देश के कृषि भूभाग पर इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी छाई हुई है। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान जब हमने उत्तर प्रदेश से लेकर झारखंड और बिहार के ग्रामीण इलाकों की टोह ली, तो खाद बाजारों की तस्वीर बेहद उलझी हुई नजर आई। एक तरफ जहां प्रशासनिक रिपोर्टों में गोदामों में यूरिया के भरपूर स्टॉक होने का दावा किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ खुले बाजार में बढ़ती कीमतें किसानों की कमर तोड़ रही हैं। उर्वरक संकट का यह चक्रव्यूह आखिर कैसे बुना गया है, इसकी तह तक जाना बेहद जरूरी हो गया है।
प्रशासनिक दावे बनाम ज़मीनी हकीकत: क्या वाकई यूरिया की कमी है?
गोरखपुर और आसपास के जिलों से लेकर कई अन्य क्षेत्रों से प्रशासन के कड़े दावे सामने आ रहे हैं कि जिलों में यूरिया की कोई कमी नहीं है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, निर्धारित लक्ष्य का 90 प्रतिशत से अधिक यूरिया किसानों के बीच वितरित किया जा चुका है। जिला प्रशासन के अनुसार, हाल ही में 15 हजार मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध कराया गया है और आने वाले दो-तीन दिनों में 2500 मीट्रिक टन डीएपी की अतिरिक्त खेप भी पहुंचने वाली है। इसके बावजूद, स्थानीय स्तर पर किसानों की लंबी कतारें और खाद के लिए मारामारी प्रशासनिक दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। कागजी आंकड़ों और खेत की वास्तविक जरूरत के बीच का यह अंतर संकट को और गहरा कर रहा है।
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अंतरराष्ट्रीय बाजार का दबाव और ₹3 लाख करोड़ की सब्सिडी का बोझ
यह केवल स्थानीय आपूर्ति का मामला नहीं है, बल्कि इसके तार वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल के चलते देश में उर्वरक सब्सिडी का बोझ अब 3 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को छूने की कगार पर पहुंच गया है। आंकड़ों के मुताबिक, यूरिया की वास्तविक लागत और खुदरा मूल्य में भारी अंतर आ चुका है, और कुछ रिपोर्ट्स में तो कीमतों में 106% तक की बढ़ोतरी का अनुमान जताया गया है। वहीं, किसानों के बीच सबसे लोकप्रिय उर्वरक डीएपी (Diammonium Phosphate) की एक बोरी अब खुले बाजार में ₹3500 के पार निकल चुकी है। सरकार भले ही किसानों को भारी-भरकम सब्सिडी के जरिए राहत देने का प्रयास कर रही हो, लेकिन बढ़ते वित्तीय घाटे के कारण यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ कैसे रह पाएगी, यह एक बड़ा नीतिगत सवाल है।
औद्योगिक मोर्चे पर नई उम्मीदें: सिंदरी का कोयला आधारित अमोनिया-यूरिया प्लांट
इस संकट के बीच दीर्घकालिक समाधान के रूप में घरेलू उत्पादन क्षमता को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी कड़ी में झारखंड के सिंदरी में एक नए कोयला आधारित अमोनिया और यूरिया प्लांट को स्थापित करने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है। यदि यह प्रोजेक्ट समय पर धरातل पर उतरता है, तो देश की निर्भरता आयात पर कम होगी और घरेलू स्तर पर यूरिया की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी। हालांकि, इस तरह के बड़े औद्योगिक संयंत्रों को पूरी तरह से शुरू होने में अभी वक्त लगेगा, और तब तक तात्कालिक संकट से निपटने के लिए वैकल्पिक उपायों की सख्त जरूरत है।
रासायनिक खादों का 'देसी तोड़': जीवामृत और घन जीवामृत की ओर लौटते कदम
महंगे डीएपी और यूरिया के इस मायाजाल से तंग आकर देश का एक वर्ग अब अपनी पारंपरिक जड़ों की ओर लौट रहा है। कृषि विशेषज्ञों और प्रगतिशील किसानों ने इसका एक अचूक 'देसी तोड़' ढूंढ निकाला है—घर पर तैयार किया जाने वाला 'जीवामृत' और 'घन जीवामृत'। कम लागत में बनने वाला यह जैविक फॉर्मूला न केवल मिट्टी की सेहत को सुधार रहा है, बल्कि रासायनिक खादों पर किसानों की निर्भरता को भी तेजी से कम कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इन देसी नुस्खों से बंपर पैदावार मिलने के दावे किसानों के बीच नई उम्मीद जगा रहे हैं।
निष्कर्ष: संकट के मुहाने पर भारतीय कृषि
यूरिया और डीएपी का यह वर्तमान संकट महज खाद की कमी का नहीं, बल्कि हमारी कृषि नीति और अर्थव्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन का समय है। एक तरफ जहां तात्कालिक आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने की चुनौती सरकार के सामने है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जैविक विकल्पों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना होगा। जब तक नीति निर्माताओं और किसानों के बीच की यह खाई पटती नहीं, तब तक देश के अन्नदाता को हर फसल के सीजन में इसी तरह संघर्ष करना पड़ेगा।








