नई दिल्ली और देश के कई प्रमुख कृषि राज्यों से इस समय एक बड़ी खबर सामने आ रही है। मंडियों में किसानों द्वारा लाई गई धान की फसल के लिए पर्याप्त जगह नहीं बची है। भारी पैदावार के बाद गोदामों में जगह कम पड़ गई है। पिछले कुछ दिनों से गूगल ट्रेंड्स पर भी 'धान्य निल्वा' यानी धान भंडारण का मुद्दा काफी खोजा जा रहा है। किसान और व्यापारी दोनों ही इस बात से परेशान हैं कि उनकी मेहनत से उगाई गई फसल खुले आसमान के नीचे खराब हो सकती है।
स्थानीय मंडियों का हाल यह है कि वहां पैर रखने की जगह नहीं बची है। किसानों ने अपनी बोरियों को तिरपाल से ढक कर रखा है ताकि बारिश या ओस से फसल गीली न हो। भारतीय खाद्य निगम और राज्य सरकारों के गोदाम पहले से ही भरे हुए हैं। पुराना अनाज पूरी तरह बाहर नहीं भेजा गया है, जिस कारण नए धान के आने पर रखने की समस्या पैदा हो गई है। किसान पिछले कई दिनों से मंडियों के चक्कर काट रहे हैं और अपनी फसल बिकने या गोदामों तक पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं।
खुले आसमान के नीचे क्यों सड़ रही है किसानों की मेहनत?
अधिकारी इस समस्या के पीछे मालगाड़ियों की कमी और परिवहन की धीमी गति को मुख्य कारण मान रहे हैं। एक राज्य से दूसरे राज्य में अनाज भेजने के लिए समय पर ट्रेनें या ट्रक नहीं मिल पा रहे हैं। इस वजह से पुराना अनाज समय पर गोदामों से बाहर नहीं निकल पा रहा है। जब तक पुराना अनाज बाहर नहीं जाएगा, तब तक नए धान को रखने के लिए जगह नहीं बनेगी। प्रशासन अब युद्ध स्तर पर इस प्रक्रिया को तेज करने की बात कह रहा है, ताकि मंडियों को जल्द से जल्द खाली कराया जा सके।
किसानों का कहना है कि वे अपनी फसल को औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर हो रहे हैं क्योंकि उनके पास रखने की कोई सुरक्षित जगह नहीं है। अगर वे फसल को लंबे समय तक मंडी में रखेंगे, तो नमी के कारण अनाज का रंग उड़ जाएगा और उसका वजन भी कम हो जाएगा। इस स्थिति का फायदा बिचौलिए उठा रहे हैं जो किसानों से कम कीमत पर धान खरीद रहे हैं। किसानों की मांग है कि सरकार तुरंत नए भंडारण केंद्रों की व्यवस्था करे और हर एक दाने की खरीद सुनिश्चित करे।
सरकार और प्रशासन का क्या है अगला कदम?
खाद्य मंत्रालय के अधिकारियों ने स्थिति का जायजा लेना शुरू कर दिया है। जिन राज्यों में यह समस्या सबसे गंभीर है, वहां अतिरिक्त अस्थायी गोदाम बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा निजी वेयरहाउस मालिकों से भी मदद मांगी जा रही है ताकि अनाज को सुरक्षित रखा जा सके। रेलवे से भी अनुरोध किया गया है कि वे अनाज ढोने के लिए विशेष रैक की संख्या बढ़ाएं। सरकार का दावा है कि आने वाले कुछ हफ्तों में इस स्थिति पर पूरी तरह काबू पा लिया जाएगा।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब जमीनी स्तर पर जाकर हालात का जायजा लिया, तो पाया कि कई जगहों पर अब भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। किसानों को अपनी बारी का इंतजार करने के लिए कई-कई दिन तक मंडियों में ही रुकना पड़ रहा है। उनके खाने-पीने और रहने की उचित व्यवस्था भी कई मंडियों में नदारद है। यह संकट केवल एक राज्य का नहीं बल्कि देश के कई धान उत्पादक राज्यों की साझा समस्या बन चुका है।
भविष्य में इस संकट से निपटने के लिए क्या तैयारी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी कृषि भंडारण क्षमता में भारी सुधार करने की जरूरत है। पारंपरिक गोदामों की जगह आधुनिक साइलो यानी स्टील की बड़ी टंकियां बनानी होंगी, जहां अनाज लंबे समय तक सुरक्षित रह सके। यदि समय रहते पुख्ता कदम नहीं उठाए गए, तो हर साल सीजन के समय किसानों को इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। सरकार अब आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दे रही है ताकि फसल की बर्बादी को रोका जा सके।



