भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के इतिहास में संवैधानिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है, परंतु देश के शीर्ष चुनाव नियामक—भारत निर्वाचन आयोग (ECI)—के शीर्ष नेतृत्व पर ऐसा खुला और संगठित राजनीतिक प्रहार दुर्लभ ही देखने को मिलता है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली, चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और हालिया चुनावों में प्रक्रियागत पारदर्शिता को लेकर 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन ने अब निर्णायक संघर्ष का मन बना लिया है। 30 सितंबर को राजधानी दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में विपक्षी दलों के शीर्ष रणनीतिकारों का जमावड़ा केवल एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि संस्थागत स्वायत्तता के सवाल पर एक बड़े राजनीतिक और कानूनी आंदोलन की प्रस्तावना प्रतीत होता है।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे असाधारण बात यह है कि पश्चिम बंगाल में एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) इस मुद्दे पर एक मंच पर खड़े नजर आ रहे हैं। चुनावी राजनीति के तल्ख इतिहास को परे रखकर सीपीआई(एम) पोलित ब्यूरो सदस्य एमए बेबी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच हुआ संवाद यह स्पष्ट संकेत देता है कि विपक्ष निर्वाचन आयोग की वर्तमान दिशा को किसी सामान्य प्रक्रियागत चूक के बजाय 'लोकतांत्रिक ढांचे के लिए अस्तित्वगत संकट' मान रहा है।
राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों का ऐतिहासिक मेल: वामदल और तृणमूल की नई जुगलबंदी
भारतीय राजनीति में राजनीतिक अंतर्विरोध कई बार साझा संकट के समय अप्रत्याशित गठबंधन रचते हैं। 23 सितंबर को सीपीआई(एम) के वरिष्ठ नेता एमए बेबी द्वारा विपक्षी दलों को प्रेषित पत्र और उसके उपरांत 24 सितंबर को ममता बनर्जी से हुई दूरभाष वार्ता ने इस पूरे विमर्श को उत्प्रेरित किया। ममता बनर्जी ने न केवल वामपंथी नेतृत्व के संयुक्त मोर्चे के आह्वान का स्वागत किया, बल्कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से अपनी बातचीत का हवाला देते हुए एक त्वरित और साझा रणनीति पर बल दिया।
यह समन्वय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम बंगाल में दशकों के हिंसक संघर्ष और चुनावी कटुता के बावजूद दोनों दल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि चुनाव तंत्र के कथित विचलन पर अलग-अलग लड़ने के बजाय संयुक्त शक्ति का प्रदर्शन अनिवार्य है। अभिषेक बनर्जी और ममता बनर्जी की प्रत्यक्ष सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि तृणमूल कांग्रेस इस लड़ाई को आगामी विधानसभा चुनावों और संसद के शीतकालीन सत्र से पहले राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा मुद्दा बनाने के पक्ष में है।
"जब संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर ही संदेह के गहरे बादल घिर जाएं, तो क्षेत्रीय और राजनीतिक अंतर्विरोधों को दरकिनार कर लोकतंत्र की बुनियादी संरचना को बचाना ही प्राथमिक कर्तव्य बन जाता है।"
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विवाद की जड़: नए चुनाव आयुक्त अधिनियम और आयोग की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
इस अभूतपूर्व टकराव के मूल कारणों को समझने के लिए दिसंबर 2023 में पारित 'मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' के संदर्भ में जाना होगा। इस कानून के तहत मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल से बाहर कर दिया गया और पैनल में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को रखा गया। इस संरचना ने कार्यपालिका को स्पष्ट बहुमत दे दिया, जिस पर विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगाते रहे कि इसने निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को गंभीर आघात पहुंचाया है।
मार्च 2024 में आम चुनावों की घोषणा से ऐन पहले तत्कालीन चुनाव आयुक्त अरुण गोयल के अप्रत्याशित इस्तीफे और उसके तुरंत बाद ज्ञानेश कुमार तथा सुखबीर सिंह संधू की त्वरित नियुक्ति ने विपक्ष के संशयों को और गहरा किया था। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान विभिन्न चरणों में मतदान प्रतिशत के आंकड़ों (Voter Turnout Data) को जारी करने में देरी, सत्तापक्ष के कथित आचार संहिता उल्लंघनों पर ढुलमुल रवैया और विपक्षी दलों के प्रति अति-सक्रियता जैसे आरोपों ने विपक्ष के असंतोष को ज्वालामुखी बना दिया।
इसके अतिरिक्त, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) की पर्चियों के शत-प्रतिशत मिलान की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में चली लंबी बहस और आयोग द्वारा विपक्षी प्रतिनिधिमंडलों को समय न दिए जाने की घटनाओं ने इस अविश्वास को संस्थागत रूप दे दिया। विपक्ष का मानना है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में अपनी संवैधानिक मर्यादा (अनुच्छेद 324) का पालन करने में विफल रहा है।
'इंडिया प्लस' रणनीति: गैर-गठबंधन दलों को जोड़ने की कवायद
दिल्ली में आयोजित होने वाली 30 सितंबर की बैठक की रूपरेखा केवल पारंपरिक 'इंडिया' गठबंधन तक सीमित नहीं है। विपक्षी रणनीतिकारों ने इसे 'इंडिया प्लस' का स्वरूप देने के लिए उन दलों तक भी हाथ बढ़ाया है जो अब तक दोनों प्रमुख राष्ट्रीय गठबंधनों से समान दूरी बनाए रखने की नीति पर चलते रहे हैं।
आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल, बीजू जनता दल (BJD) के प्रमुख नवीन पटनायक, भारत राष्ट्र समिति (BRS) के नेतृत्व और तमिलनाडु में हाल ही में अपनी राजनीतिक पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) बनाने वाले लोकप्रिय अभिनेता विजय तक को पत्र भेजे गए हैं। द्रमुक (DMK) प्रमुख एमके स्टालिन पहले से ही इस मुद्दे पर मुखर रहे हैं। ओडिशा में सत्ता गंवाने के बाद बीजेडी का रुख केंद्र के प्रति अपेक्षाकृत सतर्क हुआ है, वहीं तेलंगाना में बीआरएस अपनी खोई जमीन तलाश रही है। ऐसे में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता जैसे तकनीकी और भावनात्मक मुद्दे पर गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपा दलों का एक साझा सहमति पर आना भारतीय संघवाद और चुनावी राजनीति के संतुलन को बदल सकता है।
संवैधानिक प्रावधान, महाभियोग का यथार्थ और विपक्ष के विकल्प
संवैधानिक दृष्टि से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना कोई सरल कार्य नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिस रीति और आधारों पर उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है—अर्थात 'कदाचार या अक्षमता' (Proved Misbehaviour or Incapacity) के आधार पर संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित महाभियोग प्रस्ताव के जरिए।
वर्तमान लोकसभा और राज्यसभा में संख्याबल को देखते हुए विपक्ष के लिए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को पारित कराना संख्यात्मक रूप से असंभव है। परंतु विपक्ष की रणनीति संभवतः इस तकनीकी महाभियोग की सफलता से अधिक एक 'राजनीतिक चार्जशीट' तैयार करने की है। विपक्ष के पास मुख्य रूप से तीन संभावित रास्ते हैं:
- संसदीय दबाव और कार्यस्थगन: संसद के आगामी सत्र में ECI के कामकाज, मतदाता सूची संशोधन और चुनाव सुधारों पर चर्चा की मांग को लेकर सरकार को घेरना।
- न्यायिक समीक्षा: चुनाव आयोग के प्रशासनिक निर्णयों, डेटा रिलीज प्रोटोकॉल और 2023 के नियुक्ति अधिनियम की वैधता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में लंबित याचिकाओं पर आक्रामक विधिक पैरवी।
- जन-आंदोलन और जनमत निर्माण: देश के विभिन्न राज्यों में 'चुनावी शुचिता' (Electoral Integrity) को लेकर जन-सुनवाई, सेमिनार और साझा रैलियों के जरिए मतदाताओं में संस्थागत स्वतंत्रता का प्रश्न खड़ा करना।
भविष्य का परिदृश्य: लोकतांत्रिक साख की परीक्षा
30 सितंबर की बैठक के बाद बनने वाला साझा विपक्षी रोडमैप यह तय करेगा कि क्या यह केवल आगामी हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और झारखंड चुनावों के संदर्भ में एक सामयिक राजनीतिक प्रतिक्रिया है, अथवा यह भारतीय चुनाव प्रणाली में मूलभूत ढांचागत सुधारों का कोई गंभीर विमर्श बनने जा रहा है।
टी.एन. शेषन के दौर से लेकर आज तक चुनाव आयोग ने अपनी जो छवि भारतीय नागरिकों के मानस में बनाई थी, वह निष्पक्षता, निर्भीकता और तटस्थता की थी। जब मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ देश के आधे से अधिक राज्यों में शासन कर चुके या कर रहे राजनीतिक दल खुले विद्रोह की मुद्रा में आ जाएं, तो यह केवल किसी एक व्यक्ति विशेष पर हमला नहीं रहता, बल्कि यह समूचे गणराज्य की लोकतांत्रिक साख पर प्रश्नचिह्न लगाता है। दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब से निकलने वाला संदेश यह निर्धारित करेगा कि भारतीय लोकतंत्र में संस्थागत संतुलन का भविष्य किस करवट बैठेगा।









