महिला स्वास्थ्य के जानकारों के अनुसार, मासिक धर्म का समय पर आना शारीरिक सेहत का एक बड़ा पैमाना माना जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि शरीर का हार्मोनल तंत्र सुचारू रूप से काम कर रहा है। यही वजह है कि जब पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी PCOS से जूझ रही महिलाओं को नियमित रूप से पीरियड्स आने शुरू होते हैं, तो उन्हें राहत मिलती है कि उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है। बहुत सी महिलाएं इस भ्रम में रहती हैं कि नियमित माहवारी का मतलब अब गर्भधारण करना बहुत आसान होगा। लेकिन सच इसके विपरीत है और केवल रेगुलर पीरियड्स होना ही प्रेग्नेंसी की पूरी संभावना तय नहीं करता है।
देश की जानी-मानी गायनेकोलॉजिस्ट और आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ. शोभा गुप्ता बताती हैं कि नियमित पीरियड्स इस बात की पुख्ता गवाही नहीं देते कि महिला की प्रजनन क्षमता भी पूरी तरह दुरुस्त है। PCOS की जटिल स्थिति में शरीर के भीतर इंसुलिन का स्तर बढ़ने और पुरुष हार्मोन यानी एंड्रोजन के सक्रिय होने से एग्स यानी अंडे ठीक से परिपक्व होकर रिलीज नहीं हो पाते हैं, भले ही गर्भाशय की परत टूटने के कारण ब्लीडिंग तय समय पर हो रही हो। ऐसे में गर्भधारण करना एक बड़ी चुनौती बन जाता है और महिलाओं को डॉक्टर की मदद लेनी पड़ती है।
बिना अंडा रिलीज हुए भी हो सकती है ब्लीडिंग, जानिए क्या है अनऑव्यूलेटरी चक्र का पूरा सच
चिकित्सक विज्ञान के अनुसार, PCOS से पीड़ित महिलाओं में कई बार बिना ओव्यूलेशन के भी पीरियड्स आने की समस्या देखी जाती है। इसे आसान भाषा में समझें तो शरीर के भीतर अंडाशय से कोई एग बाहर नहीं निकलता है, फिर भी गर्भाशय की अंदरूनी परत यानी एंडोमेट्रियम के विकसित होकर स्वतः झड़ने से ब्लीडिंग शुरू हो जाती है। चूंकि इस पूरी प्रक्रिया में कोई फर्टिलाइज होने योग्य अंडा मौजूद ही नहीं होता, इसलिए गर्भधारण की संभावना शून्य हो जाती है। मेडिकल शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि अनऑव्यूलेटरी सबफर्टिलिटी महिलाओं में इनफर्टिलिटी का एक बहुत बड़ा कारण बनती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक इस छिपी हुई समस्या यानी बिना ओव्यूलेशन के ब्लीडिंग होने के चक्र को मेडिकल मदद से ठीक नहीं किया जाता, तब तक सिर्फ कैलेंडर देखकर पीरियड्स ट्रैक करने से कोई फायदा नहीं होता। महिलाओं को यह समझना होगा कि उनका शरीर किस आंतरिक हार्मोनल बदलाव से गुजर रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जनरल्स में भी यह बात सामने आ चुकी है कि PCOS के मामलों में पारंपरिक संकेतों के अलावा अंदरूनी बायोलॉजिकल एक्टिविटी को समझना बेहद जरूरी है।
"रेगुलर पीरियड्स का मतलब प्रजनन क्षमता भी सही हो, यह जरूरी नहीं है। PCOS की स्थिति में हार्मोनल असंतुलन, जैसे उच्च इंसुलिन और एंड्रोजन के कारण एग्स रिलीज नहीं होते हैं, लेकिन ब्लीडिंग होती है। ऐसे में महिला के लिए कंसीव करना किसी चुनौती से कम नहीं है।"
— डॉ. शोभा गुप्ता, गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट
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हार्मोनल असंतुलन और इंसुलिन रेजिस्टेंस का सीधा असर अंडे की गुणवत्ता पर
PCOS मूल रूप से एक मेटाबोलिक और हार्मोनल विकार है, जिसमें शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता है। इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। इसके चलते रक्त में इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है, जो अंडाशय को अधिक मात्रा में एंड्रोजन यानी पुरुष हार्मोन पैदा करने के लिए प्रेरित करता है। यह बढ़ा हुआ एंड्रोजन हार्मोन विकसित हो रहे अंडों को समय से पहले ही नष्ट कर देता है या उनकी क्वालिटी को बेहद कमजोर कर देता है। यही कारण है कि पीरियड्स भले ही नियमित आएं, लेकिन खराब क्वालिटी के एग्स के कारण वे फर्टिलाइज नहीं हो पाते हैं।
इसके अलावा, यह हार्मोनल उतार-चढ़ाव गर्भाशय की सेहत को भी भारी नुकसान पहुंचाता है। गर्भाशय की अंदरूनी दीवार यानी एंडोमेट्रियम इतनी मजबूत नहीं रह पाती कि वह फर्टिलाइज्ड एम्ब्रियो को सुरक्षित रूप से अपने साथ चिपका सके या इम्प्लांट कर सके। इस प्रकार, गर्भधारण की राह में एक के बाद एक कई जैविक रुकावटें खड़ी हो जाती हैं।
कंसीव करने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए एक्सपर्ट्स के खास सुझाव
यदि आप PCOS से ग्रसित हैं और मातृत्व सुख प्राप्त करना चाहती हैं, तो केवल डॉक्टर के पास जाने के बजाय अपनी दिनचर्या में कुछ खास बदलाव करने होंगे। सबसे पहले महिलाओं को अपने ओव्यूलेशन को वैज्ञानिक तरीकों से ट्रैक करना सीखना चाहिए। इसके लिए बाजार में मिलने वाली ओव्यूलेशन प्रिडिक्शन किट का इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर डॉक्टर से सलाह लेकर सही दिनों की पहचान की जा सकती है।
दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कदम खानपान में सुधार करना है। अधिक शुगर वाली चीजें, प्रोसेस्ड फूड, मैदे से बनी वस्तुएं और सफेद चावल का सेवन तुरंत बंद कर देना चाहिए। इन चीजों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत अधिक होता है, जिससे शरीर में अचानक इंसुलिन स्पाइक होता है। इसके बजाय अपनी थाली में हरी सब्जियां, फाइबर से भरपूर अनाज, लीन प्रोटीन और हेल्दी फैट्स को जगह दें।
जीवनशैली में बदलाव और वजन नियंत्रण से आसान हो सकती है राह
हेल्थ एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि वजन को नियंत्रित रखना इनफर्टिलिटी के इलाज की दिशा में सबसे मजबूत कदम है। मोटापा शरीर के भीतर हार्मोनल असंतुलन को और अधिक गंभीर बना देता है, जिससे गर्भधारण की संभावनाएं न्यूनतम हो जाती हैं। इसके लिए नियमित व्यायाम बहुत जरूरी है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि अत्यधिक जिम या वर्कआउट करने से शरीर में कोर्टिसोल यानी तनाव हार्मोन बढ़ सकता है, जो सीधे तौर पर एंड्रोजन का उत्पादन बढ़ाकर मुश्किलें पैदा करता है।
पर्याप्त नींद लेना, मानसिक तनाव से दूर रहना और योगा-मेडिटेशन का सहारा लेना PCOS के लक्षणों को कम करने में अचूक उपाय साबित होता है। विटामिन-डी और फोलेट जैसे जरूरी सप्लीमेंट्स भी डॉक्टर की देखरेख में लिए जा सकते हैं, जो एग की क्वालिटी को बेहतर बनाने में मददगार होते हैं। धैर्य और सही मेडिकल मार्गदर्शन के साथ इस चुनौती को पार किया जा सकता है।






