बचपन की वो सुबह और पहाड़ों को रटने का संघर्ष
भारतीय शिक्षा प्रणाली और स्कूलों में पढ़ने वाले हर शख्स के जीवन में एक दौर ऐसा जरूर आता है, जब उसे दो से लेकर बीस तक के पहाड़े जुबानी याद करने के लिए मजबूर किया जाता है। सुबह की ठंडी हवाओं में या स्कूल की प्रार्थना से ठीक पहले उन लंबे-चौड़े अंकों को दोहराना किसी बड़ी जंग जीतने से कम नहीं लगता था। उस वक्त हर बच्चे के मन में यही सवाल उठता था कि आखिर इन बोरिंग नंबरों को रटने से हमारी व्यावहारिक जिंदगी में कौन सा तीर चल जाएगा। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और दुनियादारी की समझ विकसित होती है, वैसे-वैसे इन बुनियादी चीजों का महत्व समझ में आने लगता है।
गणित को यदि अंकों का रोमांचक खेल माना जाए, तो पहाड़े उस खेल की एबीसीडी हैं। बचपन में जब शिक्षक बच्चों को कॉपियों में पहाड़े लिखने और उन्हें मुंहजुबानी सुनाने का आदेश देते थे, तो कई बार चेहरों पर हवाइयां उड़ जाती थीं। छोटे बच्चों का दिमाग अमूर्त यानी एब्स्ट्रैक्ट चीजों को उतनी आसानी से स्वीकार नहीं करता है। लगातार एक ही चीज को बार-बार दोहराना यानी रोटे लर्निंग बच्चों को मानसिक थकान देता है। यही वजह है कि जब तक ये पहाड़े जुबान पर पूरी तरह चढ़ नहीं जाते, तब तक साप्ताहिक टेस्ट के दिन बच्चों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं।
इसके बावजूद, भारतीय स्कूलों और शिक्षाविदों ने हमेशा से टेबल्स यानी पहाड़े रटने पर कड़ा जोर दिया है। इसके पीछे एक गहरा वैज्ञानिक कारण छिपा हुआ है। जब किसी जानकारी को बार-बार दोहराया जाता है, तो वह हमारे मस्तिष्क की वर्किंग मेमोरी से निकलकर सीधे लॉन्ग-टर्म मेमोरी में सुरक्षित हो जाती है। मैथ्स के जटिल न्यूमेरिकल हल करते वक्त अगर छात्र को हर छोटी गणना के लिए रफ कॉपी का इस्तेमाल करना पड़े, तो उसका आधा समय सिर्फ बुनियादी गुणा-भाग में ही बर्बाद हो जाएगा। पहाड़े जुबानी याद होने से दिमाग का मुख्य फोकस फॉर्मूला समझने और सवाल की गहराई तक पहुंचने पर रहता है, न कि छोटे-मोटे जोड़-घटाव करने पर।
संबंधित खबरें
एनवीडिया के सीईओ का चौंकाने वाला बयान और एआई का असर
तकनीकी दुनिया के दिग्गज और चिप निर्माता कंपनी एनवीडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया है जिसने पूरी दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि आधुनिक तकनीकी युग में अब पहाड़े रटने या पुरानी बातों को दिमाग में स्टोर करके रखने की कोई खास जरूरत नहीं है। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि उन्हें खुद अपना फोन नंबर या घर का पता तक जुबानी याद नहीं रहता है। उनके इस बयान के बाद शिक्षाविदों और तकनीक प्रेमियों के बीच यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या हम पूरी तरह से मशीनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर निर्भर होते जा रहे हैं।
एआई के इस आधुनिक दौर में तकनीक ने इंसानी जीवन को इतना आसान बना दिया है कि हमें अब छोटी-छोटी बातों को याद रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती। फोन की डायरेक्टरी हमारे सारे संपर्क नंबर याद रखती है, जीपीएस हमें रास्ते याद दिलाता है और कैलकुलेटर पलक झपकते ही बड़े से बड़ा हिसाब हल कर देता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या स्कूल जाने वाले बच्चों को भी अब पुरानी पारंपरिक पद्धतियों से दूर ले जाना चाहिए? एनवीडिया प्रमुख का मानना है कि भविष्य में एआई इंसानी दिमाग के कई कामों को खुद संभाल लेगा, जिससे हमें रटने की बजाय सृजनात्मकता पर ध्यान देना होगा।
हालांकि, तकनीक के इस अति-आधुनिक दृष्टिकोण के अपने खतरे भी माने जा रहे हैं। कई शिक्षाविदों का तर्क है कि यदि इंसानी दिमाग ने चीजों को याद रखना छोड़ दिया, तो उसकी अपनी बौद्धिक क्षमता और मानसिक धार पर विपरीत असर पड़ सकता है। तकनीक इंसान की मदद के लिए है, न कि उसकी सोचने-समझने की क्षमता को पूरी तरह से विस्थापित करने के लिए। यही कारण है कि दुनिया भर के स्कूलों में पारंपरिक शिक्षण और आधुनिक तकनीकी उपकरणों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है ताकि बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित न हो।
मेंटल मैथ और न्यूरल पाथवे का वैज्ञानिक कनेक्शन
गणित के जानकारों और बाल मनोवैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि पहाड़े रटना केवल गणितीय गणना का माध्यम नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक विकास का सबसे बेहतरीन व्यायाम है। जब कोई बच्चा बिना कैलकुलेटर या मोबाइल के पलक झपकते ही बड़े-बड़े गुणा-भाग अपने मन में ही हल कर लेता है, तो उसकी यह क्षमता महीनों और सालों की गई दिमागी कसरत का परिणाम होती है। इस प्रक्रिया से दिमाग का न्यूरल पाथवे मजबूत होता है और बच्चों में तार्किक सोच यानी लॉजिकल रीजनिंग विकसित होती है।
बचपन में की गई यह दिमागी कसरत आगे चलकर जीवन के हर क्षेत्र में काम आती है। जिन छात्रों की मेंटल मैथ मजबूत होती है, वे कठिन परिस्थितियों में भी तुरंत और सटीक निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। आधुनिक दौर में भले ही हमारे पास हर काम के लिए गैजेट्स मौजूद हों, लेकिन मस्तिष्क की सक्रियता बनाए रखने के लिए बुनियादी मानसिक अभ्यासों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है। तकनीक चाहे जितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन बुनियादी बुद्धिमत्ता और मानसिक अनुशासन का कोई विकल्प नहीं हो सकता है।
"तकनीक हमारी जिंदगी को आसान बनाने के लिए है, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि हम अपने दिमाग की नैसर्गिक क्षमताओं का इस्तेमाल करना ही बंद कर दें। एआई एक बेहतरीन टूल है, लेकिन इंसानी मस्तिष्क की पैनी सोच और सजगता हमेशा सबसे ऊपर रहेगी।" — तकनीकी शिक्षा विशेषज्ञ
भविष्य की शिक्षा और तकनीक का बदलता हुआ स्वरूप
आज के समय में क्लासरूम से लेकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स तक शिक्षा का पूरा पैटर्न बदल चुका है। स्मार्ट बोर्ड्स, टैबलेट्स और एआई-बेस्ड ट्यूटर्स ने पढ़ाई के तौर-तरीकों को पूरी तरह से नया रूप दे दिया है। छात्रों को अब भारी-भरकम किताबें ढोने या जटिल फार्मूले रटने के बजाय कॉन्सेप्ट को गहराई से समझने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक हो जाता है कि क्या आने वाले समय में स्कूलों का पाठ्यक्रम पूरी तरह से बदल जाएगा और रटने वाली प्रणालियों का वजूद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा में बदलाव समय की मांग है, लेकिन हर पुरानी चीज को बेकार मान लेना भी मूर्खता होगी। आने वाले दिनों में हमें एक ऐसे हाइब्रिड मॉडल की जरूरत होगी, जहां तकनीक का लाभ भी मिले और पारंपरिक शिक्षा से मिलने वाले मानसिक अनुशासन को भी बचाया जा सके। बच्चों को एआई का उपयोग करना सिखाना जरूरी है, लेकिन साथ ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाना भी उतना ही आवश्यक है ताकि वे किसी भी तकनीकी खराबी या संकट की स्थिति में पूरी तरह लाचार न हों।
निष्कर्ष: तकनीक और इंसान के बीच का संतुलन
अंत में यही कहा जा सकता है कि एनवीडिया के सीईओ का बयान भविष्य की उस तस्वीर की ओर इशारा करता है जहां मशीनें हमारे अधिकांश काम आसान कर देंगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने दिमाग को जंग लगने के लिए छोड़ दें। पहाड़े याद रखना या छोटी-मोटी गणनाएं खुद करना हमारे बौद्धिक विकास का एक जरूरी हिस्सा है। तकनीक का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन अपनी मानसिक क्षमताओं को जिंदा रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है ताकि इंसान और मशीन के बीच का संतुलन हमेशा बना रहे।







