वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच उम्मीद की किरण बनी भारतीय अर्थव्यवस्था
आज के दौर में जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी, महंगाई और बड़े भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है, तब भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देश जहां वित्तीय अस्थिरता का सामना कर रहे हैं, वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार अपनी मजबूती का परिचय दे रही है। देश के केंद्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में एक विस्तृत समीक्षा के जरिए यह साफ कर दिया है कि तमाम बाहरी दबावों के बावजूद देश का आर्थिक ढांचा पूरी तरह सुरक्षित और लचीला बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, सप्लाई चेन में रुकावट और युद्ध जैसे हालातों के कारण दुनिया भर के शेयर बाजारों और वित्तीय संस्थानों में घबराहट का माहौल है। ऐसे कठिन समय में रिजर्व बैंक का यह भरोसा देश के आम नागरिकों, निवेशकों और उद्योग जगत के लिए एक बड़ा संबल बनकर उभरा है। केंद्रीय बैंक की रिपोर्ट बताती है कि भारत ने अपनी आंतरिक नीतियों और मजबूत वित्तीय प्रबंधन के दम पर बाहरी झटकों से खुद को काफी हद तक सुरक्षित रखा है।
इस पूरी स्थिति का विश्लेषण करते हुए वित्तीय जानकारों का कहना है कि भारत की यह मजबूती रातों-रात तैयार नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे पिछले कुछ वर्षों में उठाए गए कड़े आर्थिक कदम और ढांचागत सुधार बड़ी वजह रहे हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि वे कौन-से पांच मुख्य आधार हैं, जिनके दम पर आरबीआई ने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर एक मजबूत स्तंभ के रूप में पेश किया है और जो देश की वित्तीय सेहत की रीढ़ साबित हो रहे हैं।
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मजबूत घरेलू मांग: अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में वहां की घरेलू मांग यानी कंजम्पशन की बहुत बड़ी भूमिका होती है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में यह ताकत सबसे बड़ा वरदान साबित हो रही है। रिजर्व बैंक के अनुसार, जब दुनियाभर के बाजारों में विदेशी मांग घट रही है और पश्चिमी देशों में लोग खर्च करने से बच रहे हैं, तब भारतीय उपभोक्ता बाजार में लगातार खरीदारी बनी हुई है। देश के भीतर खाने-पीने की चीजों से लेकर ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट और रिटेल सेक्टर में ग्राहकों की सक्रियता ने उद्योगों को मंदी की मार से बचाकर रखा है।
ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में उपभोग का स्तर स्थिर बना हुआ है, जिससे कंपनियों के मुनाफे और उत्पादन को गति मिल रही है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को बाहरी निर्यात पर निर्भर रहना पड़ता है और वहां जब ग्लोबल डिमांड गिरती है, तो संकट खड़ा हो जाता है। लेकिन भारत के मामले में स्थिति अलग है क्योंकि यहां की एक बहुत बड़ी आबादी अपनी घरेलू जरूरतों के दम पर बाजार को चलाए रखती है। यही वजह है कि बाहरी दुनिया में चाहे कितनी भी उथल-पुथल मचे, भारतीय बाजार का पहिया लगातार अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता रहता है।
"भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी इसका विशाल घरेलू बाजार और मजबूत आंतरिक मांग है, जो वैश्विक झटकों के बीच भी देश को सुरक्षित रखने का काम करती है और मंदी के प्रभावों को बेअसर बनाती है।"— वरिष्ठ वित्तीय विश्लेषक, द फ्रीलांस
बैंकिंग सेक्टर की सेहत में सुधार और बढ़ता भरोसा
किसी भी देश की वित्तीय रीढ़ वहां का बैंकिंग तंत्र होता है। कुछ साल पहले तक भारतीय बैंक भारी-भरकम एनपीए यानी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (फंसे हुए कर्ज) की समस्या से जूझ रहे थे, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था पर दबाव बन गया था। लेकिन पिछले कुछ समय में रिजर्व बैंक के कड़े नियमों और बैंकों के बेहतर प्रबंधन के चलते स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज देश के सरकारी और निजी दोनों ही बैंक बेहद मजबूत स्थिति में हैं। उनका पूंजीगत आधार काफी मजबूत हो चुका है और उनके पास एनपीए का स्तर घटकर पिछले कई सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।
बैंकों की बैलेंस शीट साफ होने से अब वे उद्योगपतियों, छोटे कारोबारियों और आम जनता को खुलकर कर्ज दे पा रहे हैं। लोन देने की प्रक्रिया आसान होने से देश में नए बिजनेस शुरू हो रहे हैं, मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिल रहा है और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। आरबीआई की रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि देश के बैंक किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं और उनके पास पर्याप्त वित्तीय बफर मौजूद है।
विदेशी मुद्रा भंडार का रिकॉर्ड स्तर और मजबूत बाह्य क्षेत्र
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मोर्चे पर किसी भी देश की ताकत उसके विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) से मापी जाती है। भारत ने इस मामले में पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। हमारे पास मौजूद विदेशी मुद्रा भंडार इतनी मजबूत स्थिति में है कि हम किसी भी प्रकार के बाहरी आर्थिक संकट या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार के उतार-चढ़ाव का आसानी से सामना कर सकते हैं। यह भंडार देश को आयात किए जाने वाले जरूरी सामान, विशेषकर कच्चे तेल और कोयले के भुगतान के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है।
जब दुनिया के कई विकासशील देशों को विदेशी कर्ज चुकाने और अपनी मुद्रा को बचाने के लाले पड़े हुए हैं, तब भारतीय रुपया अपनी स्थिरता बनाए रखने में कामयाब रहा है। रिजर्व बैंक की सूझबूझ भरी नीतियों के कारण विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित रखा गया है। निवेशकों का भरोसा इस बात पर कायम है कि भारत सरकार और केंद्रीय बैंक के पास किसी भी विदेशी झटके से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय हथियार मौजूद हैं, जिससे देश की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार मजबूत हो रही है.
महंगाई पर नियंत्रण और मौद्रिक नीति का संतुलन
महंगाई किसी भी आम नागरिक की जेब पर सबसे बड़ा प्रहार करती है। वैश्विक स्तर पर कमोडिटी की कीमतों में उछाल और युद्ध के माहौल के कारण दुनियाभर के देशों में महंगाई आसमान छू रही है। कई विकसित देशों में केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ानी पड़ी हैं, जिससे वहां की आर्थिक वृद्धि पर ब्रेक लग गया है। इसके विपरीत, भारतीय रिजर्व बैंक ने बेहद सूझबूझ और संतुलन के साथ मौद्रिक नीतियों का संचालन किया है। आरबीआई ने न केवल महंगाई दर को एक निश्चित दायरे में थाम कर रखा है, बल्कि आर्थिक विकास की रफ्तार को भी धीमा नहीं पड़ने दिया है।
केंद्रीय बैंक के इन सुनियोजित कदमों से यह सुनिश्चित हुआ है कि आम जनता को महंगाई की मार से राहत मिलती रहे और साथ ही उद्योग जगत को भी किफायती दरों पर कर्ज मिलता रहे। ब्याज दरों को संतुलित बनाए रखने से कार लोन, होम लोन और बिजनेस लोन लेने वाले आम लोगों पर अचानक बहुत बड़ा बोझ नहीं आया है, जिससे बाजार में सकारात्मक माहौल बना हुआ है।
डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी पूंजीगत व्यय का दम
भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में देश के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और सरकार द्वारा किए जा रहे भारी-भरकम पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) का बहुत बड़ा योगदान है। आज यूपीआई जैसी तकनीकों ने देश के कोने-कोने में आर्थिक लेनदेन को इतना पारदर्शी और सुगम बना दिया है कि छोटे से छोटा दुकानदार भी औपचारिक वित्तीय प्रणाली का हिस्सा बन चुका है। इससे अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर हुई है और टैक्स कलेक्शन में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार द्वारा सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों और आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण पर लगातार जो पैसा खर्च किया जा रहा है, उसने देश में विकास के नए रास्ते खोल दिए हैं। इस सरकारी निवेश से रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा हुए हैं और प्राइवेट सेक्टर को भी आगे आने का प्रोत्साहन मिला है।
निष्कर्ष: भविष्य की संभावनाओं से भरा भारतीय बाजार
अंत में यह कहा जा सकता है कि वैश्विक मोर्चे पर चाहे जितने भी संकट मंडरा रहे हों, भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी आंतरिक ताकत, मजबूत बैंकिंग प्रणाली, विशाल घरेलू बाजार और दूरदर्शी नीतियों के दम पर खुद को एक सुरक्षित और चमकते सितारे के रूप में स्थापित कर दिया है। रिजर्व बैंक का यह भरोसा इस बात की मुहर लगाता है कि आने वाले समय में भारत दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी अग्रणी स्थिति बनाए रखेगा, जिससे देश के हर नागरिक के लिए तरक्की के नए द्वार खुलेंगे।







