नई दिल्ली से हमारी विशेष ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार इस महीने संसद का एक विशेष सत्र बुलाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस संभावित सत्र का मुख्य एजेंडा लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना और नया परिसीमन बिल पेश करना हो सकता है। देश की राजनीतिक राजधानी में पिछले कुछ दिनों से बैठकों का दौर लगातार तेज हो गया है और हर कोई इस संभावित कदम के नफे-नुकसान का आंकलन कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में देखें तो सरकार लंबे समय से देश के प्रशासनिक ढांचे और चुनावी भूगोल में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही थी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि इस मामले में और देरी की जाती है, तो आगामी चुनावों और खासकर साल 2029 की समयसीमा के भीतर इसे लागू करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इसी चुनौती से पार पाने के लिए सरकार अब बिना किसी और देरी के तेजी से आगे बढ़ने का मन बना चुकी है।
परिसीमन बिल और महिला आरक्षण की राह
महिला आरक्षण कानून और परिसीमन की प्रक्रिया आपस में बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं। सरकार की योजना है कि पचास प्रतिशत या उससे जुड़े अन्य बदलावों को ध्यान में रखते हुए इस बिल को संसद में कानूनी जामा पहनाया जाए। सूत्रों का कहना है कि इस विशेष सत्र के जरिए सरकार इन सभी अटके हुए मुद्दों को एक साथ साधने की बड़ी रणनीति पर काम कर रही है ताकि आने वाले समय में चुनावी प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी हो सके।
संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठकों में भी इन तमाम मुद्दों की गूंज साफ सुनाई दी थी। इन बैठकों में करीब चालीस से अधिक राजनीतिक दलों के नेता शामिल हुए थे, जहां सरकार ने अपने भावी एजेंडे के संकेत दे दिए थे। हालांकि, विपक्ष और क्षेत्रीय दलों की अपनी चिंताएं हैं, जिन्हें दूर करने के लिए सत्तारूढ़ दल के नेता लगातार प्रयास कर रहे हैं ताकि सदन में बिल पास कराते समय आम सहमति बन सके।
क्षेत्रीय दलों को साधने की राजनीतिक कवायद
दक्षिण भारत और देश के अन्य हिस्सों के क्षेत्रीय दल, विशेष रूप से द्रमुक यानी डीएमके, परिसीमन के संभावित असर को लेकर खासे सतर्क हैं। उनका मानना है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर बेहतर काम किया है, उनकी लोकसभा सीटें कम हो सकती हैं। इन सभी आशंकाओं और राजनीतिक विरोध के सुरों को शांत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी और सरकार के शीर्ष नेता छोटे दलों के साथ लगातार संपर्क साध रहे हैं और उन्हें विश्वास में लेने की कोशिश कर रहे हैं।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल बताती है कि यदि यह विशेष सत्र वास्तव में इस महीने बुलाया जाता है, तो यह देश की मौजूदा राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। प्रशासनिक हलकों में फाइलों का मूवमेंट अचानक तेज हो गया है और सुरक्षा से लेकर संसदीय कार्य मंत्रालय तक सभी विभागों को सतर्क रहने के निर्देश मिल चुके हैं। अब देखना यह होगा कि सरकार आधिकारिक तौर पर इस विशेष सत्र की तारीखों का ऐलान कब करती है।
भविष्य की राजनीतिक चुनौतियां और तैयारी
संसद के इस संभावित विशेष सत्र के आने से पहले ही दिल्ली के सियासी गलियारों में सुगबुगाहट चरम पर है। सत्ता पक्ष के रणनीतिकार हर एक पहलू पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं ताकि किसी भी अप्रत्याशित विरोध से निपटा जा सके। आने वाले कुछ दिन देश की सियासत और चुनाव सुधारों की दिशा तय करने में बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं, जिन पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी।





