पश्चिम एशिया के रेत में कूटनीति की परतें तेजी से बदल रही हैं। जब से इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की गोपनीय और अचानक यात्रा की है, तब से क्षेत्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। अबू धाबी के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ हुई इस गुप्त बैठक ने केवल खाड़ी देशों के गलियारों में ही नहीं, बल्कि नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में भी रणनीतिक विचार-विमर्श का दौर शुरू कर दिया है। 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड रिपोर्टिंग और खुफिया कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, यह दौरा महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं है, बल्कि अमेरिका-ईरान तनाव के बीच एक नए सुरक्षा आर्चिटेक्ट को गढ़ने की कोशिश है।
अबू धाबी में मंथन: ईरान और हूती मोर्चे के खिलाफ नया सुरक्षा घेरा
क्षेत्रीय सूत्रों के अनुसार, नेतन्याहू की इस यात्रा का मुख्य एजेंडा ईरान और यमन के हूती विद्रोहियों के बढ़ते खतरों से निपटना है। खाड़ी देशों में यह चिंता गहराई जा रही है कि अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी अब खुद इन देशों को उठानी होगी। अबू धाबी में हुई इस अहम बैठक में इजरायल की खुफिया तकनीक और खाड़ी देशों के वित्तीय व रणनीतिक संसाधनों को मिलाकर एक साझा मोर्चेबंदी पर विचार किया गया है। सऊदी अरब इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए है, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में यह नया गठबंधन क्षेत्रीय नेतृत्व के समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है
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सऊदी अरब की बेचैनी और खाड़ी के बदलते समीकरण
नेतन्याहू के इस दौरे से रियाद यानी सऊदी अरब के रणनीतिकार भी सतर्क हो गए हैं। अब्राहम समझौते के तहत इजरायल और यूएई के रिश्ते पहले ही मजबूत हो चुके हैं, लेकिन मौजूदा युद्ध जैसे हालात में नेतन्याहू का व्यक्तिगत रूप से यूएई पहुंचना यह संकेत देता है कि अबू धाबी इस क्षेत्र में खुद को एक बड़े सुरक्षा मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर रहा है। सऊदी अरब, जो ईरान के साथ अपने कूटनीतिक रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश कर रहा था, इस नई धुरी के उभरने से असहज महसूस कर सकता है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया की यह कूटनीतिक बिसात अब बेहद जटिल होती जा रही है।
भारत की दुविधा: क्या ब्रिक्स और पश्चिम एशिया के बीच फंस गई है नई दिल्ली?
इस पूरी भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे बड़ा प्रभाव भारत पर पड़ सकता है। एक तरफ भारत के संबंध इजरायल के साथ रणनीतिक रूप से अत्यंत प्रगाढ़ हैं, तो दूसरी तरफ यूएई और सऊदी अरब के साथ हमारे ऊर्जा और आर्थिक संबंध रीढ़ की हड्डी समान हैं। इसके अलावा, ब्रिक्स (BRICS) समूह में ईरान के शामिल होने के बाद भारत की कूटनीतिक चुनौतियां और बढ़ गई हैं।
- ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिम एशिया में किसी भी प्रकार के बड़े युद्ध से भारत की तेल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है।
- संतुलन की नीति: नई दिल्ली हमेशा से 'strategic autonomy' (रणनीतिक स्वायत्तता) की पक्षधर रही है, जिससे वह इजरायल और अरब देशों, दोनों के साथ अपने संबधों को संतुलित रखती है।
- समुद्री सुरक्षा: लाल सागर और हिंद महासागर में हूती हमलों के बीच भारत के व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा एक बड़ी प्राथमिकता बन चुकी है।
निष्कर्ष: आगे की राह और भारत का रुख
हमारी फील्ड जांच बताती है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की यह कूटनीति भारत की विदेश नीति के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगी। नेतन्याहू का यूएई दौरा भले ही इजरायल और खाड़ी देशों का द्विपक्षीय मामला लगे, लेकिन इसके वैश्विक और क्षेत्रीय निहितार्थ बहुत गहरे हैं। 'द फ्रीलान्स' की पड़ताल यह स्पष्ट करती है कि भारत को न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर सतर्क रहना होगा, बल्कि इस नए भू-राजनीतिक खेल में बहुत ही नपे-तुले कदम उठाने होंगे ताकि हमारी रणनीतिक साझेदारी पर कोई आंच न आए।







