आसमान के पर्दे के पीछे छिपा है जलवायु का बड़ा राज
आसमान में तैरने वाले धूल के बेहद महीन कण हमारी नग्न आंखों से भले ही ओझल रहते हों, लेकिन पृथ्वी की जलवायु को संतुलित रखने में इनकी भूमिका बेहद अहम होती है। हम अमूमन धूल को सिर्फ प्रदूषण, गंदगी या मौसम की खराबी के रूप में देखते हैं, जो हमारी सेहत और सांस लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। हालांकि, विज्ञान का एक दूसरा पहलू यह भी बताता है कि यही धूल धरती के तापमान को नियंत्रित करने का एक प्राकृतिक कवच भी है। यह सूर्य की तेज किरणों को सोखने के बजाय उन्हें वापस अंतरिक्ष की तरफ परावर्तित कर देती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार पर कुछ हद तक लगाम लगती है।
हाल ही में सामने आए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस अदृश्य प्राकृतिक चक्र में आ रहे बड़े बदलाव की ओर इशारा किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, पिछले दो दशकों यानी 2003 से 2023 के बीच हमारे वायुमंडल में मौजूद धूल की कुल मात्रा में लगभग 10 फीसदी की रहस्यमयी गिरावट आई है। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि हालांकि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि की मुख्य वजह ग्रीनहाउस गैसों का भारी उत्सर्जन ही है, फिर भी धूल के कम होने से मानव जनित गर्मी में मामूली इजाफा जरूर हुआ है। यह स्थिति पर्यावरणविदों और मौसम वैज्ञानिकों के लिए एक नए अध्ययन और चिंता का विषय बन गई है।
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उपग्रह के आंकड़ों से खुला रहस्य, वैज्ञानिकों ने की पुष्टि
इस बड़े पर्यावरणीय बदलाव को समझने के लिए अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स (यूसीएलए) के वैज्ञानिकों ने साल 2003 से 2023 तक के दो दशकों के आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया। इस रिसर्च के लिए अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे उपग्रहों से मिले डेटा, जमीन पर स्थापित मौसम मापक यंत्रों और अत्याधुनिक वायुमंडलीय मॉडलों की मदद ली गई। इस अध्ययन के चौंकाने वाले निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल 'साइंस एडवांसेज' में प्रकाशित किए गए हैं, जिन्होंने दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है।
अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ताओं का मानना है कि इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से लेकर अब तक धरती के ऊपर का वायुमंडल पहले के मुकाबले कम धूलभरा हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल लगभग दो अरब टन धूल और रेत हमारे वायुमंडल में प्रवेश करती है। यह मात्रा इतनी विशाल है कि यदि इसका वजन किया जाए, तो यह मिस्र के गीजा के 307 महान पिरामिडों के कुल वजन के बराबर बैठेगी। इस विशाल धूल भंडार का अस्सी प्रतिशत से अधिक हिस्सा उत्तरी अफ्रीका के विशाल सहारा रेगिस्तान और मध्य पूर्व के इलाकों से उठकर हवा के जरिए महाद्वीपों और महासागरों को पार करता है।
कहाँ से उड़कर आती है यह धूल और क्यों आ रही है कमी?
पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध को वायुमंडलीय धूल का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। उत्तरी अफ्रीका का सहारा मरुस्थल और एशिया के गोबी जैसे विशाल रेगिस्तानी इलाके हवा के तेज झोंकों के साथ अरबों टन धूल को आसमान में बिखेर देते हैं। ये कण हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हुए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं। लेकिन पिछले बीस सालों में इन इलाकों से उठने वाली धूल की मात्रा में कमी दर्ज की गई है, जिसके सटीक कारणों का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक अभी भी माथापच्ची कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हवा की बदलती रफ्तार, क्षेत्रीय भू-भाग की स्थिति और पर्यावरण में हो रहे अन्य बड़े बदलाव इसके मुख्य कारण हो सकते हैं। भारत के संदर्भ में भी ऐसा ही रुख देखने को मिला है। केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में राजस्थान और आसपास के रेतीले इलाकों में धूल भरी आंधियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। पहले जहां साल में औसतन 17 बार तेज आंधियां चलती थीं, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर महज पांच के आसपास रह गया है। इसके अलावा, क्षेत्र के रेत के टीलों की बनावट में भी बदलाव दर्ज किया गया है।
तापमान पर असर और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए इसके मायने
वायुमंडल में धूल घटने का सीधा असर तापमान संतुलन पर पड़ता है। जब हवा में धूल कम होती है, तो सूर्य की किरणें बिना किसी रुकावट के सीधे धरती की सतह पर पहुंचती हैं, जिससे तपिश बढ़ती है। हालांकि, वैज्ञानिक यह भी साफ करते हैं कि यह जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण नहीं है, लेकिन यह ग्रीनहाउस गैसों के असर को और बढ़ावा दे रहा है। इसके साथ ही, धूल केवल तापमान ही नहीं तय करती, बल्कि यह प्रकृति के लिए पोषक तत्वों का एक बड़ा जरिया भी है।
"वायुमंडल में मौजूद धूल को केवल एक प्रदूषण या समस्या के रूप में देखना सही नहीं है। इसके महीन कण महासागरों और जमीन तक कई जरूरी पोषक तत्व और खनिज पहुंचाते हैं, जो प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को जिंदा रखने का काम करते हैं।" — डॉ. उमेश चंद्र कुलश्रेष्ठ, पर्यावरण वैज्ञानिक
यही नहीं, जब ये धूलकण ध्रुवीय क्षेत्रों या पहाड़ों पर जमी बर्फ पर गिरते हैं, तो उनके पिघलने की रफ्तार भी प्रभावित होती है। विश्व मौसम संगठन (WMO) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग आधी आबादी किसी न किसी रूप में धूल भरे तूफानों के संपर्क में आती है, जो सेहत पर भी असर डालते हैं। बहरहाल, आसमान में घटती धूल का यह नया चक्र आने वाले समय में हमारी हवा, पानी और मौसम के मिजाज को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर दुनियाभर के वैज्ञानिकों की नजर टिकी हुई है।






