मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण पर गरमाई सियासत
देश में चुनावी सुधारों और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमिन (एआईएमआईएम) के प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पर तीखा हमला बोला है। ओवैसी ने दो टूक शब्दों में कहा है कि वह इस पूरी प्रक्रिया के शुरुआत से ही विरोधी रहे हैं और उनका पक्का मानना है कि यह नागरिकों पर एनआरसी थोपने का एक परोक्ष तरीका है। उनके इस बयान के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है।
अपने बयानों के लिए हमेशा चर्चा में रहने वाले ओवैसी ने हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगाए। उन्होंने कहा कि हालांकि अदालत स्तर पर इस मामले में जो भी निर्णय आए, उनका सम्मान किया जाता है, लेकिन जिस तरह से जमीनी स्तर पर आम आदमी को परेशान किया जा रहा है, वह किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। ओवैसी का आरोप है कि इस पूरी कवायद के पीछे की मंश पर सवाल उठना लाजिमी है क्योंकि इससे आम नागरिकों की नागरिकता को लेकर अनावश्यक संदेह पैदा किया जा रहा है।
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चुनाव आयोग के भीतर आंतरिक मतभेदों पर उठाए गंभीर सवाल
ओवैसी ने केवल नीतिगत फैसलों तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने के तौर-तरीकों पर भी सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए। मीडिया में आई कुछ हालिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि देश के नागरिकों को यह जानने का पूरा हक है कि आयोग के भीतर अहम फैसले किस प्रकार लिए जा रहे हैं। क्या ये सभी निर्णय सर्वसम्मति से हुए हैं या फिर बहुमत के आधार पर?
सांसद ओवैसी ने विशेष तौर पर दो चुनाव आयुक्तों की तरफ से दर्ज कराई गई आपत्तियों का जिक्र किया। मीडिया रिपोर्ट्स का दावा है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान चुनाव आयोग के अंदर विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग राय सामने आई थी और कुछ सदस्यों ने रिकॉर्ड पर अपनी आपत्तियां भी दर्ज की थीं। इस बात को उठाते हुए ओवैसी ने सवाल किया कि यदि महत्वपूर्ण फैसले बिना पूर्ण सहमति या स्पष्ट बहुमत के लिए गए हैं, तो उनकी कानूनी वैधता और स्थिति क्या होगी? इस तरह के मामलों में पारदर्शिता बरती जानी बेहद जरूरी है ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर किसी भी प्रकार का दाग न लगे।
दस्तावेजों की तलाश में भटक रहे गरीब और मजदूर वर्ग
एसआईआर प्रक्रिया की व्यावहारिक कठिनाइयों का जिक्र करते हुए ओवैसी ने कहा कि इस अभियान की वजह से समाज के सबसे कमजोर तबके—विशेषकर गरीबों और मजदूरों—पर बहुत बड़ा मानसिक और आर्थिक बोझ पड़ गया है। लोगों को अपने पुरखों के पुराने दस्तावेज ढूंढने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कई परिवारों के पास दशकों पुराने कागजात सुरक्षित नहीं होते, ऐसे में उनका नाम मतदाता सूची से कटने का खतरा मंडराने लगता है।
उन्होंने आगे कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने रिकॉर्ड नहीं मिलते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों की मैपिंग किस आधार पर तय की जाएगी? यह एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल है जिसका जवाब संबंधित अधिकारियों के पास नहीं है। लोग अपनी रोजमर्रा की रोजी-रोटी छोड़कर केवल कागजात जुटाने में लगे हुए हैं, जो कि न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
"मैं शुरुआत से ही एसआईआर के खिलाफ रहा हूं और मेरा मानना है कि यह सब पिछले दरवाजे से एनआरसी लागू करने की एक सोची-समझी साजिश है। इस प्रक्रिया से देश के गरीबों और जरूरतमंदों पर बहुत बड़ा संकट आ गया है जिन्हें अपने हक के लिए बेवजह संघर्ष करना पड़ रहा है।" — असदुद्दीन ओवैसी, सांसद एवं एआईएमआईएम प्रमुख
ऑनलाइन प्रक्रियाओं और जमीनी हकीकत का अंतर
तेलंगाना राज्य का विशेष उदाहरण देते हुए ओवैसी ने बताया कि वहां स्थानीय स्तर पर इस प्रक्रिया को लागू करने में भारी व्यावहारिक अड़चनें आ रही हैं। राज्य में न तो पहले कभी एनआरसी जैसी कोई प्रक्रिया हुई है और न ही यहां स्थायी निवास प्रमाण पत्र बनवाने की वैसी परंपरा रही जैसी अन्य जगहों पर है। ऐसे हालात में अचानक से दशकों पुराने सरकारी रिकॉर्ड मांगना आम जनता के लिए किसी सजा से कम नहीं है।
डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन सिस्टम पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक तरफ तो बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को घर-घर जाकर लोगों को नोटिस थमाने और दस्तावेज इकट्ठा करने का काम सौंपा गया है, वहीं दूसरी तरफ इस विशालकाय डेटा को ऑनलाइन संभालने के दावे किए जा रहे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि बुनियादी ढांचे के अभाव में इतने बड़े पैमाने पर इस प्रक्रिया को त्रुटिरहित ढंग से पूरा करना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है।
नियुक्ति प्रक्रिया और संस्थागत विश्वसनीयता पर चिंता
अपने संबोधन के अंत में ओवैसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के चयन तथा नियुक्ति की वर्तमान प्रक्रिया को लेकर भी अपनी चिंताएं खुलकर जाहिर कीं। उन्होंने याद दिलाया कि जब संसद में इस नियुक्ति से जुड़ा नया विधेयक लाया गया था, तभी उन्होंने इसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए थे। उनका मानना है कि जब तक चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं की चयन प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और संदेह से परे नहीं होगी, तब तक जनता का उन पर अटूट विश्वास बनाए रखना कठिन होगा। एसआईआर का यह पूरा प्रकरण एक बार फिर इस बात की ओर इशारा करता है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं को आम आदमी के अधिकारों की रक्षा करते समय उनकी व्यावहारिक परेशानियों का पूरा ध्यान रखना चाहिए।









