मोहन सरकार का वित्तीय प्रबंधन और सितंबर में तीसरी बार कर्ज लेने की तैयारी
मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार एक बार फिर वित्तीय बाजार का रुख करने जा रही है। राज्य में आने वाले दिनों में पेश होने वाले अनुपूरक बजट (सप्लीमेंट्री बजट) से ठीक पहले सरकार ने 1500 करोड़ रुपये का भारी-भरकम कर्ज लेने का निर्णय लिया है। यह इस महीने यानी सितंबर 2026 में तीसरा मौका है जब सरकार ने अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के माध्यम से उधारी का रास्ता चुना है। सरकारी महकमों और वित्त विभाग के गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि बुनियादी ढांचे के विकास और रुकी हुई परियोजनाओं को गति देने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह नया कर्ज ओपन मार्केट से भारतीय रिजर्व बैंक के ई-कुबेर पोर्टल के जरिए नीलामी प्रक्रिया के तहत जुटाया जा रहा है। राज्य सरकार इस पूरी राशि को दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित करके ले रही है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, विकास कार्यों और आधारभूत संरचनाओं (इन्फ्रास्ट्रक्चर) को मजबूत करने के लिए यह रणनीति अपनाई जा रही है ताकि राज्य के विभिन्न जिलों में चल रहे निर्माण कार्यों के लिए फंड की कमी आड़े न आए।
हालांकि, एक ही महीने के भीतर बार-बार कर्ज लेने की इस प्रवृत्ति ने आर्थिक विश्लेषकों और विपक्षी दलों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मध्य प्रदेश सरकार पर लगातार बढ़ते जा रहे वित्तीय बोझ को लेकर अब राजनीतिक सरगर्मी भी तेज होने लगी है। आम जनता से जुड़े विकास कार्यों और प्रशासनिक खर्चों के बीच संतुलन बनाने की इस कवायद के दूरगामी परिणामों पर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं।
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दो किस्तों में लिया जा रहा है 1500 करोड़ का यह लोन
भारतीय रिजर्व बैंक के जरिए जुटाई जा रही 1500 करोड़ रुपये की इस राशि को बहुत ही सुनियोजित तरीके से दो अलग-अलग अवधियों के लिए बांटा गया है। वित्त विभाग की कार्ययोजना के तहत, पहला हिस्सा 800 करोड़ रुपये का है जिसे आगामी 18 वर्षों की लंबी अवधि में चुकाया जाएगा। वहीं, दूसरा हिस्सा 700 करोड़ रुपये का है जिसे चुकाने के लिए सरकार को पूरे 30 साल का समय मिलेगा। लंबी अवधि के इन कर्जों के जरिए सरकार अपनी वर्तमान वित्तीय देनदारियों को साधने की कोशिश कर रही है।
गौरतलब है कि सितंबर के महीने में यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी सरकार ने इसी महीने की शुरुआत में बड़े पैमाने पर उधारी ली थी। महीने के पहले दिन यानी 1 सितंबर 2026 को राज्य सरकार ने आरबीआई के मुंबई कार्यालय के जरिए सरकारी सिक्योरिटीज की नीलामी से 3600 करोड़ रुपये का कर्ज उठाया था। उस दौरान भी 1600 करोड़ का कर्ज 18 साल के लिए और 2000 करोड़ का कर्ज 30 साल के लिए लिया गया था। इसके ठीक बाद 16 सितंबर को फिर से 2500 करोड़ रुपये का कर्ज तीन अलग-अलग किस्तों (8, 12 और 22 साल) में लिया गया था।
अब इस ताजा 1500 करोड़ रुपये की उधारी के जुड़ जाने से सितंबर महीने के भीतर ही मध्य प्रदेश सरकार द्वारा लिया गया कुल कर्ज काफी बड़ा हो जाता है। सरकार का तर्क है कि राज्य में सड़कों के निर्माण, सिंचाई परियोजनाओं, बिजली आपूर्ति और अन्य महत्वपूर्ण सिविल प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने के लिए पूंजी की निरंतर आवश्यकता बनी रहती है, जिसे पूरा करने के लिए खुले बाजार से यह ऋण लेना अनिवार्य हो जाता है।
साढ़े पांच लाख करोड़ के पार पहुंचा मध्य प्रदेश पर कुल कर्ज का आंकड़ा
लगातार और ताबड़तोड़ लिए जा रहे इन कर्जों का सीधा असर राज्य की वित्तीय सेहत और कुल बकाए पर पड़ रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस 1500 करोड़ रुपये के नए लोन के जुड़ने के बाद मध्य प्रदेश पर कुल कर्ज का बोझ बढ़कर अब 5 लाख 42 हजार 614 करोड़ रुपये (5,42,614 करोड़) के भारी-भरकम स्तर पर पहुंच गया है। राज्य के इतिहास में यह वित्तीय आंकड़ा अब तक के सबसे ऊंचे पायदानों में गिना जा रहा है।
अगर पिछले वित्तीय वर्ष के अंत से तुलना की जाए तो तस्वीर और अधिक स्पष्ट हो जाती है। गत 31 मार्च 2026 तक मध्य प्रदेश पर कुल बकाया कर्ज 4 लाख 88 हजार 714 करोड़ रुपये था। इसका मतलब साफ है कि पिछले केवल छह महीनों के भीतर ही मोहन सरकार ने विभिन्न माध्यमों से 54 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नया कर्ज ले लिया है। महज आधे साल के अंदर कर्ज के आंकड़े में 54 हजार करोड़ से ज्यादा की यह बढ़ोतरी राज्य के राजकोषीय प्रबंधन पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इतनी बड़ी मात्रा में उधारी लेने से भविष्य में राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल मूलधन और ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाएगा। इससे सामाजिक कल्याण और अन्य महत्वपूर्ण जनहित योजनाओं के लिए मिलने वाले बजट पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि सरकार का दावा है कि राज्य की आर्थिकी को गति देने के लिए यह निवेश आवश्यक है।
विपक्ष का तीखा हमला: कांग्रेस बोली- फिजूलखर्जी के लिए लिया जा रहा है लोन
राज्य सरकार द्वारा बार-बार लिए जा रहे इन कर्जों को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने मोहन यादव सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार के पास किसी भी प्रकार का ठोस वित्तीय प्रबंधन नहीं बचा है और वह केवल अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए अंधाधुंध उधारी ले रही है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि कर्ज के इस पैसे का इस्तेमाल आम जनता के कल्याण के बजाय सरकारी आयोजनों और सुख-सुविधाओं को बढ़ाने में किया जा रहा है।
इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता अविनीश बुंदेला ने सरकार को आड़े हाथों लिया और कड़े शब्दों में तीखा प्रहार किया है।
"सरकार के पास वित्तीय प्रबंधन नाम की कोई चीज नहीं बची है। सरकार लगातार कर्ज लेकर केवल फिजूलखर्जी कर रही है। सुख-सुविधाओं और सरकारी आयोजनों में कर्ज का पैसा पानी की तरह उड़ाया जा रहा है। सरकार को जनता के सामने आकर यह श्वेतपत्र जारी करना चाहिए कि पिछले सालों में लिया गया हजारों करोड़ का कर्ज आखिरकार किन-किन मदों और योजनाओं पर खर्च किया गया है।" — अविनीश बुंदेला, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस
कांग्रेस के इन गंभीर आरोपों के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है। विपक्षी दल लगातार यह मांग कर रहा है कि सरकार को विधानसभा के आगामी सत्र में अपने बढ़ते राजकोषीय घाटे और ऋण के ब्योरे पर विस्तृत स्पष्टीकरण देना चाहिए। वहीं, दूसरी ओर सत्तारूढ़ दल के नेताओं का यह तर्क है कि विकास कार्यों को गति देने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना एक सामान्य प्रक्रिया है और विपक्षी दल केवल राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं।
आगामी शीतकालीन सत्र और सप्लीमेंट्री बजट पर टिकी सबकी निगाहें
मध्य प्रदेश की राजनीति और आर्थिक हलकों में अब सबकी निगाहें आगामी विधानसभा सत्र और आने वाले अनुपूरक बजट पर टिकी हुई हैं। चूंकि शीतकालीन सत्र के दौरान सरकार दूसरा सप्लीमेंट्री बजट सदन में पेश करने की तैयारी कर रही है, ऐसे में सदन के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच वित्तीय प्रबंधन को लेकर तीखी नोकझोक होने की पूरी संभावना है। विधायक दल के नेता इस बात का हिसाब मांग सकते हैं कि पिछले छह महीनों में लिए गए 54 हजार करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज का धरातल पर कितना असर दिखाई दे रहा है।
दूसरी तरफ, वित्त विभाग के अधिकारी इस बात को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं कि राज्य की क्रेडिट रेटिंग और राजस्व संग्रहण की स्थिति नियंत्रण में है। अधिकारियों का मानना है कि बुनियादी ढांचे के निर्माण से राज्य में भविष्य में आर्थिक गतिविधियों को बड़ा बढ़ावा मिलेगा, जिससे राजकोषीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी। बहरहाल, जनता की जेब और राज्य की तिजोरी के बीच संतुलन बिठाने की यह कवायद आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश की सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा बनने जा रही है।




