गंगा-जमुनी तहजीब का अनूठा संगम: जहाँ आस्था के रंग में घुलती है कारीगरी
भारत की असली ताकत उसकी विविध संस्कृति और आपसी भाईचारे में बसती है। जब भी देश में गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल दी जाती है, तो कुछ ऐसी कहानियाँ सामने आती हैं जो दिल को छू लेती हैं। उत्तर प्रदेश के संगम नगरी प्रयागराज से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित लालगोपालगंज का इब्राहिमपुर मोहल्ला कुछ ऐसी ही अनूठी दास्तां बयाँ करता है। शारदीय नवरात्र और अन्य पावन पर्वों के अवसर पर मंदिरों में गूँजने वाले मंत्रों और देवी के जयकारों के पीछे एक ऐसा अदृश्य धागा जुड़ा है, जो दो अलग-अलग समुदायों को अटूट प्रेम और विश्वास के साथ बांधता है।
यहाँ के मुस्लिम समुदाय के सैकड़ों परिवार पीढ़ियों से देवी मंदिरों में अर्पित किए जाने वाले लाल-पीले कलावा (रक्षासूत्र) और चुनरी को रंगने और तैयार करने के पवित्र कार्य में जुटे हुए हैं। नवरात्र का पावन पर्व आते ही इस बस्ती की रौनक देखने लायक होती है। धूप में सूखते चमकीले लाल और पीले धागों की लंबी कतारें दूर से ही आने जाने वाले राहगीरों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं। यह काम सिर्फ एक व्यावसायिक गतिविधि नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और आपसी सौहार्द की एक जीवंत तस्वीर है, जिसे ये कारीगर पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं।
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डेढ़ सौ साल पुराना इतिहास और चौथी पीढ़ी की जिम्मेदारी
इब्राहिमपुर की गलियों में कदम रखते ही मशीनों की आवाज़ और सूती धागों की महक यह बता देती है कि यहाँ के बाशिंदों की जिंदगी इन रंगों के साथ ही चलती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यह काम आज का नहीं, बल्कि लगभग डेढ़ सौ साल पुराना पुश्तैनी कारोबार है। रंगरेज बिरादरी के नाम से पहचाने जाने वाले ये कारीगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं। आज इस दौर में जहाँ युवा अपने पारंपरिक व्यवसायों से मुँह मोड़ रहे हैं, वहीं इस बस्ती की चौथी और पाँचवीं पीढ़ी इस विरासत को सहेजने में पूरी शिद्दत से लगी हुई है।
स्थानीय निवासी और पूर्व सभासद मोहम्मद ताहिर बताते हैं कि उनके मोहल्ले की करीब 1400 से 1500 की आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी रंगाई और कलावा निर्माण से जुड़ी हुई है। पुरखों से मिले इस हुनर को उन्होंने कभी मजहब के चश्मे से नहीं देखा। उनके लिए यह भगवान की पूजा में काम आने वाली पवित्र वस्तु है, जिसे वे उतनी ही पवित्रता और मेहनत से तैयार करते हैं जितनी कोई अन्य कारीगर कर सकता है।
"हमारे बुजुर्गों ने हमें सिखाया है कि कला और आजीविका का कोई धर्म नहीं होता। हम पिछले 150 साल से देवी माँ के चरणों में अर्पित होने वाला कलावा और चुनरी तैयार कर रहे हैं। यह हमारे लिए सिर्फ रोजी-रोटी नहीं, बल्कि हमारी तहजीब और भाईचारे की पहचान है।" — मोहम्मद ताहिर, स्थानीय कारीगर एवं पूर्व सभासद
त्योहारों के सीजन में चौबीसों घंटे सुलगती है भट्ठियाँ
वर्ष भर शांत रहने वाला यह मोहल्ला सावन और शारदीय नवरात्र के महीनों में पूरी तरह ऊर्जा से भर जाता है। देश के कोने-कोने से आने वाले धार्मिक आयोजनों के ऑर्डर को पूरा करने के लिए यहाँ के कारीगर दिन-रात एक कर देते हैं। त्योहारों से दो महीने पहले ही सूती धागों का भारी स्टॉक मंगा लिया जाता है। इसके बाद रंगों को उबालने, धागों को रंगने और उन्हें धूप में सुखाने का दौर शुरू होता है, जो लगातार चौबीसों घंटे चलता रहता है।
इस कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि नवरात्र और सावन के मुख्य सीजनों को मिलाकर इस क्षेत्र में लगभग 25 से 30 लाख रुपये का कच्चा कारोबार होता है। इस मामूली सी दिखने वाली अर्थव्यवस्था पर ही इलाके के सैकड़ों परिवारों के घरों के चूल्हे जलते हैं। महिलाएँ और बुजुर्ग भी इस प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। धागों की गिनती, उनकी लच्छी बनाना और उन्हें पैक करने का काम बारीक्री से पूरा किया जाता है, ताकि बाजार में माल की कोई कमी न रहे।
प्रयागराज से लेकर देवघर और अयोध्या तक पहुँचती है आस्था की डोर
लालगोपालगंज के मुस्लिम कारीगरों के हाथों से तैयार किया गया यह रक्षासूत्र और चुनरी केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पहुँच देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों तक है। मिर्जापुर के विख्यात विंध्यवासिनी धाम, कौशांबी के शक्तिपीठ कड़ा धाम, जौनपुर के चौकिया धाम और प्रयागराज के अलोप शंकरी देवी मंदिर में यही कलावा भक्तों की कलाई पर बंधता है।
इसके अलावा अयोध्या धाम, काशी (वाराणसी), गोरखपुर, मैहर और पड़ोसी राज्यों बिहार तथा झारखंड स्थित प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) तक इन उत्पादों की भारी माँग है। सावन के महीने में जब कांवड़िए बड़ी संख्या में निकलते हैं, तो उनके हाथों में बँधने वाला रक्षासूत्र भी यहीं से थोक में बनकर देश के अलग-अलग हिस्सों में रवाना होता है। यह इस बात का प्रमाण है कि आस्था और भक्ति की डोर किस प्रकार सीमाओं और धर्मों के बंधनों से परे है।
सरकारी उपेक्षा और आधुनिक दौर की चुनौतियाँ
एक तरफ जहाँ यह कुटीर उद्योग सांप्रदायिक सद्भाव की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ इन कारीगरों के सामने अपनी आजीविका को बचाए रखने का गंभीर संकट भी खड़ा है। कारीगरों का दर्द है कि सरकारें भले ही हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे करती हों, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उन्हें आज तक कोई विशेष आर्थिक सहायता या प्रोत्साहन नहीं मिला है।
कच्चे माल जैसे रंग, सूत और केमिकल्स की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं, लेकिन इसके मुकाबले तैयार माल का उचित मुनाफा उन्हें नहीं मिल पाता है। यही वजह है कि नई पीढ़ी के सामने विकल्प बेहद सीमित हैं। मजबूरी में आज भी लोग इस काम को चला रहे हैं, लेकिन वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते हैं ताकि वे आधुनिक नौकरियों या अन्य व्यवसायों की ओर रुख कर सकें। यदि शासन और प्रशासन स्तर पर इस पारंपरिक हुनर को एक क्लस्टर के रूप में विकसित किया जाए और वित्तीय मदद दी जाए, तो यह कुटीर उद्योग न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हो सकता है, बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने को और अधिक प्रगाढ़ बना सकता है।





