते थे।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि इस बदलाव से देश के लाखों ऐसे परिवारों को सीधा फायदा मिलेगा जो आर्थिक तंगी के कारण अपने दिव्यांग बच्चों का ठीक से पालन-पोषण नहीं कर पा रहे थे। सरकार की इस नई व्यवस्था के तहत अब जन्म के बाद से ही बच्चों का डेटा स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए सीधे पेंशन पोर्टल से जोड़ा जाएगा। इससे पात्र लाभार्थियों को उम्र बढ़ने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा और समय पर हर महीने उनके बैंक खातों में पेंशन की राशि पहुंच जाएगी। ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस कदम की सराहना की है और इसे बच्चों के अधिकार के हित में एक जरूरी कदम बताया है।
योजनाओं के नए नाम और प्रशासनिक रूप-रेखा
कैबिनेट के इस फैसले के बाद सवाल यह उठ रहा है कि अब इन योजनाओं को किस नए नाम से पुकारा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक सरकार ने इन सभी केंद्रीय योजनाओं का नाम अब सीधे तौर पर उनकी कार्यप्रणाली और लक्षित वर्ग के आधार पर रखने का फैसला किया है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना और राष्ट्रीय दिव्यांग पेंशन योजना जैसे सामान्य और स्पष्ट नाम अब इस्तेमाल किए जाएंगे। राजनीतिक गलियारों में इस बात पर भी चर्चा तेज हो गई है कि सरकार लंबे समय से पुरानी सरकारों द्वारा शुरू किए गए नामों को बदलकर एक नई पहचान देने की नीति पर काम कर रही है।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब राज्यों के स्थानीय स्तर पर जाकर पड़ताल की तो पता चला कि कई जिलों में जिला समाज कल्याण अधिकारियों को नए दिशा-निर्देश मिलने शुरू हो गए हैं। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सभी दस्तावेजों और बोर्ड्स से पुराने नाम हटाकर नए स्वीकृत नाम जल्द से जल्द दर्ज करें। हालांकि नाम बदलने से योजनाओं के फंड या मिलने वाली राशि पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन प्रशासनिक दस्तावेजों में यह एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। आम जनता के बीच भी इस बात को लेकर सुगबुगाहट है कि योजनाओं के नाम बदलने से धरातल पर मिलने वाली सेवाओं में कितनी तेजी आएगी।
आम जनता की प्रतिक्रिया और आगे की राह
इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां सरकार इसे प्रशासनिक सरलीकरण और पारदर्शिता का नाम दे रही है, वहीं विपक्षी दलों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि योजनाओं के नाम बदलने से देश के इतिहास से जुड़ी पहचान को मिटाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि आम नागरिकों और पेंशनभोगियों का मानना है कि उन्हें नाम से ज्यादा इस बात से मतलब है कि समय पर पेंशन के पैसे उनके बैंक खातों में पहुंचें और नियमों की जटिलता कम हो।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन का निष्कर्ष यही है कि नाम बदलने की राजनीति के बीच दिव्यांग बच्चों के लिए जन्म से पेंशन मिलने का नियम एक सकारात्मक और सराहनीय कदम है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जिला प्रशासन इस नई व्यवस्था को कितनी तेजी से जमीन पर लागू कर पाता है और क्या वाकई में भ्रष्टाचार और कागजी पेचीदगियों से आम जनता को पूरी तरह मुक्ति मिल पाती है या नहीं। हमारी टीम इस पूरी प्रक्रिया पर लगातार नजर बनाए रखेगी और हर नया अपडेट सबसे पहले आप तक पहुंचाएगी।







