'द फ्रीलान्स' की विशेष खोजी रिपोर्ट। वैश्विक कूटनीति के पटल पर एक बार फिर पाकिस्तान की विदेश नीति और आंतरिक विरोधाभास खुलकर सामने आ रहे हैं। इस्लामाबाद से मिल रही फील्ड रिपोर्ट और रणनीतिक विश्लेषकों के इनपुट के मुताबिक, पाकिस्तानी रक्षा मंत्रालय द्वारा यमन के हूती विद्रोहियों को लेकर दिए गए हालिया कड़े बयानों ने मध्य पूर्व के सामरिक समीकरणों में हलचल मचा दी है। एक तरफ जहां पाकिस्तान खुद को आर्थिक संकट से उबारने के लिए खाड़ी देशों की सद्भावना हासिल करने की फिराक में है, वहीं दूसरी तरफ उसकी घरेलू मोर्चरी लगातार कमजोर होती जा रही है।
सऊदी-हूती संघर्ष और पाकिस्तानी सेना की संभावित भूमिका
रक्षा गलियारों से छनकर आ रही खबरों के अनुसार, पाकिस्तानी नेतृत्व ने हूतियों के खिलाफ स्पष्ट शब्दों में रुख अख्तियार किया है। जानकारों का मानना है कि 'सऊदी का दुश्मन, पाकिस्तान का दुश्मन' जैसी बयानबाजी केवल कूटनीतिक कड़े तेवर दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सामरिक निहितार्थ गहरे हैं। क्या जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना वास्तव में इस सुदूर मरुस्थलीय संघर्ष में सीधी सैन्य भागीदारी का जोखिम उठाएगी? यह सवाल वर्तमान में वाशिंगटन से लेकर रियाद तक कूटनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है।
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PoK का सुलगता मैदान और मुनीर-शहबाज सरकार को चुनौती
एक तरफ जहां इस्लामाबाद वैश्विक मंचों पर अपनी धाक जमाने की कोशिश कर रहा है, वहीं गुलाम कश्मीर (PoK) की जमीन पर हालात बिल्कुल उलट हैं। स्थानीय प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी हुक्मरानों को सीधी और आर-पार की चुनौती देते हुए ऐलान कर दिया है कि अब PoK आने के लिए भी पाकिस्तानियों को वीजा लेना होगा। फील्ड से मिल रही रिपोर्ट्स बताती हैं कि मुनीर-शहबाज सरकार के खिलाफ जनता का आक्रोश चरम पर है, जिसे दबाने के लिए प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं।
सिंधु जल संधि और 'पानी को हथियार बनाने' का पाकिस्तानी राग
क्षेत्रीय तनाव के बीच, जल कूटनीति (Water Diplomacy) पर भी इस्लामाबाद का पुराना और घिसा-पिसा रोना जारी है। सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर एक बार फिर पाकिस्तानी खेमे से जहर उगला गया है और भारत पर पानी को हथियार बनाने का बेबुनियाद आरोप मढ़ा गया है। अंतरराष्ट्रीय जल विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू विफलताओं से जनता का ध्यान भटकाने के लिए पाकिस्तान अक्सर इस तरह के जल-विवादों को तूल देता रहता है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ कूटनीतिक हथकंडे
केवल पानी ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक मोर्चे पर भी पाकिस्तान की छटपटाहट जगजाहिर हो चुकी है। हाल ही में भारत के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का दरवाजा खटखटाना इसी रणनीति का हिस्सा था। इस्लामाबाद का मुख्य उद्देश्य किसी तरह मोदी सरकार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव डलवाना है, हालांकि वैश्विक मंचों पर उसे हर बार की तरह इस बार भी निराशा ही हाथ लगी है। वाशिंगटन ने भी हाल ही में स्पष्ट किया है कि अमेरिकी रुख में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है, जिससे पाकिस्तान की कूटनीतिक जमीन और दरक गई है।
'द फ्रीलान्स' का निष्कर्ष यह है कि पाकिस्तान इस समय दोहरी मार झेल रहा है—एक तरफ मध्य पूर्व के युद्धों में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की मजबूरी, और दूसरी तरफ PoK से लेकर आर्थिक मोर्चे तक अंदरूनी बगावत। मुनीर सेना के लिए यह दौर अत्यंत संवेदनशील और परीक्षा की घड़ी है।








