मध्य प्रदेश के टाइगर रिजर्व कॉरिडोर पर मंडराया खनन का साया
देश के सबसे महत्वपूर्ण बाघ संरक्षण क्षेत्रों में शुमार बांधवगढ़ और छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व को जोड़ने वाले प्राकृतिक गलियारे के समीप चल रही गतिविधियों ने एक बार फिर पर्यावरणविदों और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। इस संवेदनशील क्षेत्र के आसपास कोयला खनन परियोजनाओं को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तेजी से मिल रही मंजूरियों ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। वन्यजीव प्रेमियों और विपक्षी नेताओं का मानना है कि इस तरह के फैसलों से न केवल पर्यावरण का संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि बाघों के सुरक्षित आवागमन पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
प्राप्त जानकारियों के अनुसार, हाल ही के महीनों में इस इलाके के इर्द-गिर्द कई कोयला खदानों से जुड़े प्रस्तावों पर मुहर लगाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है। बांधवगढ़-अचानकमार कॉरिडोर वह पवित्र और प्राकृतिक क्षेत्र है जहां से बाघ और अन्य वन्यजीव एक जंगल से दूसरे जंगल तक सुरक्षित विचरण करते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र के इतने करीब भारी उद्योग और खनन की अनुमति देना生態 तंत्र के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।
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राजनीतिक गलियारों में गरमाया मुद्दा, सरकार से पूछे गए तीखे सवाल
इस पूरे मामले ने अब राजनीतिक रूप ले लिया है और विपक्षी नेताओं ने राज्य सरकार की नीतियों को लेकर मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस विषय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए शासन से सीधे तौर पर जवाब तलब किया है। उनका कहना है कि जब यह पूरा भूभाग वन्यजीवों के संरक्षण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है, तो यहां खदानों को हरी झंडी दिखाने का आधार क्या है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस केवल एक कोयला खदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विकास बनाम पर्यावरण की उस पुरानी बहस को फिर से जिंदा करती है जहां हर बार प्रकृति को ही कीमत चुकानी पड़ती है। विपक्षी दलों का आरोप है कि औद्योगिकीकरण के नाम पर वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
"जब यह पूरा क्षेत्र बाघों और अन्य दुर्लभ वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, तो इसके बिल्कुल पास खनन गतिविधियों की अनुमति देने का आखिर क्या औचित्य है? सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि जनता और पर्यावरण की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता है या फिर कुछ खास औद्योगिक घराने।" — जीतू पटवारी, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष
विभिन्न परियोजनाओं की दूरी ने बढ़ाई पर्यावरणविदों की चिंता
इस विवाद के केंद्र में केवल एक नहीं बल्कि कई ऐसी परियोजनाएं हैं जो टाइगर कॉरिडोर के बेहद करीब स्थित हैं। रिपोर्टों पर गौर करें तो मरवाटोला-सात खदान इस कॉरिडोर से महज कुछ ही मीटर की दूरी पर है, जबकि पाथोरा ईस्ट, अर्जुनी वेस्ट और वेस्ट ऑफ शहडोल (साउथ) अंडरग्राउंड कोल माइन जैसी परियोजनाएं भी क्रमशः डेढ़ से छह किलोमीटर के दायरे में आती हैं। इतनी कम दूरी पर भारी मशीनरी के संचालन, धमाकों और परिवहन के कारण वन्यजीवों की शांति और सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ना लाजिमी है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ जैसे संवेदनशील जीव इंसानी गतिविधियों और शोर-शराबे से दूर रहना पसंद करते हैं। यदि उनके गलियारे के आसपास इस प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होंगी, तो वे अपने प्राकृतिक आवास को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में पलायन करने को मजबूर हो जाएंगे, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी तेजी से बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति की सिफारिशों पर उठ रहे सवाल
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाली विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) की बैठकों में इन खनन प्रस्तावों को लेकर हुई चर्चाओं के बाद से यह मामला और अधिक गर्मा गया है। समिति द्वारा इन परियोजनाओं की पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए जाने के बाद से ही स्थानीय स्तर पर इसका विरोध शुरू हो गया था। हालांकि प्रशासनिक तंत्र का यह तर्क रहता है कि सभी मंजूरियां निर्धारित नियमों और पर्यावरण सुरक्षा मानकों के दायरे में ही दी जाती हैं, लेकिन आलोचकों का मानना है कि कागजी मानकों और धरातल की वास्तविक स्थिति में बहुत बड़ा अंतर होता है।
वन्यजीव संरक्षण कानूनों और खनन लीज आवंटन के बीच का यह संघर्ष कोई नया नहीं है, लेकिन जिस प्रकार टाइगर कॉरिडोर के इतने करीब कोयला खदानों के जाल बिछाए जा रहे हैं, उसने भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी जरूर दे दी है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर शासन और पर्यावरण प्रेमियों के बीच टकराव और अधिक गहराने के आसार नजर आ रहे हैं।
निष्कर्ष और आगे की राह
मध्य प्रदेश में बांधवगढ़ और अचानकमार टाइगर कॉरिडोर के पास खनन परियोजनाओं का यह पूरा घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना कितना कठिन होता जा रहा है। एक तरफ जहां ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कोयला खनन जरूरी बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर और वन्यजीवों को बचाना भी उतना ही अनिवार्य है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर जनता और पर्यावरणविदों के विरोध के बीच क्या रुख अपनाती है और क्या कोई ऐसा बीच का रास्ता निकाला जाता है जिससे प्रकृति और विकास दोनों का बचाव हो सके।







