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पितृपक्ष 2026: 30 सितंबर को रहेगा खास संयोग, एक ही दिन होगा चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध

पितृपक्ष के दौरान 30 सितंबर का दिन बेहद खास रहने वाला है। इस दिन तिथियों के विशेष फेरबदल के चलते चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, अपराह्न काल की प्रधानता के कारण यह स्थिति बन रही है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•30 सितंबर 2026 • अपडेटेड•47
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पितृपक्ष 2026: 30 सितंबर को रहेगा खास संयोग, एक ही दिन होगा चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध
📷 पितृपक्ष 2026: 30 सितंबर को रहेगा खास संयोग, एक ही दिन होगा चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • पितृपक्ष 2026 में 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एकसाथ किया जाएगा।
  • चतुर्थी तिथि 29 सितंबर की शाम को शुरू होकर 30 सितंबर की दोपहर तक रहेगी, जिसके बाद पंचमी तिथि शुरू होगी।
  • श्राद्ध कर्म के लिए दोपहर का अपराह्न काल और कुतुप काल सबसे उत्तम माना जाता है।
  • पंचमी तिथि को कुंवारा पंचमी भी कहा जाता है, जिस दिन अविवाहित मृतकों का श्राद्ध करने का विधान है।

पितृपक्ष 2026 में क्या है खास संयोग और क्यों महत्वपूर्ण है 30 सितंबर

सनातन संस्कृति में पितृपक्ष का समय अपने पूर्वजों को नमन करने, उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और पूजन करने का सबसे पवित्र काल माना जाता है। इस अवधि में पूरे विधि-विधान से पितरों का स्मरण करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। इस वर्ष पितृपक्ष के दौरान एक ऐसा खास संयोग बन रहा है, जिसने धर्म और ज्योतिष प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पंचांग के अनुसार, इस साल 30 सितंबर का दिन बहुत महत्वपूर्ण रहने वाला है, क्योंकि इस विशेष तिथि पर दो अलग-अलग तिथियों का श्राद्ध एक साथ संपन्न किया जाएगा।

हिंदू पंचांग की गणना के मुताबिक, इस बार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 29 सितंबर की शाम को 05 बजकर 09 मिनट पर आरंभ होगी और इसका समापन 30 सितंबर की दोपहर 02 बजकर 55 मिनट पर होगा। इसके तुरंत बाद पंचमी तिथि शुरू हो जाएगी, जो कि अगले दिन यानी 1 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। तिथियों के इस विशेष क्रम और शास्त्रों के नियमों के आधार पर जानकारों का स्पष्ट कहना है कि 30 सितंबर को ही दोनों तिथियों का श्राद्ध करना शास्त्र सम्मत और मान्य है।

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क्यों एक ही दिन किया जाएगा चतुर्थी और पंचमी का श्राद्ध

धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में श्राद्ध कर्म संपन्न करने के लिए समय की विशेष महत्ता बताई गई है। विशेष तौर पर दोपहर का समय, जिसे अपराह्न काल कहा जाता है, पूर्वजों के पूजन और तर्पण के लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। चूंकि 30 सितंबर को दोपहर के समय चतुर्थी तिथि समाप्त होकर पंचमी तिथि में प्रवेश हो रहा है, इसलिए उदया तिथि और मध्याह्न व्यापिनी तिथि के नियम के अनुसार इसी दिन दोनों तिथियों के निमित्त श्राद्ध कर्म किए जाएंगे।

ज्योतिष शास्त्र और पंचांग के जानकारों का मानना है कि पितृपक्ष में तिथियों का घटना या बढ़ना खगोलीय और पंचांगीय गणनाओं पर आधारित होता है। ऐसी स्थिति में जब कोई तिथि दोपहर के समय बदलती है, तो अपराह्न काल को आधार मानकर ही कर्मकांड पूरे किए जाते हैं। यही वजह है कि इस वर्ष 30 सितंबर को एक ही दिन में चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध करने का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे साधकों को अपने पूर्वजों के निमित्त अनुष्ठान करने में सहूलियत होगी।

चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध का समय और कुतुप काल की महत्ता

श्राद्ध अनुष्ठान के दौरान हर एक पहर का अपना अलग महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में तर्पण और पिंडदान के लिए 'कुतुप काल' को सबसे पवित्र और श्रेष्ठ वेला माना गया है। पंचांग के अनुसार, 30 सितंबर को कुतुप वेला सुबह 11 बजकर 47 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगी। हालांकि, यह समय देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और शहरों के सूर्योदय के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग का अवलोकन करना हमेशा उचित रहता है।

कुतुप काल के अलावा महाप्रदोष काल और रोहिणि मूहूर्त का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दौरान विधि-विधान से पूजा करने से पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। जानकारों का सुझाव है कि इस दिन समय का विशेष ध्यान रखते हुए अपने घर के पुरोहित या बुजुर्गों के मार्गदर्शन में ही श्राद्ध की प्रक्रिया को पूरा करना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की त्रुटि से बचा जा सके।

किन लोगों का श्राद्ध किया जाता है इस विशेष दिन

30 सितंबर को पड़ने वाले इस संयुक्त श्राद्ध पर मुख्य रूप से दो श्रेणियों के पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। पहला, चतुर्थी तिथि का श्राद्ध उन दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए किया जाता है, जिनका निधन किसी भी महीने के कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ हो। दूसरा, पंचमी तिथि का श्राद्ध उन सदस्यों के लिए बेहद खास माना जाता है जिनकी मृत्यु अविवाहित अवस्था में हुई हो। इसी कारणवश पंचमी तिथि को 'कुंवारा पंचमी' के नाम से भी जाना जाता है।

इसके अतिरिक्त, यदि किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु किसी भी मास की पंचमी तिथि को हुई हो, तो उनका वार्षिक श्राद्ध भी इसी दिन करने का विधान है। जिन परिवारों में इन तिथियों पर अपने प्रियजनों को खोने वाले सदस्य रहे हैं, उनके लिए यह दिन विशेष रूप से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर होता है।

श्राद्ध कर्म की विधि और पंचबलि का महत्व

पितृपक्ष के दौरान पिंडदान और तर्पण की प्रक्रिया अत्यंत प्राचीन और पवित्र मानी गई है। चतुर्थी और पंचमी तिथि के संयुक्त अवसर पर आटा, चावल, जौ, काले तिल, शहद और घी के मिश्रण से पिंड तैयार किए जाते हैं। इसके बाद पूरी श्रद्धा और मंत्रोच्चार के साथ इन पिंडों को पितरों को अर्पित किया जाता है। पिंडदान के पश्चात जल में काले तिल मिलाकर तर्पण किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में कुश से बनी पवित्र अंगूठी धारण करने की परंपरा है।

श्राद्ध अनुष्ठान का समापन ब्राह्मण भोज और दान-दक्षिणा के साथ होता है। इसके साथ ही पितृपक्ष के कर्मकांड में 'पंचबलि' का भी विशेष स्थान है। इसके तहत बनाए गए भोजन का एक अंश गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों समेत अन्य जीवों के लिए निकाला जाता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इन जीवों के माध्यम से ही भोजन का अंश सीधे हमारे पूर्वजों तक पहुंचता है। अंत में सभी लोग मिलकर पितरों की आत्मिक शांति और उनकी कृपा पाने के लिए प्रार्थना करते हैं।

"पितृपक्ष हमारे जीवन में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा माध्यम है। इस दौरान विधि-विधान से किया गया श्राद्ध न केवल पितृदोष से मुक्ति दिलाता है, बल्कि परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त करता है।" — आचार्य रामनरेश शास्त्री, ज्योतिषाचार्य

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि 30 सितंबर 2026 का यह दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिन परिवारों में चतुर्थी या पंचमी तिथि के पितृ हैं, वे पूरी निष्ठा और सात्विकता के साथ इस दिन अपने पूर्वजों का स्मरण कर सकते हैं। इस दौरान सादा जीवन जीने, नियमों का पालन करने और किसी भी प्रकार की नकारात्मकता से दूर रहने की सलाह दी जाती है, ताकि अनुष्ठान का पूरा पुण्य फल प्राप्त हो सके।

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