संयुक्त राष्ट्र के मंच पर छलका पाकिस्तानी नेतृत्व का डर
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अक्सर भारत के खिलाफ बयानबाजी करने वाला पाकिस्तान इस बार पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में नजर आया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र के दौरान दिए गए संबोधन में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कूटनीतिक रूप से अमेरिका की चापलूसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके पूरे भाषण में भारतीय सेना द्वारा की गई निर्णायक कार्रवाई का खौफ साफ तौर पर महसूस किया जा रहा था। कूटनीति के जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ महीनों में क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में आए भारी बदलाव के बाद पड़ोसी देश का शीर्ष नेतृत्व दबाव में है।
अपने लगभग 23 मिनट लंबे संबोधन के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने बार-बार अमेरिकी राष्ट्रपति के समय पर हस्तक्षेप का जिक्र किया। उनका दावा था कि वाशिंगटन के कूटनीतिक प्रयासों के कारण दक्षिण एशिया में एक बड़े संघर्ष को टालने में मदद मिली। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि यह केवल घरेलू राजनीतिक जमीन बचाने और वैश्विक सहानुभूति हासिल करने का एक असफल प्रयास मात्र था, क्योंकि हकीकत में भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय लेता है।
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ऑपरेशन सिंदूर और क्षेत्रीय सुरक्षा का नया समीकरण
इस पूरे कूटनीतिक ड्रामे के केंद्र में वह सैन्य कार्रवाई है जो कुछ समय पहले सीमा पार आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के लिए शुरू की गई थी। पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले के बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि अब आतंकवाद के खिलाफ किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उस जवाबी कार्रवाई के बाद से ही पाकिस्तानी हुक्मरानों की नींद उड़ी हुई है और वे लगातार अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की गुहार लगा रहे हैं।
सैन्य रणनीतिकारों के अनुसार, भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह अपनी धरती और नागरिकों की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने में सक्षम है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रतिष्ठित मंच पर भी पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री को अपनी रक्षा के लिए बाहरी ताकतों की दुहाई देनी पड़ी। भारतीय कूटनीति का यह बड़ा असर है कि आज दुनिया का हर मंच आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के सख्त रुख को भली-भांति समझ रहा है।
सिंधु जल संधि और कूटनीतिक दबाव की नई परतें
अपने भाषण में पाकिस्तानी पीएम ने केवल राजनीतिक मुद्दों को ही नहीं उठाया, बल्कि सिंधु जल संधि के निलंबन को लेकर भी अपनी चिंताएं छिपाई नहीं रखीं। पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने कड़े कदम उठाते हुए इस संधि को स्थगित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। नई दिल्ली का रुख बिल्कुल स्पष्ट है कि जब तक सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद पूरी तरह और हमेशा के लिए बंद नहीं होता, तब तक सामान्य द्विपक्षीय संबंधों या समझौतों की बहाली संभव नहीं है।
इस आर्थिक और कूटनीतिक दबाव ने पड़ोसी देश की अर्थव्यवस्था और जल प्रबंधन प्रणालियों को गहरी चोट पहुंचाई है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र के मंच से लगातार कूटनीतिक चैनलों को फिर से खोलने की गुहार लगाई जा रही है। भारत ने हमेशा शांति का संदेश दिया है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह का समझौता न करने की अपनी नीति पर वह पूरी दृढ़ता के साथ कायम है।
कश्मीर राग और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का करारा जवाब
परंपरागत रूप से पाकिस्तान हर वैश्विक मंच पर कश्मीर का राग अलापता रहा है, और इस बार भी अपवाद नहीं दिखा। हालांकि, वैश्विक समुदाय अब इन पुरानी और बेबुनियाद बातों पर अधिक ध्यान नहीं देता है। भारत ने हमेशा की तरह इस दुष्प्रचार का कड़ा और तार्किक प्रतिकार करने की पूरी तैयारी कर रखी है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के युवा राजनयिक अपनी परंपरा के अनुसार इस खोखले प्रोपेगेंडा की धज्जियां उड़ाने के लिए तैयार रहते हैं।
"भारत का रुख पूरी तरह से स्पष्ट और अडिग है कि जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद किए बिना किसी भी प्रकार की सार्थक बातचीत संभव नहीं है।" — कूटनीतिक विशेषज्ञ, नई दिल्ली
भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि वैश्विक मंचों का उपयोग अपने आंतरिक राजनीतिक संकटों से ध्यान भटकाने के लिए करना पाकिस्तान की पुरानी आदत बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी अब इस दोहरे चरित्र को अच्छी तरह पहचान चुका है। वैश्विक आतंकवाद के मुख्य केंद्र के रूप में पहचाने जाने वाले देश के प्रधानमंत्री जब शांति का पाठ पढ़ाने का प्रयास करते हैं, तो उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
पश्चिम एशिया के मुद्दों का राजनीतिक इस्तेमाल
अपने संबोधन को लंबा खींचने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव का भी जिक्र किया। उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि उनका देश क्षेत्रीय शांति स्थापित करने में एक बड़ा मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। हालांकि, कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन देशों की अपनी अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था चरमराई हुई हो, वे दूसरों के मामलों में मध्यस्थता करने की केवल दिखावटी बातें ही कर सकते हैं।
इस तरह के बयानों का असल मकसद केवल पश्चिमी देशों को यह जताना होता है कि वे अभी भी प्रासंगिक हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वैश्विक कूटनीति में पाकिस्तान का वजन लगातार कम होता जा रहा है। भारत के बढ़ते आर्थिक और सामरिक रसूख के सामने इस तरह के राजनीतिक भाषण अब अपनी चमक खो चुके हैं। भविष्य में भी भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के हितों को सर्वोपरि रखते हुए हर चुनौती का डटकर मुकाबला करता रहेगा।







