देशभर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी 'राशन' को लेकर इन दिनों डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिज्ञासा और खोज का ग्राफ अचानक ऊपर गया है। पिछले कुछ घंटों में 'रेशन' शब्द से जुड़े सर्च ट्रेंड्स में अचानक आया यह उछाल इस बात का स्पष्ट संकेत है कि नीतिगत बदलावों, ई-केवाईसी (e-KYC) और राशन कार्ड के जरिए मिलने वाले खाद्यान्न को लेकर आम जनता के मन में कई सवाल और आशंकाएं हैं। 'द फ्रीलान्स' के वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर्स ने देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचकर इस बात की पड़ताल की कि आखिर डिजिटल होते इस तंत्र का धरातल पर क्या असर पड़ रहा है।
ई-केवाईसी और बायोमेट्रिक सत्यापन: तकनीकी प्रगति या नई उलझन?
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत आने वाले लाभार्थियों के लिए सरकार ने बायोमेट्रिक सत्यापन और ई-केवाईसी को अनिवार्य कर दिया है। सरकार का तर्क है कि इससे फर्जी और अपात्र लाभार्थियों को सिस्टम से बाहर किया जा रहा है, जिससे वास्तविक गरीबों तक पूरा राशन पहुंचे। हालांकि, जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या और सर्वर डाउन रहने के कारण बुजुर्गों और दिव्यांगों को घंटों राशन की दुकानों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कई स्थानों पर अंगूठे के निशान मैच न होने की वजह से पात्र लोगों के भी राशन कार्ड ब्लॉक होने की शिकायतें मिल रही हैं।
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वन नेशन, वन राशन कार्ड: दावों और सीमाओं के बीच
'वन नेशन, वन राशन कार्ड' योजना को सरकार अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है, जिसके तहत देश का कोई भी नागरिक किसी भी राज्य में अपनी पसंद की उचित मूल्य की दुकान से अपना हिस्सा ले सकता है। लेकिन हमारे फील्ड सर्वे में यह बात सामने आई कि प्रवासी मजदूरों को दूसरे राज्यों में इस सुविधा का लाभ उठाने में अभी भी स्थानीय प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है। भाषा की बाधा, दुकानदारों द्वारा मशीन का सर्वर काम न करने का बहाना बनाना और जागरूकता की कमी इस योजना के पूर्ण क्रियान्वयन में मुख्य बाधाएं बनी हुई हैं।
खाद्य सुरक्षा की गारंटी और भ्रष्टाचार पर लगाम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, डिजिटल और आधार सीडिंग व्यवस्था लागू होने के बाद से खाद्यान्न वितरण में लीकेज और बिचौलियों की भूमिका में भारी कमी आई है। पारदर्शिता बढ़ने से हर महीने करोड़ों टन अनाज सही हाथों तक पहुंच रहा है। स्थानीय राशन डीलरों का कहना है कि ई-पॉश (e-PoS) मशीनों के आने से स्टॉक का हिसाब रखना बेहद पारदर्शी हो गया है। इसके बावजूद, कुछ इलाकों में तौल में हेराफेरी और तय कोटे से कम राशन देने की शिकायतें आज भी पूरी तरह थमी नहीं हैं, जिस पर स्थानीय प्रशासन को सख्त निगरानी रखने की आवश्यकता है।
भविष्य का असर और सुधार की गुंजाइश
राशन प्रणाली में हो रहे ये तकनीकी बदलाव एक तरफ जहां भ्रष्टाचार को रोकने में मील का पत्थर साबित हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तकनीकी रूप से कमजोर और डिजिटल साक्षरता से वंचित वर्ग के लिए यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जमीनी स्तर पर इंटरनेट की बुनियादी ढांचागत कमियों को दूर नहीं किया जाता और बायोमेट्रिक असफल होने पर वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे आइरिस स्कैन या ओटीपी) को पूरी तरह सहज नहीं बनाया जाता, तब तक इस योजना का शत-प्रतिशत लाभ हर जरूरतमंद तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण बना रहेगा। 'द फ्रीलान्स' इस पूरी प्रक्रिया पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।







