राजस्थान निकाय चुनाव: मेयर और अध्यक्ष पदों के लिए सियासी जंग तेज
राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर से स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने सरगर्मी बढ़ा दी है। प्रदेश भर के कई नगर निगमों, परिषदों और पालिकाओं में मेयर, सभापति और अध्यक्ष पद के लिए हुए मतदान के बाद सोमवार को जब नतीजे सामने आए, तो राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी मजबूत पकड़ का अहसास कराते हुए कई अहम नगर निगमों में अपने मेयर बैठाने में सफलता हासिल की है। वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ने भी कुछ स्थानों पर अपनी जमीन बचाते हुए जीत दर्ज की है।
राज्य के इन चुनावों को लेकर आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें टिकी हुई थीं। शहरी क्षेत्रों की इन सरकारों के गठन से तय होता है कि जमीनी स्तर पर जनता का मूड किस दिशा में है। इन चुनावों में केवल राजनीतिक दलों की संख्या बल का ही परीक्षण नहीं हुआ, बल्कि जोड़तोड़, रणनीति और फ्लोर मैनेजमेंट की कला का भी भरपूर इस्तेमाल देखने को मिला। आइए विस्तार से जानते हैं कि किस शहर में किस दल को जीत मिली और वहां का समीकरण कैसा रहा।
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अजमेर नगर निगम में सबसे बड़ा उलटफेर, भाजपा ने मारी बाजी
अजमेर नगर निगम के चुनाव परिणाम सबसे ज्यादा चौंकाने वाले और रोमांचक रहे। यहां कांग्रेस पार्टी ने 37 सीटों पर जीत हासिल की थी और वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन इसके बावजूद वह बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर रह गई। वहीं दूसरी ओर, भाजपा ने 32 सीटों पर जीत दर्ज की थी। मुकाबला बेहद दिलचस्प था क्योंकि किसी भी दल के पास अकेले दम पर बोर्ड बनाने का स्पष्ट बहुमत नहीं था।
अजमेर में जीत हासिल करने के लिए भाजपा ने अपनी राजनीतिक चाल चली और निर्दलीयों के साथ-साथ कांग्रेस खेमे में भी सेंधमारी की। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने कुल 43 वोट हासिल कर लिए। इस तरह से भाजपा की मेयर पद की उम्मीदवार अनामिका शर्मा ने कांग्रेस की किरण गढ़वाल को 6 वोटों के अंतर से करारी शिकस्त दी। अजमेर का यह चुनाव इस बात का बड़ा उदाहरण है कि आखिरी वक्त का फ्लोर मैनेजमेंट चुनावी नतीजों को पूरी तरह से पलट सकता है।
अलवर और पाली में निर्दलीयों और बगावत ने तय की सियासत की चाल
अलवर नगर निगम का हाल भी कुछ ऐसा ही त्रिशंकु वाला रहा, जहां किसी भी राजनीतिक दल को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। भाजपा को यहां 28 और कांग्रेस को 23 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। इन सबके बीच 13 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी जो कि इस चुनाव में किंगमेकर की भूमिका में आ गए। आखिरकार, इन्हीं 13 निर्दलीय पार्षदों ने भाजपा का साथ दिया और भाजपा उम्मीदवार सुमनलता अग्रवाल ने 42 मतों के साथ बहुमत साबित करते हुए जीत अपने नाम की।
दूसरी तरफ, पाली नगर निगम में भी कुछ ऐसा ही राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला। पाली के 65 सदस्यीय बोर्ड में कांग्रेस को 29 सीटें मिली थीं, जो बहुमत के आंकड़े से महज 4 सीट कम थीं। लेकिन कांग्रेस पार्टी के भीतर हुई बगावत और असंतोष का पूरा फायदा भाजपा ने उठाया। भाजपा के पास केवल 21 सीटें थीं, लेकिन अपने सटीक फ्लोर मैनेजमेंट के बल पर उन्होंने 33 सीटों का जादुई आंकड़ा जुटा लिया और नमिता बुबकिया पाली की नई महापौर चुनी गईं।
उदयपुर और बीकानेर में किसकी रही स्थिति मजबूत
अजमेर, अलवर और पाली की तरह कड़ी मशक्कत के बिना उदयपुर नगर निगम में भाजपा ने एकतरफा और बेहद स्पष्ट जीत दर्ज की। कुल 80 वार्डों वाले उदयपुर नगर निगम में भाजपा ने शुरुआत से ही अपनी बढ़त बनाए रखी और 53 सीटों पर शानदार जीत हासिल करके स्पष्ट बहुमत अपने नाम कर लिया। भाजपा के उम्मीदवार पारस सिंघवी ने उदयपुर के मेयर पद पर बेहद आसानी से और भारी अंतर से जीत हासिल की।
वहीं दूसरी ओर, बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस पार्टी के लिए राहत भरी खबर आई। बीकानेर में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 80 में से 42 सीटों पर जीत हासिल की और बहुमत के आंकड़े को पार कर लिया। कांग्रेस के मेयर पद के उम्मीदवार अनिल कल्ला को कुल 50 वोट मिले, जिसके बाद उन्हें बीकानेर का नया मेयर घोषित किया गया। इसके अलावा भरतपुर और भीलवाड़ा में भी भाजपा के उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए, जिससे पार्टी का मनोबल काफी ऊंचा हुआ है।
"स्थानीय निकाय चुनावों के ये परिणाम इस बात का प्रमाण हैं कि शहरी इलाकों की जनता ने विकास के एजेंडे और मजबूत नेतृत्व पर भरोसा जताया है। हमारी सरकार की नीतियां जन-जन तक पहुंच रही हैं।"— स्थानीय भाजपा पदाधिकारी
आगामी चुनावों और राजनीतिक विश्लेषकों का नजरिया
राजस्थान के इन निकाय चुनावों के परिणाम केवल कुछ शहरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले समय की राजनीतिक दिशा को भी तय करने का काम करते हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में चल रही सरकार के 'वन स्टेट-वन इलेक्शन' जैसे दांव और नीतियों का असर इन चुनावों में साफ तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगमों तथा सुकेत नगर पालिका के कुछ वार्डों में दोबारा मतदान कराए जाने के कारण वहां के अध्यक्ष पद के चुनाव अब 25 सितंबर को संपन्न होंगे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शहरी निकायों में मिली यह सफलता सत्तारूढ़ दल के लिए एक बड़ा बूस्टर डोज साबित होगी। स्थानीय स्तर पर इन निकायों के माध्यम से जनता के कार्य कितनी तेजी से होते हैं, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, जीते हुए प्रत्याशियों के समर्थकों में भारी जश्न का माहौल है और शहर-शहर विजय जुलूस निकाले जा रहे हैं। जनता अब इन नए जनप्रतिनिधियों से अपने इलाकों के विकास की उम्मीद लगाए बैठी है।





