हिंदी सिनेमा और गजल की दुनिया में जब भी दिग्गज कलाकारों की बात होती है, तो पंकज उधास का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। उनकी आवाज में एक ऐसा जादू था, जो सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाता था। 'चिट्ठी आई है' और 'आहिस्ता कीजिए बातें' जैसे अनगिनत सदाबहार गाने देने वाले पंकज उधास ने अपनी गायकी से महफिलों की शान बढ़ाई। उन्होंने न सिर्फ गजलों को आम आदमी तक पहुंचाया, बल्कि हिंदी फिल्मों के लिए ऐसे रूमानी और दर्दभरे गीत गाए, जिनकी भाषा भले ही बेहद सरल थी, लेकिन उनका असर सीधा दिल पर होता था। आज हम आपको एक ऐसे ही भुला-बिसरे और कलेजा चीर देने वाले गाने के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आज भी पुराने दिनों की याद ताजा कर देता है।
साल 1993 का वह दौर जब गजलें थीं दिलों की धड़कन
नब्बे का दशक भारतीय संगीत और सिनेमा के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दौर में प्रेम कहानियों के साथ-साथ दर्द और जुदाई को बयां करने वाले गानों का भी बोलबाला था। साल 1993 में रिलीज हुई फिल्म 'फिर तेरी याद आई' (Phir Yaad Teri Aayi) ने बॉक्स ऑफिस पर भले ही औसत प्रदर्शन किया हो, लेकिन इसका संगीत आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है। इस फिल्म का एक गाना 'दिल देता है रो रो दुहाई' (Dil Deta Hai Ro Ro Duhai) आज भी उन लोगों के दिलों को चीर देता है, जिन्होंने कभी सच्चे प्यार में जुदाई का दर्द झेला है।
इस गाने को अपनी रूहानी आवाज से सजाने वाले पंकज उधास थे। उनके गाने की खूबी यही थी कि वे शब्दों को सिर्फ गाते नहीं थे, बल्कि उन्हें महसूस कराते थे। इस गाने के बोल जाने-माने शायर कतील शिफाई ने लिखे थे, जबकि इसका संगीत मशहूर संगीतकार अनु मलिक ने तैयार किया था। जब ये तीनों दिग्गज किसी प्रोजेक्ट के लिए साथ आते थे, तो एक जादुई रचना का जन्म होता था। इस गाने के हर एक शब्द में एक ऐसे इंसान की बेबसी साफ झलकती है, जो अपने किसी अपने से बिछड़ चुका है या जिसे मोहब्बत में धोखा मिला है।
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फिल्म की कहानी और राहुल रॉय-पूजा भट्ट की जोड़ी
यह गाना सिर्फ ऑडियो या वीडियो तक सीमित नहीं था, बल्कि यह फिल्म की मूल भावना से गहराई से जुड़ा हुआ था। 'फिर तेरी याद आई' फिल्म की कहानी भी अपने समय के हिसाब से काफी अलग और इमोशनल थी। फिल्म में नब्बे के दशक के रोमांटिक हीरो राहुल रॉय और अभिनेत्री पूजा भट्ट की मुख्य जोड़ी नजर आई थी। राहुल रॉय ने फिल्म में राहुल नाम के एक ऐसे शराबी फिल्म निर्देशक का किरदार निभाया था, जिसकी जिंदगी में ठहराव तब आता है जब उसे मानसिक रूप से बीमार पूजा से प्यार हो जाता है।
कहानी में दिलचस्प और दर्दनाक मोड़ तब आता है जब दोनों की मुलाकात एक रिहैबिलिटेशन सेंटर में होती है। पूजा की गंभीर मानसिक अस्थिरता के कारण उनका यह रिश्ता मुकम्मल नहीं हो पाता और दोनों की राहें जुदा हो जाती हैं। यह अधूरापन और कसक इस फिल्म के हर एक दृश्य में दिखाई देती है। जब पर्दे पर राहुल रॉय की बेबसी के साथ पंकज उधास की यह गजल बजती है, तो दर्शकों की आंखें नम हुए बिना नहीं रहती हैं।
इश्क की शिड्दत और जुदाई का कभी न खत्म होने वाला सफर
एक लाइन में अगर इस गाने के सार को समझा जाए, तो यह गीत एक ऐसे टूटे हुए दिल की पुकार है जो यह सिखाता है कि इश्क की राहों में जितनी शिददत होती है, जुदाई का सफर उतना ही लंबा और दर्दनाक साबित होता है। आज के दौर में जब रील्स और फास्ट म्यूजिक का जमाना है, तब भी ऐसे क्लासिक गाने लोगों को सुकून और ठहराव देते हैं। जब कोई इंसान पुरानी यादों में खो जाता है, तो इस तरह की गजलें उसके आंसुओं को पोंछने का काम करती हैं।
"जब कभी जिंदगी की भागदौड़ से थककर इंसान अकेला बैठता है, तो ऐसे नगमे उसे उसकी पुरानी यादों और बीते हुए पलों से दोबारा जोड़ देते हैं। यही संगीत की असली ताकत है।" — संगीत समीक्षक
क्यों आज भी प्रासंगिक हैं पंकज उधास के गाए नगमे
पंकज उधास हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी गाई हुई गजलें आज भी अमर हैं। आज की युवा पीढ़ी भले ही पार्टी सॉन्ग्स और रैप की दीवानी हो, लेकिन जब दिल टूटने की बारी आती है, तो वे आज भी उन्हीं पुरानी धुनों और गजलों का सहारा लेते हैं। 'दिल देता है रो रो दुहाई' जैसी रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि कला और संगीत कालजयी होते हैं। वे समय की सीमाओं से परे जाकर सीधे रूह को छूते हैं और यही वजह है कि तीन दशक बाद भी इन गानों की चमक फीकी नहीं पड़ी है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि यह गजल सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि एक अहसास है। यह उन तमाम लोगों की दास्तां है जिन्होंने किसी अपने को खोया है या जुदाई का दर्द सहा है। पंकज उधास की आवाज का जादू और कतील शिफाई के अल्फाज मिलकर इस गाने को हमेशा के लिए अमर बना गए हैं।






