पिछले कुछ घंटों से भारत के डिजिटल स्पेस में 'राशन' शब्द अचानक ट्रेंडिंग के शीर्ष पर पहुंच गया है। गूगल ट्रेंड्स के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के विभिन्न हिस्सों से राशन कार्ड, पोर्टेबिलिटी और बायोमेट्रिक सत्यापन से जुड़ी जिज्ञासाओं में अचानक भारी उछाल आया है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन टीम ने जब इस डिजिटल हलचल के पीछे छिपे जमीनी सच को टटोला, तो जो तस्वीर सामने आई, वह कागजी दावों से कोसों दूर और बेहद चिंताजनक है।
डिजिटल इंडिया और राशन: तकनीक बनी वरदान या अभिशाप?
एक तरफ सरकार 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' योजना को अपनी सबसे बड़ी सफलताओं में गिनवा रही है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर इंटरनेट कनेक्टिविटी और सर्वर डाउन होने की समस्या ने गरीबों के मुंह से निवाला छीन लिया है। दिल्ली और उत्तर प्रदेश से लगी सीमाओं पर राशन की दुकानों के बाहर लगी लंबी कतारों में खड़े लोगों का दर्द साफ बयां करता है कि तकनीक किस तरह उनके लिए वरदान के बजाय एक नई मुसीबत बन गई है। घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद जब वृद्ध या दिहाड़ी मजदूर मशीन पर अंगूठा लगाते हैं, तो 'फिंगरप्रिंट मैच न होने' का एरर उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देता है।
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बायोमेट्रिक सत्यापन की विफलता और मानवीय संकट
हमारी पड़ताल में यह बात सामने आई कि उम्रदराज मजदूरों, निर्माण कार्य से जुड़े श्रमिकों और खेतों में काम करने वाले किसानों के हाथों की उंगलियों के निशान समय के साथ घिस जाते हैं। ऐसे में ई-पॉश (e-PoS) मशीनें अक्सर उनके बायोमेट्रिक आंकड़े स्वीकार नहीं करती हैं। स्थानीय राशन डीलरों के पास तकनीकी रूप से 'आइरिस स्कैन' या ओटीपी आधारित वैकल्पिक व्यवस्थाएं तो हैं, लेकिन कई दूरदराज के इलाकों में नेटवर्क की समस्या के चलते ओटीपी समय पर नहीं पहुंच पाता। नतीजतन, कई जरूरतमंदों को बिना राशन के ही खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।
खाद्य सुरक्षा के नए नियम और जनता का असमंजस
हाल ही में राशन कार्डों के नवीनीकरण और ई-केवाईसी (e-KYC) अनिवार्य करने को लेकर प्रशासन द्वारा सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। इसी प्रशासनिक सख्ती ने आम जनता के बीच एक अफवाह और भ्रम का माहौल पैदा कर दिया है, जिसके कारण पिछले कुछ घंटों में ऑनलाइन सर्च में अचानक रिकॉर्ड तोड़ तेजी आई है। लोगों में इस बात का डर है कि यदि समय रहते ई-केवाईसी पूरी नहीं हुई, तो उनका नाम राशन की सूची से हमेशा के लिए काट दिया जाएगा।
भविष्य का असर और सुधार की सख्त जरूरत
यह स्पष्ट है कि डिजिटलीकरण पारदर्शिता लाने का एक बेहतरीन माध्यम है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। जब तक सरकार इंटरनेट रहित या कम नेटवर्क वाले क्षेत्रों के लिए ऑफलाइन बैकअप या सुगम वैकल्पिक व्यवस्थाएं सुनिश्चित नहीं करती, तब तक तकनीकी प्रगति का यह लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाएगा। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड रिपोर्ट का निष्कर्ष यही है कि तकनीक इंसानों के लिए है, न कि इंसान तकनीक की जटिलताओं के लिए।







