नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में इन दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त या प्रशासनिक पदों से जुड़े मामलों को लेकर सियासी पारा सातवें आसमान पर है। संसद से लेकर सड़क तक विपक्ष ने एक सुर में इस्तीफे की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है। आम आदमी और राजनीतिक जानकारों के मन में यह सवाल लगातार बना हुआ है कि आखिर इस इस्तीफे की मांग के पीछे का असली खेल क्या है। विपक्षी दल इसे सिर्फ एक सांकेतिक विरोध नहीं मान रहे हैं, बल्कि इसे आगामी चुनावों और राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने इस मामले की जमीनी हकीकत और राजनीतिक रणनीतियों की बारीकी से पड़ताल की है।
शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव प्रक्रिया और प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल खड़े करता रहा है। ज्ञानेश कुमार के मामले में विपक्ष का यह आक्रामक रुख अचानक सामने नहीं आया है। इसके पीछे कई हफ्तों से चल रही रणनीतिक बैठकें और अंदरखाने की योजनाएं काम कर रही हैं। विपक्षी दलों का मानना है कि इस मुद्दे को तूल देकर वे अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने की जुगत में हैं। हालांकि, सत्ता पक्ष ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए विपक्ष पर राजनीति करने का गंभीर आरोप लगाया है।
विपक्ष की रणनीति के पीछे के छिपे हुए सियासी मायने
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस तरह के मुद्दों के जरिए जनता के बीच एक सीधा संदेश देना चाहता है। वे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने की फिराक में हैं। जब भी बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ आवाज उठाई जाती है, तो मीडिया का ध्यान स्वतः उस ओर आकर्षित हो जाता है। विपक्ष इसी का पूरा फायदा उठाकर अपनी सियासी रोटियां सेकने की कोशिश कर रहा है। क्षेत्रीय दलों का रुख भी इस पूरे घटनाक्रम में काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि हर दल अपनी सुविधा के अनुसार बयान दे रहा है।
दूसरी ओर, इसी बीच नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला का एक अलग बयान भी सामने आया है। एक तरफ जहां पूरा विपक्ष विरोध प्रदर्शन में जुटा है, वहीं उमर अब्दुल्ला ने कुछ मुद्दों पर खुलकर बात की है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि विपक्षी खेमे में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कांग्रेस पार्टी के बुलावे पर कई बड़े दलों के नेताओं का न पहुंचना इस बात का पुख्ता सबूत है कि गठबंधन के भीतर आपसी खींचतान जारी है। समाजवादी पार्टी समेत कुछ अन्य दलों का दूरी बनाना इस बात की ओर इशारा करता है कि हर पार्टी का अपना अलग चुनावी एजेंडा है।
सहयोगी दलों की दूरियां और गठबंधन में बढ़ती दरार
राजनीति की पिच पर कब कौन किसका साथ छोड़ दे, यह कहना बहुत मुश्किल होता है। ताजा घटनाक्रम में यह बात एक बार फिर साबित हो गई है जब कुछ प्रमुख दलों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले मंच से दूरी बना ली। जब मुख्य विपक्षी दल अपने ही सहयोगियों को एक मंच पर लाने में असफल रहता है, तो उसकी ताकत अपने आप कमजोर पड़ जाती है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे वाले मुद्दे पर भी यही हाल देखने को मिला है। कुछ दल इस मांग का खुलकर समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ ने इस पर चुप्पी साध रखी है।
आम जनता के बीच भी इन राजनीतिक उठापटक को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। एक आम नागरिक के लिए महंगाई, बेरोजगारी और रोजमर्रा की समस्याएं ज्यादा अहम हैं, जबकि नेता लोग इन बड़े पदों और इस्तीफे के खेल में उलझे हुए हैं। धरातल पर जब हमने लोगों से बात की, तो उनका साफ कहना था कि नेताओं को जनता के असली मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। संसद के आगामी सत्र में भी इस मुद्दे पर भारी हंगामा होने के पूरे आसार हैं।
संसद से लेकर सड़क तक आगामी राजनीतिक संघर्ष का खाका
आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है क्योंकि दोनों ही पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। एक तरफ जहां सरकार अपनी नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को सही ठहरा रही है, वहीं विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहा है। द फ्रीलान्स की यह पड़ताल बताती है कि राजनीति की इस शतरंज में हर एक चाल बहुत सोच-समझकर चली जा रही है। देखना यह होगा कि इस राजनीतिक दंगल का अंत किस करवट बैठता है और जनता किसे सही मानती है।









