राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में पंचायत चुनावों की सुगबुगाहट तेज
देश के सबसे बड़े राज्यों में शुमार राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के बाद अब गांवों की सरकार चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों ने राजनीतिक दलों और भावी प्रत्याशियों के माथे पर पसीना ला दिया है। इस बार के पंचायत चुनाव पिछले कई मायनों में बेहद अलग और दिलचस्प होने जा रहे हैं, क्योंकि ग्रामीण राजनीति की धुरी अब पारंपरिक समीकरणों से हटकर एक नए वर्ग के हाथों में जाती दिख रही है।
आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस बार के पंचायत चुनावों में युवाओं की भागीदारी रिकॉर्ड स्तर पर रहने वाली है। गांव की चौपालों से लेकर जिला परिषद के हॉल तक, हर जगह चर्चा का मुख्य विषय यही है कि आखिर इस बार का युवा वोटर किस करवट बैठेगा। राजनीतिक दलों के रणनीतिकार भी अपने पुराने चुनावी फॉर्मूलों को छोड़कर अब पूरी तरह से युवा केंद्रित एजेंडा तैयार करने में जुट गए हैं ताकि इस विशाल मतदाता वर्ग को साधा जा सके।
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कुल मतदाताओं में 46 प्रतिशत हिस्सेदारी युवाओं के हाथ
राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए विस्तृत आंकड़ों के मुताबिक, राजस्थान में पंचायत चुनाव के लिए कुल मतदाताओं की संख्या 4,03,07,308 तक पहुंच चुकी है। इसमें 2,08,87,351 पुरुष और 1,94,19,789 महिला मतदाता अपनी ताकत दिखाएंगे, जबकि थर्ड जेंडर के 168 मतदाता भी इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इन सभी आंकड़ों के बीच सबसे बड़ा आकर्षण 18 से 35 वर्ष की आयु का मतदाता वर्ग है।
इस आयु वर्ग की कुल संख्या करीब 1.85 करोड़ है। यदि इसे और गहराई से समझें तो 18 से 25 वर्ष की उम्र के बीच 76.24 लाख से ज्यादा मतदाता हैं, जिन्हें आमतौर पर Gen-Z पीढ़ी के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, 26 से 35 वर्ष की आयु के बीच 1.08 करोड़ से अधिक मतदाता पंजीकृत हैं। दोनों ही श्रेणियों को मिला दिया जाए तो यह आंकड़ा कुल मतदाता आबादी का लगभग 46 प्रतिशत बैठता है। यानी हर 100 में से 46 वोटर ऐसे हैं जिनकी उम्र 35 साल से कम है।
पहली बार वोट डालने वाले 14 लाख युवाओं पर सभी की नजरें
इन चुनावों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें लगभग 14 लाख ऐसे युवा मतदाता भी शामिल हैं जो अपने जीवन में पहली बार पंचायत स्तर पर वोट डालकर गांव की सरकार चुनेंगे। स्कूल और कॉलेज की शिक्षा पूरी कर चुके या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे ये युवा पारम्परिक जातीय या सामाजिक समीकरणों से ऊपर उठकर विकास के मुद्दों पर बात करना पसंद करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहली बार मतदान करने जा रहे इन 14 लाख युवाओं का उत्साह प्रत्याशियों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। बूथ स्तर पर हर राजनीतिक दल इन नए मतदाताओं को लुभाने के लिए सोशल मीडिया से लेकर नुक्कड़ सभाओं तक का सहारा ले रहा है। यही वजह है कि इस बार का चुनाव केवल पारंपरिक नेताओं की प्रतिष्ठा का सवाल नहीं, बल्कि नए दौर की आकांक्षाओं का इम्तिहान बन गया है।
गांवों की चौपालों से लेकर शहर की ओर पलायन तक के बड़े मुद्दे
जब बात 18 से 35 साल के मतदाताओं की होती है, तो उनके मुद्दे भी बिल्कुल साफ और स्पष्ट होते हैं। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले इस युवा वर्ग के सामने आज भी रोजगार का सबसे बड़ा संकट बना हुआ है। इसके अलावा उच्च शिक्षा के बेहतर संस्थान, गांवों में तेज रफ्तार इंटरनेट कनेक्टिविटी, खेलकूद के लिए मैदान और आधुनिक कौशल प्रशिक्षण केंद्र जैसी सुविधाएं न होना आज भी एक बड़ी समस्या है।
खेती-किसानी को लाभ का सौदा बनाना और ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार शहरों की तरफ हो रहे पलायन को रोकना इस बार के चुनाव में सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बनकर उभरे हैं। युवा मतदाता केवल सड़क और नाली की बात नहीं कर रहे, बल्कि वे यह देखना चाहते हैं कि उनके गांव का जनप्रतिनिधि उन्हें डिजिटल युग में आगे बढ़ाने के लिए क्या रोडमैप रखता है।
Gen-Z मतदाताओं की प्राथमिकताएं और बदलता राजनीतिक विमर्श
मौजूदा चुनावी परिदृश्य में 'Gen-Z' शब्द काफी तेजी से गूंज रहा है। 1990 के दशक के अंतिम वर्षों से लेकर 2010 के शुरुआती दौर तक जन्मे ये युवा आज मतदान की देहरी पर खड़े हैं। इस आयु वर्ग के भीतर भी सोच और प्राथमिकताओं में बारीक अंतर देखने को मिलता है। 18 से 25 साल का युवा मुख्य रूप से पढ़ाई, कॉलेज जीवन, डिजिटल संसाधनों और करियर की शुरुआती सीढ़ियों पर है, जबकि 26 से 35 साल का युवा परिवार, नौकरी, छोटे-मोटे कारोबार और गृहस्थी की जिम्मेदारियों को संभाल रहा है।
राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह ने इन आंकड़ों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में युवाओं की इतनी बड़ी संख्या का शामिल होना एक स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। पंचायत चुनावों में इन मतदाताओं की सक्रियता से गांव की राजनीति का स्तर निश्चित रूप से सुधरेगा।
"पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची के मुताबिक राज्य में कुल 4.03 करोड़ से अधिक मतदाता पंजीकृत हैं, जिनमें 18 से 35 वर्ष के लगभग 1.85 करोड़ युवा मतदाता शामिल हैं जो कुल मतदाताओं का करीब 46 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं।" — राजेश्वर सिंह, राज्य निर्वाचन आयुक्त
निष्कर्ष: क्या बदलेगी ग्रामीण सियासत की तस्वीर?
राजस्थान के पंचायत चुनाव अब केवल गांव के विकास की साधारण लड़ाई नहीं रह गए हैं, बल्कि यह एक ऐसा मंच बन चुके हैं जहां भविष्य की राजनीति की रूपरेखा तैयार हो रही है। लगभग 46 फीसदी युवा शक्ति के हाथों में गांव की बागडोर आने से यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में खोखले वादों से काम नहीं चलेगा। जो भी प्रत्याशी युवाओं के रोजगार, शिक्षा और आजीविका के सवालों पर खरा उतरेगा, वही गांव की सरकार की कमान संभालेगा।







