आज के दौर में जब हर सेवा और योजना को डिजिटल माध्यम से जोड़ने का दावा किया जा रहा है, तब जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। आधुनिक तकनीक की मदद से कल्याणकारी योजनाओं को पारदर्शी बनाने की कोशिशें अपनी जगह सही हो सकती हैं, लेकिन सॉफ्टवेयर की खामियां और तकनीकी लापरवाही जब आम आदमी की रोजी-रोटी पर भारी पड़ने लगें, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। ऐसा ही एक गंभीर मामला इन दिनों डिजिटल पोर्टल की तकनीकी गड़बड़ियों के कारण सामने आया है, जहां जरा सी टाइपिंग मिस्टेक या डेटा मिसमैच ने न सिर्फ लोगों के राशन कार्ड छीन लिए हैं, बल्कि उनके जीने का सहारा बनी सामाजिक सुरक्षा पेंशन को भी ठप कर दिया है।
पोर्टल की मनमानी और तकनीकी खामियों का शिकार हो रहे आम नागरिक
सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली और ऑनलाइन पोर्टल्स के पेचीदा सिस्टम ने आम जनता की जिंदगी को बेहद मुश्किल बना दिया है। लोग अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकारी सहायता पर निर्भर रहते हैं, लेकिन जब सिस्टम की एक छोटी सी गलती उन्हें इन अधिकारों से वंचित कर देती है, तो उनका जीवन संकट में पड़ जाता है। परिवार पहचान पत्र या अन्य डिजिटल डेटाबेस में अपडेशन के दौरान हो रही भारी गड़बड़ियों के चलते कई ऐसे परिवारों के नाम कट गए हैं जो वास्तव में इन योजनाओं के सबसे बड़े हकदार हैं। बिना किसी पूर्व सूचना या चेतावनी के अचानक पेंशन का रुक जाना और राशन की पर्ची न मिलना लोगों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
स्थिति यह है कि पति-पत्नी या परिवार के अन्य सदस्यों के नामों के मिलान में पोर्टल की तकनीकी त्रुटि के कारण पात्र व्यक्तियों को 'अपात्र' घोषित कर दिया जा रहा है। अधिकारियों के पास जब लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचते हैं, तो उन्हें तकनीकी कारणों का हवाला देकर टरका दिया जाता है। इस तरह की घटनाएं इस बात का साफ प्रमाण हैं कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले सर्वर और सॉफ्टवेयर अभी भी पूरी तरह से त्रुटिहीन नहीं हैं, और इसका खमियाजा सीधा उन गरीबों को भुगतना पड़ रहा है जो डिजिटल साक्षरता के मामले में पीछे हैं।
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बुजुर्गों की पेंशन बंद होने से पैदा हुआ जीवनयापन का गंभीर संकट
वृद्धावस्था पेंशन और विधवा पेंशन जैसी योजनाएं समाज के उन वर्गों के लिए जीवन रेखा का काम करती हैं जिनकी आय का कोई अन्य साधन नहीं होता। महीने के अंत में मिलने वाली इस छोटी सी राशि से बुजुर्ग अपनी दवाइयां और जरूरी जरूरतें पूरी करते हैं। लेकिन हालिया तकनीकी गड़बड़ियों के बाद सैकड़ों बुजुर्गों की पेंशन बिना किसी स्पष्ट कारण के रुक गई है। बैंक खातों के बजाय सीधे पोर्टल पर डेटा अपडेशन के दौरान आई गड़बड़ी ने इन्हें सरकारी मदद से महरूम कर दिया है।
बुजुर्गों का कहना है कि वे पिछले कई महीनों से कभी बैंक तो कभी संबंधित सरकारी कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा है। हाथों में लाठी थामे और झुर्रियों वाले चेहरों पर निराशा लिए ये लोग जब दफ्तरों की सीढ़ियां चढ़ते हैं, तो सिस्टम की संवेदनहीनता साफ दिखाई देती है। उम्र के इस पड़ाव पर जहां उन्हें आराम मिलना चाहिए, वे सरकारी दस्तावेजों को ठीक करवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
राशन कार्ड कटने से थाली से गायब हो रही दाल-रोटी
पेंशन के साथ-साथ राशन कार्ड कटने की समस्या ने तो कोढ़ में खाज का काम किया है। नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत मिलने वाला सस्ता या मुफ्त राशन गरीबों के पेट की आग बुझाने का एकमात्र जरिया है। डिजिटल वेरिफिकेशन के दौरान अचानक आए एरर के कारण कई परिवारों के राशन कार्ड रद्द कर दिए गए हैं। कोटेदार की दुकान पर जब इन परिवारों को राशन लेने से मना किया जाता है, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती है।
परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है क्योंकि घर का मुखिया दिहाड़ी मजदूरी करके किसी तरह परिवार का पेट पालता है और राशन कार्ड बंद हो जाने से बाजार से महंगे दाम पर अनाज खरीदना उनकी पहुंच से बाहर हो गया है। सरकार के दावों के विपरीत धरातल पर लोगों को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, इसका अंदाजा इन पीड़ित परिवारों के दर्द को देखकर ही लगाया जा सकता है।
अधिकारियों के चक्कर काटते थक, सुध लेने वाला कोई नहीं
समस्या के समाधान के लिए जब पीड़ित नागरिक संबंधित महकमों के अधिकारियों से मिलते हैं, तो उन्हें केवल आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिलता। कभी दस्तावेज दोबारा अपलोड करवाने के नाम पर तो कभी पोर्टल ठीक होने का बहाना बनाकर उन्हें महीनों इंतजार करवाया जाता है। एक छोटे से सुधार के लिए भी लोगों को दफ्तरों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद होते हैं।
"हम दिनभर मजदूरी छोड़कर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन कोई अधिकारी हमारी बात सुनने को तैयार नहीं है। पोर्टल पर गलती हमारी नहीं, सिस्टम की है, फिर सजा हमें क्यों मिल रही है?" — पीड़ित ग्रामीण, स्थानीय नागरिक
यह दर्द सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों का है जो ऑनलाइन व्यवस्था की अंधी चक्की में पिस रहे हैं। स्थानीय स्तर पर जनसुनवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है और असली समस्याओं के निवारण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
पारदर्शिता के नाम पर बढ़ रही आम जनता की मुश्किलें
डिजिटलाइजेशन का मुख्य उद्देश्य व्यवस्था को सरल और पारदर्शी बनाना था, ताकि बिचौलियों का खत्म किया जा सके और सही व्यक्ति तक सरकारी लाभ पहुंच सके। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आती है। जब तक पोर्टल की तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए एक पारदर्शी और सुलभ ग्रीवांस रिड्रेसल सिस्टम (शिकायत निवारण तंत्र) नहीं बनाया जाता, तब तक इस तरह की परेशानियां बनी रहेंगी।
प्रशासनिक अधिकारियों को चाहिए कि वे इस मामले में त्वरित संज्ञान लें और उन सभी पात्र परिवारों का डेटा मैन्युअल रूप से सत्यापित कर उनकी पेंशन और राशन कार्ड तुरंत बहाल करें, जिन्हें गलत तरीके से अपवंचित किया गया है। साथ ही, तकनीकी एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की लापरवाही से बचा जा सके।





