सुप्रीम कोर्ट की वैधता के बाद भी थमता नहीं दिख रहा मतदाता सूची पुनरीक्षण विवाद
भारतीय चुनावी व्यवस्था के इतिहास में इन दिनों मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) अभियान को लेकर जबरदस्त सियासी और प्रशासनिक घमासान मचा हुआ है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को अपनी कानूनी वैधता प्रदान कर दी है, जिसके बाद से कानूनी मोर्चे पर तो स्थिति स्पष्ट हो चुकी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर तनातनी कम होने का नाम नहीं ले रही है। विभिन्न विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों का लगातार यह आरोप है कि इस अभियान के नाम पर बड़े पैमाने पर आम नागरिकों के मताधिकार को छीना गया है, जिससे चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग का यह तर्क रहा है कि यह पूरी कवायद मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध, त्रुटिहीन और अपडेट रखने के लिए बेहद जरूरी थी। आयोग के अनुसार, सूची से हटाए गए अधिकांश नाम मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से अन्य स्थानों पर स्थानांतरित हो चुके लोगों या फिर डुप्लीकेट प्रविष्टियों के थे। इसके बावजूद, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जिस प्रकार से आंतरिक मतभेद और प्रशासनिक असहमतियों की खबरें बाहर आई हैं, उसने इस पूरे घटनाक्रम को देश की सबसे बड़ी बहस का विषय बना दिया है।
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राजनीतिक गलियारों में 13 करोड़ नामों के गायब होने पर गरमाई सियासत
इस पूरे विवाद का सबसे केंद्र बिंदु वह आंकड़ा है जिसे लेकर विपक्ष लगातार हमलावर है। विभिन्न रिपोर्ट्स और याचिकाओं के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि एसआईआर अभियान के तहत देश के लगभग 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से बाहर कर दिए गए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में नामों का काटा जाना किसी सामान्य प्रशासनिक त्रुटि का परिणाम नहीं हो सकता, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत एक बड़े वर्ग को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर किया जा रहा है।
विपक्ष का यह भी कहना है कि लोकतंत्र की मूल आत्मा पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया में निहित है, और यदि इतनी भारी तादाद में मतदाता बिना पुख्ता और पारदर्शी सूचना के सूची से गायब हो जाते हैं, तो आम जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं से भरोसा उठना स्वाभाविक है। इस मामले को लेकर देश की शीर्ष अदालत में भी कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिन पर लगातार सुनवाई और कानूनी दलीलों का दौर जारी है। इन याचिकाओं में प्रक्रिया से जुड़े निर्णयों और आंतरिक असहमतियों की स्वतंत्र जांच कराए जाने की पुरजोर मांग की जा रही है।
पूर्व चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियां: क्या संस्था की विश्वसनीयता पर आ गई है आंच?
इस पूरे घटनाक्रम के बीच देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के बयानों ने इस विवाद को और अधिक हवा दे दी है। हाल ही में एक प्रमुख कॉन्क्लेव और साक्षात्कारों के दौरान पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत और पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और वर्तमान परिस्थितियों पर खुलकर अपनी राय रखी है। उनका मानना है कि भारतीय चुनाव आयोग ने पिछले सात दशकों से अधिक समय में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का एक बेदाग वैश्विक मानक स्थापित किया है, लेकिन मौजूदा विवादों के कारण संस्था की छवि पर असर पड़ा है।
पूर्व सीईसी ओम प्रकाश रावत ने एक साक्षात्कार में यह तक कह दिया कि आजादी के बाद यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी संख्या में पात्र नागरिकों को अपने मतदान के अधिकार से वंचित होना पड़ा है। उन्होंने चुनाव आयोग के भीतर दो अन्य आयुक्तों की आपत्तियों और असहमति नोटों को नजरअंदाज किए जाने की खबरों को बेहद गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। उनके अनुसार, संस्था के भीतर आपसी संवाद और आम सहमति बनाने की परंपरा को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे विवादों से बचा जा सके।
"चुनाव आयोग ने पिछले 75 से अधिक वर्षों में स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव कराने के मामले में एक उच्च मानक स्थापित किया है। हालांकि, मौजूदा विवाद को देखते हुए यह जरूरी है कि आयोग खुले तौर पर सवालों के जवाब दे और जनता के बीच पूरी पारदर्शिता रखे, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का अटूट भरोसा बना रहे।" — ओम प्रकाश रावत, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त
प्रशासनिक स्तर पर आंतरिक असहमतियों और फॉर्म 6 को लेकर उठे तीखे सवाल
मीडिया में आई विभिन्न अंदरूनी रिपोर्ट्स से यह भी खुलासा हुआ है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच कई स्तरों पर वैचारिक मतभेद रहे हैं। आरोप यह भी लगाए गए हैं कि प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले अन्य सदस्यों की पूर्ण सहमति के बिना ही ले लिए गए। इसके अलावा, वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर भी कानूनी जानकारों और पूर्व अधिकारियों ने आपत्ति जताई है।
पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी जैसे दिग्गजों ने भी इस प्रक्रिया पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इस तरह के विवादास्पद कदमों से जमीनी स्तर पर प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ती हैं और आम मतदाताओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। मैदानी स्तर पर काम करने वाले चुनाव अधिकारियों और फील्ड स्टाफ के अनुभवों से यह बात भी सामने आई है कि जिन क्षेत्रों में प्रशासन ने विशेष शिविर लगाकर मतदाताओं की सहायता की, वहां नाम कटने का अनुपात काफी कम रहा, जबकि जहां ऐसी व्यवस्था नहीं थी, वहां लोगों को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
निष्कर्ष और आगे की राह: लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शिता सबसे बड़ी शर्त
एसआईआर प्रक्रिया और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने को लेकर चल रहा यह विवाद इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता और निष्पक्षता कितनी अधिक मायने रखती है। एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट की मुहर से इस प्रक्रिया को कानूनी जामा पहनाया जा चुका है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दलों, पूर्व नौकरशाहों और आम नागरिकों की ओर से उठ रहे सवाल यह मांग करते हैं कि पूरी प्रक्रिया में अत्यधिक पारदर्शिता बरती जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के विवादों का एकमात्र समाधान यही है कि चुनाव आयोग खुलकर आगे आए, सभी संदेहों को दूर करे और यह सुनिश्चित करे कि देश का कोई भी पात्र नागरिक अपने सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार यानी मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए। आगामी दिनों में इस मामले पर न्यायिक और राजनीतिक मंचों पर होने वाली कार्रवाइयां यह तय करेंगी कि देश की चुनावी प्रणाली में सुधार की यह दिशा किस रूप में आगे बढ़ती है।





