इस्लामाबाद/रियाद — पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के गलियारों से एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। देश की ताकतवर सेना के प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पूरी तरह से साइडलाइन कर दिया है। पाकिस्तान की हुकूमत अब पर्दे के पीछे से पूरी तरह सेना प्रमुख के इशारों पर चल रही है। सेना प्रमुख ने देश के आंतरिक मामलों के साथ-साथ विदेश नीति और रक्षा मामलों की कमान अपने हाथों में ले ली है। इस बड़े बदलाव के बाद अब पाकिस्तान के फैसले सीधे रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर से लिए जा रहे हैं, न कि प्रधानमंत्री आवास से।
इस राजनीतिक उलटफेर का सबसे बड़ा असर अब अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर दिखाई देने लगा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि उनका देश सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपनी सेना भेजने को पूरी तरह तैयार है। ख्वाजा आसिफ ने साफ किया कि यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को बचाने के लिए पाकिस्तानी फौज के जवानों को मैदान में उतारा जाएगा। इस फैसले से साफ हो गया है कि पाकिस्तान की सरकार अब मध्य पूर्व के देशों के साथ सैन्य समझौते बढ़ाने के लिए बेताब है ताकि देश को आर्थिक मदद मिल सके।
सऊदी अरब को सैन्य मदद देने के पीछे क्या है असली खेल
पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था किसी से छिपी नहीं है। देश को इस वक्त विदेशी कर्ज और डॉलर की सख्त जरूरत है। विश्लेषकों का मानना है कि जनरल असीम मुनीर का यह कदम सऊदी अरब से अरबों डॉलर का कर्ज और तेल रियायतें हासिल करने की एक सोची-समझी रणनीति है। पाकिस्तान पहले भी सऊदी अरब को अपने सैनिक देता रहा है, लेकिन हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे तौर पर सैन्य मदद देना एक जोखिम भरा कदम हो सकता है। इसके बावजूद सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री की सहमति या असहमति की परवाह किए बिना इस डील पर तेजी से काम शुरू कर दिया है।
शहबाज शरीफ सरकार इस पूरे मामले में केवल एक मुखौटा बनकर रह गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय से अब कोई भी स्वतंत्र फैसला नहीं लिया जा रहा है। जब रक्षा मंत्री ने सऊदी अरब को सैन्य मदद देने का आधिकारिक ऐलान किया, तब भी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ पूरी तरह खामोश नजर आए। इससे साफ हो गया है कि पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार के पास अब सेना के फैसलों पर सवाल उठाने की कोई ताकत नहीं बची है। सेना प्रमुख देश की विदेश नीति को अपनी मर्जी से हांक रहे हैं और देश की संसद को भी अंधेरे में रखा जा रहा है।
बलूचिस्तान और आंतरिक अशांति से ध्यान भटकाने की कोशिश
एक तरफ जहां सेना प्रमुख मध्य पूर्व में अपनी फौज भेजने की डील कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर हालात बेहद खराब हैं। पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान के लोग लगातार अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। लापता बलूच नागरिकों की आवाज उठाने वाली और 'बलूचिस्तान की शेरनी' के नाम से पहचानी जाने वाली डॉ. महरंग बलूच को देश की अदालत और व्यवस्था द्वारा उम्रकैद जैसी सख्त सजा देने की साजिश रची जा रही है। महरंग बलूच के साथ पाकिस्तान सरकार और सेना का यह सुलूक पूरी दुनिया में मानवाधिकारों के हनन का एक बड़ा उदाहरण बन गया है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सेना देश की जनता का ध्यान बलूचिस्तान के संकट और अपनी नाकामियों से हटाने के लिए ऐसे बाहरी सैन्य अभियानों का सहारा ले रही है। जब देश की सेना बाहरी देशों में युद्ध लड़ने या सुरक्षा देने जाएगी, तो आंतरिक मोर्चे पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों को दबाना और आसान हो जाएगा। पाकिस्तान के आम नागरिक महंगाई, बेरोजगारी और बिजली के बिलों से त्रस्त हैं, लेकिन हुक्मरानों का ध्यान जनता की भलाई के बजाय अपनी कुर्सी और सेना की ताकत बढ़ाने पर केंद्रित है।
भविष्य में पाकिस्तान की राजनीति और विदेश नीति पर असर
जनरल असीम मुनीर के इस आक्रामक रुख से आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजनीति में सेना का दखल और ज्यादा बढ़ जाएगा। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार के पास अब टिके रहने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा है। सऊदी अरब को सेना भेजने के इस फैसले से मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं। पाकिस्तान के इस कदम पर ईरान और हूती समर्थकों की भी पैनी नजर है, क्योंकि यमन संघर्ष में कूदने से पाकिस्तान खुद एक नए कूटनीतिक संकट में फंस सकता है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि पाकिस्तान आने वाले समय में एक गहरे आंतरिक और बाहरी संकट की ओर बढ़ रहा है, जहां फैसले जनता के हित में नहीं बल्कि वर्दी के हिसाब से लिए जा रहे हैं।





