पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सुलगती नाराजगी और नया टकराव
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में मौजूदा समय में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। पिछले कई महीनों से चल रहे जन-आंदोलन के बीच अब हालात तब और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए जब स्थानीय संगठनों ने इस्लामाबाद की हुकूमत को सीधी चेतावनी दे डाली। क्षेत्र के आम नागरिकों और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे समूहों का सब्र अब जवाब देता नजर आ रहा है। पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की मुश्किलें इस विरोध प्रदर्शन के चलते लगातार बढ़ती जा रही हैं। नियंत्रण रेखा के करीब स्थित इलाकों से लेकर प्रमुख कस्बों तक जनता सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद कर रही है।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) है, जिसने सरकार के हर उस कदम के खिलाफ हुंकार भरी है जो स्थानीय स्वायत्तता या अधिकारों के खिलाफ जाता हो। कमेटी का साफ तौर पर यह कहना है कि क्षेत्र के भीतर सुरक्षा बलों की किसी भी नई टुकड़ी को भेजना या पुरानी पोजीशन पर फिर से सैनिकों को तैनात करना सीधे तौर पर यहां के नागरिकों के ऊपर बाहरी हमला माना जाएगा। इस तीखे तेवर ने स्थानीय प्रशासन और पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं, क्योंकि जनता अब झुकने को तैयार नजर नहीं आ रही है।
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अवामी एक्शन कमेटी की दो टूक: सैनिकों की वापसी बनेगी बड़ा खतरा
हाल ही में अवामी एक्शन कमेटी के प्रमुख नेताओं में शामिल उमर नजीर कश्मीरी ने मीडिया और जनता के सामने एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने बताया कि कोटली और उसके आसपास के कई इलाकों से पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के जवानों को पीछे हटना पड़ा था, जो कि जनता के दबाव का परिणाम था। लेकिन अब खबरें आ रही हैं कि उन खाली हुई जगहों पर फिर से सैन्य बलों को लाने की साजिश रची जा रही है। इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए एक्शन कमेटी ने अपनी रणनीति साफ कर दी है।
उमर नजीर कश्मीरी ने अपने एक बयान में स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि सुरक्षा बलों को उन इलाकों में दोबारा लाया गया जहां से वे हटे थे, तो स्थानीय लोग इसे चुपचाप सहन नहीं करेंगे। इसे खुली आक्रामकता माना जाएगा।
"कोटली और दूसरे इलाकों से कुछ फोर्स पीछे हट गई है। अगर फोर्स को फिर से यहां लाया जाता है, चाहे वे कहीं से भी आएं, हम इसे अपने राज्य पर बाहरी हमला मानेंगे। हम इसकी कड़ी निंदा करेंगे और उसका पुरजोर विरोध करेंगे। हमारा संघर्ष किसी एक जिले तक सीमित नहीं है।" — उमर नजीर कश्मीरी, नेता, जेएएसी
कमेटी का रुख यह है कि पूरे PoK के किसी भी हिस्से में सैन्य बल की गैर-जरूरी और बलपूर्वक वापसी का पुरजोर प्रतिरोध किया जाएगा। स्थानीय लोगों का मानना है कि सेना का इस्तेमाल उनकी आवाज को दबाने और लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के लिए किया जा रहा है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
लंबी लड़ाई और बुनियादी मांगें: सब्सिडी से लेकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक
यह उबाल रातों-रात पैदा नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे महीनों का गहरा असंतोष और प्रशासनिक उपेक्षा की लंबी दास्तान जुड़ी हुई है। PoK में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी लंबे समय से बिजली, गेंहू पर मिलने वाली सब्सिडी, और बेहतर शासन व्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दों को लेकर आंदोलन चला रही है। इन इलाकों के बाशिंदों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद उन्हें दो वक्त की बुनियादी सहूलियत के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जबकि पाकिस्तानी हुक्मरान उनके संसाधनों का दोहन कर रहे हैं।
इसके अलावा, आंदोलनकारियों की एक और बेहद अहम और संवेदनशील मांग वहां के राजनीतिक ढांचे से जुड़ी हुई है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रह रहे जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों के लिए 'आजाद जम्मू-कश्मीर' विधानसभा में जो 12 सीटें आरक्षित की गई हैं, उन्हें पूरी तरह से समाप्त किया जाए। स्थानीय लोगों का तर्क है कि ये आरक्षित सीटें सीधे तौर पर उनके अपने स्थानीय अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर करती हैं, और इनका लाभ बाहरी लोगों को मिलता है।
जून के बाद से भड़की हिंसा और प्रशासनिक दमन की कोशिशें
बीते कुछ महीनों में यह आंदोलन और अधिक आक्रामक रूप ले चुका है। खासकर जून महीने के बाद से मुजफ्फराबाद, रावलकोट, मीरपुर और कोटली जैसे प्रमुख शहरों में ऐतिहासिक रैलियां और विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं। इन प्रदर्शनों के दौरान कई स्थानों पर आम जनता और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच तीखी झड़पें भी हुईं, जिनमें कई लोगों के हताहत होने की खबरें भी सामने आई थीं। हालांकि, सरकारी मशीनरी और आंदोलन के नेताओं की ओर से इन झड़पों और मौतों के आंकड़ों को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं।
स्थिति के बेकाबू होने के बाद आजाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए अवामी एक्शन कमेटी पर आधिकारिक तौर पर प्रतिबंध लगा दिया है। कई प्रमुख नेताओं के खिलाफ कानूनी मुकदमे दर्ज किए गए हैं और उन्हें गिरफ्तार करने या दबाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रशासन का यह आरोप है कि आंदोलन के नाम पर कानून-व्यवस्था को तोड़ा गया और सरकारी संपत्तियों तथा सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाया गया। इसके विपरीत, आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का साफ कहना है कि उनके सभी प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण रहे हैं और सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए दमनकारी नीतियों का सहारा ले रही है।
नूर और मुनीर सरकार के सामने खड़ी हुई बड़ी कूटनीतिक चुनौती
मौजूदा हालात ने पाकिस्तान की संघीय सरकार और सेना के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक विकट स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ जहां देश गंभीर आर्थिक संकट और महंगाई से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ PoK में सुलगती इस चिंगारी ने आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। यदि स्थानीय प्रशासन और सेना बल-प्रयोग का रास्ता चुनती है, तो आंदोलन और अधिक हिंसक रूप ले सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की किरकिरी होना तय है।
दूसरी ओर, यदि सरकार झुकती है और जनता की मांगें मानती है, तो इससे क्षेत्र में उसकी पकड़ हमेशा के लिए कमजोर हो जाएगी। कुल मिलाकर, अवामी एक्शन कमेटी की कड़ी चेतावनी ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान के हुक्मरानों की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ने वाली हैं, और PoK की आवाम अब अपने अधिकारों के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार बैठी है।








