नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी से लेकर राज्यों के गलियारों तक इन दिनों राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल काफी तेज हो गई है। हाल ही में एक बड़े कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में आई डिजिटल क्रांति और सुशासन के फायदों पर खुलकर बात की। उन्होंने अपने संबोधन में सीधा सवाल उठाया कि जिनकी मुफ्त की कमाई और भ्रष्टाचार के रास्ते बंद हो गए हैं, क्या वे कभी मोदी से प्यार करेंगे? प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में बिचौलियों और फर्जीवाड़े को रोकने के लिए तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकारी योजनाओं का पैसा अब सीधे लोगों के खातों में पहुंच रहा है जिससे बीच में खाने वालों की दुकानें बंद हो गई हैं।
इस बीच राष्ट्रीय राजधानी में राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी लगातार जारी है। संसद और बाहर विपक्षी नेता सरकार की नीतियों पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। हाल ही में एक राजनीतिक बैठक के दौरान नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक और गुस्से का माहौल भी देखने को मिला। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता संसद परिसर और बैठकों में सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह टकराव और ज्यादा बढ़ सकता है क्योंकि दोनों तरफ से चुनावी और नीतिगत मुद्दों पर जंग छिड़ी हुई है।
प्रशासनिक नियुक्तियों और कानूनी मामलों पर गरमाई सियासत
राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था में भी बड़े बदलाव और विवाद सामने आ रहे हैं। झारखंड में पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन आमने-सामने आ गए हैं। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए डीजीपी की नियुक्ति को नियमों के खिलाफ बताया है और इसे रद्द करने की मांग की है। इस कानूनी पेंच के बाद राज्य के प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। अदालतों में चल रहे इन मामलों और नियुक्तियों से जुड़ी खबरों पर पूरे देश की नजर टिकी हुई है कि आगे क्या फैसला आता है।
दूसरी तरफ न्यायपालिका के भीतर भी ऐतिहासिक बदलावों की सुगबुगाहट तेज हो गई है। देश में पहली महिला मुख्य न्यायाधीश यानी सीजेआई के पद को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के कुल मौजूदा जजों में महिला जजों की संख्या बेहद कम है, लेकिन उनमें से सबसे आगे चल रही नामों पर अभी से कयास लगाए जाने लगे हैं। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि ऐसा होता है तो यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। आम जनता भी इन बड़े बदलावों को बेहद गौर से देख रही है और न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता की उम्मीद कर रही है।
डिजिटल क्रांति और सुशासन से आम जनता को कितना फायदा
जमीनी स्तर पर बात करें तो डिजिटल तकनीक के आने से आम आदमी के जीवन में काफी बदलाव आया है। राशन से लेकर छात्रवृत्ति और पेंशन तक का पैसा अब डीबीटी यानी सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर हो रहा है। पहले जहां कागजी कार्रवाई और घूसखोरी के चक्कर में गरीबों का हक मारा जाता था, अब वह सीधा उनके फोन पर आ जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसी व्यवस्था की ओर इशारा करते हुए कहा कि सिस्टम की इस पारदर्शिता से भ्रष्टाचार करने वालों को भारी मिर्ची लगी है। यही कारण है कि वे लगातार सरकार की छवि खराब करने की कोशिश में जुटे रहते हैं।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब मैदानी स्तर पर जाकर लोगों से बातचीत की तो मिले-जुले रुझान सामने आए। छोटे दुकानदारों और आम नागरिकों ने माना कि ऑनलाइन भुगतान और डिजिटल सेवाओं से उनका काम बहुत आसान हुआ है। हालांकि, कुछ तबकों में अभी भी पुरानी व्यवस्था के बंद होने से नाराजगी या असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कुल मिलाकर, भारत इस समय एक बड़े प्रशासनिक और तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है जहां पुराने ढर्रे को छोड़कर पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी व्यवस्था अपनाने की होड़ मची है।
भविष्य की रणनीतियां और आगामी राजनीतिक चुनौतियां
आने वाले हफ्तों में राजनीतिक दलों की रणनीति पूरी तरह से जनता के इन बुनियादी मुद्दों पर टिकी रहने वाली है। एक तरफ जहां सरकार अपनी डिजिटल सफलताओं और कल्याणकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं विपक्ष बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर उसे घेरने की कोशिश कर रहा है। प्रशासनिक और कानूनी मोर्चे पर चल रही खींचतान भी थमने का नाम नहीं ले रही है। द फ्रीलान्स की नजर इन सभी घटनाओं पर लगातार बनी हुई है और हम आपको हर अपडेट सबसे पहले ग्राउंड से पहुंचाते रहेंगे।











