उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे मजबूत सियासी गढ़
देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सीमा से लगा यह विधानसभा क्षेत्र सूबे की सबसे वीआईपी और चर्चित सीटों में शुमार किया जाता है। राजनीतिक गलियारों में इस क्षेत्र को भारतीय जनता पार्टी का सबसे सुरक्षित और अभेद्य किला माना जाता है। जब से साल 2008 में नए परिसीमन के बाद इस भौगोलिक क्षेत्र को स्वतंत्र विधानसभा के रूप में मान्यता मिली है, तब से यहां चुनावी गणित हमेशा एक ही दल के पक्ष में झुका नजर आया है। सामान्य विधानसभा चुनाव हों या फिर बीच में खाली हुई सीट पर हुआ उपचुनाव, परिणाम हमेशा भगवा खेमे के पक्ष में ही आए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र की बनावट, यहां का शहरी मतदाता वर्ग और विकास के पैमाने अन्य ग्रामीण क्षेत्रों से काफी अलग हैं। यही वजह है कि यहां के चुनावी समीकरण बाकी उत्तर प्रदेश की पारंपरिक जातिगत राजनीति से थोड़े जुदा नजर आते हैं। विरोधी दलों के तमाम प्रयासों के बावजूद कोई भी पार्टी इस राजनीतिक दुर्ग में सेंध लगाने में अब तक पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। हर बार के चुनाव परिणामों ने यह साबित किया है कि यहां की जनता का भरोसा किस एक पार्टी पर सबसे ज्यादा टिकता है।
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साल 2012 के पहले चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले को पछाड़कर खिला था कमल
इस आधुनिक विधानसभा क्षेत्र में साल 2012 में पहली बार विधिवत चुनाव संपन्न हुए थे। उस समय मुकाबला काफी दिलचस्प और त्रिकोणीय माना जा रहा था, जिसमें मुख्य तौर पर तीन बड़ी पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर थी। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, शुरुआती चुनावी दंगल में बीजेपी के टिकट पर उतरे महेश कुमार शर्मा ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को पीछे छोड़ते हुए शानदार जीत हासिल की थी। उन्हें कुल 77 हजार से अधिक वोट मिले थे, जबकि बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे।
इस पहले ही मुकाबले में समाजवादी पार्टी तीसरे और कांग्रेस चौथे स्थान पर सिमटकर रह गई थी। इस तरह से इस महत्वपूर्ण सीट का पहला विधायक बनने का गौरव महेश शर्मा को प्राप्त हुआ। हालांकि, उनकी यह जीत आगे चलकर होने वाले बड़े राजनीतिक बदलावों की एक महज शुरुआत मात्र थी, क्योंकि आने वाले समय में यहां जीत का अंतर और अधिक चौड़ा होता चला गया, जिसने विरोधी दलों के खेमे में गहरी चिंता पैदा कर दी।
वर्ष 2014 के उपचुनाव में और ज्यादा मजबूत हुई भगवा पार्टी की स्थिति
साल 2014 के राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रम ने इस स्थानीय राजनीति की दिशा में भी बड़ा मोड़ ला दिया। जिस लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत यह विधानसभा आती है, वहां से सांसद चुने जाने के बाद महेश शर्मा को केंद्र सरकार में बड़ी जिम्मेदारी मिल गई। इसके चलते इस सीट पर उसी साल उपचुनाव कराने की जरूरत आन पड़ी। इस दंगल में मुकाबला द्विपीय हो गया क्योंकि प्रमुख विपक्षी दलों ने या तो अपने कदम पीछे खींच लिए या फिर वे उस स्तर का मुकाबला पेश नहीं कर पाए जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
भारतीय जनता पार्टी ने इस उपचुनाव में विमला बाथम पर अपना भरोसा जताया और उन्होंने पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए जीत के अंतर को और अधिक बड़ा कर दिया। विमला बाथम को एक लाख से अधिक मत प्राप्त हुए, जबकि सपा की उम्मीदवार उनसे काफी पीछे रह गईं। कांग्रेस पार्टी की स्थिति इस उपचुनाव में और भी ज्यादा कमजोर हो गई और उसके प्रत्याशी दहाई के आंकड़ों में ही सिमटे नजर आए। इस उपचुनाव ने साफ कर दिया कि यहां की जनता का रुख किस तरफ मजबूती से बना हुआ है।
राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह की एंट्री और जीत की हैट्रिक
साल 2017 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़ा रणनीतिक बदलाव करते हुए देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को चुनावी मैदान में उतारा। उम्मीदवार का चेहरा बदलने के बावजूद चुनावी परिणाम पर इसका कोई असर नहीं पड़ा और नतीजा पूरी तरह पुराना ही दोहराया गया। पंकज सिंह ने अपने विरोधियों को भारी मतों के अंतर से शिकस्त दी और क्षेत्र में जीत की हैट्रिक पूरी की। उन्हें एक लाख बासठ हजार से अधिक वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी सुनील चौधरी काफी पीछे छूट गए।
इस चुनाव के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम हो गई कि यह सीट विपक्ष के लिए लगभग असंभव चुनौती बन चुकी है। वर्ष 2022 के अगले विधानसभा चुनाव में एक बार फिर पंकज सिंह और सुनील चौधरी आमने-सामने थे, लेकिन इस बार जीत का अंतर सभी पिछले रिकॉर्ड तोड़ गया। पंकज सिंह ने दो लाख से अधिक मत हासिल किए और उनके और दूसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशी के बीच का अंतर लगभग पौने दो लाख वोटों तक पहुंच गया।
"यहाँ की जनता ने हमेशा विकास और सुशासन के मॉडल पर मुहर लगाई है। आगामी चुनावों में हम अपने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़कर ऐतिहासिक बहुमत के साथ फिर से जीत दर्ज करेंगे और जनता के भरोसे पर पूरी तरह खरे उतरेंगे।" — स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व
आगामी चुनावों के लिए क्या बन रहे हैं नए राजनीतिक समीकरण
अब जबकि राजनीतिक दलों की निगाहें आने वाले चुनावों पर टिकी हैं, इस अभेद्य किले को भेदने के लिए विपक्षी खेमे में नई रणनीतियों पर मंथन शुरू हो चुका है। जानकारों का कहना है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां आगामी मुकाबले में अपनी रणनीति को धार देने के लिए नए सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश कर सकती हैं। वहीं बहुजन समाज पार्टी का रुख भी इस बात पर निर्भर करेगा कि वह किस मजबूत चेहरे को मैदान में उतारती है।
दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ दल इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रहा है कि उसका संगठनात्मक ढांचा और विकास कार्य इस सीट पर उसे लगातार चौथी बार विजय दिलाएंगे। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या विपक्षी दल अपने पुराने प्रदर्शन से सीख लेते हुए इस किले की दीवारों में कोई सेंध लगा पाते हैं या फिर यह गढ़ बीजेपी के पास ही सुरक्षित बना रहता है।









