सेवाकाल पूरा, पर दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर
सरकारी नौकरी में अपनी जिंदगी के तीन से चार दशक खपा देने के बाद हर कर्मचारी यही उम्मीद करता है कि उसका बुढ़ापा सुकून से बीतेगा। रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन ही वह मुख्य सहारा होती है, जिससे बुजुर्ग अपना और अपने परिवार का खर्च चलाते हैं। लेकिन कई बार सरकारी महकमों की उदासीनता और लालफीताशाही इस सुकून को भी संघर्ष में बदल देती है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां दस्तावेजों में नाम की एक छोटी सी त्रुटि ने सेवानिवृत्त कर्मचारी को एक साल तक पाई-पाई के लिए मोहताज कर दिया।
मामला एक सरकारी विभाग का है, जहां एक सफाई कर्मचारी ने 35 साल तक ईमानदारी से अपनी सेवाएं दीं। जब उनके रिटायरमेंट का वक्त आया तो उन्हें लगा कि अब जीवन की दूसरी पारी आराम से कटेगी। मगर विभाग के बाबूओं और कागजी दस्तावेजों की सुस्ती ने उनके सामने ऐसा संकट खड़ा किया जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सर्विस बुक और आधार कार्ड के बीच का एक मामूली सा अंतर उनके लिए पहाड़ जैसा मुसीबत बन गया।
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आधार और सर्विस बुक की जंग में फंसी पेंशन
विभाग से रिटायर हुए इस कर्मचारी का नाम आधार कार्ड में एक तरीके से दर्ज था, जबकि पुरानी सर्विस बुक में उसमें एक छोटा सा स्पेस या वर्तनी का मामूली फर्क था। व्यक्ति वही था, चेहरा वही था, सरकारी रिकॉर्ड में उसकी उपस्थिति भी दर्ज थी, लेकिन 'सिस्टम' के सॉफ्टवेयर और नियमों के आगे यह इंसानियत और व्यावहारिकता बेदम साबित हुई। नियम के मुताबिक दोनों दस्तावेजों में नाम सौ प्रतिशत एक जैसे होने चाहिए थे, अन्यथा पेंशन पोर्टल उस नाम को स्वीकार करने से मना कर रहा था।
नतीजा यह हुआ कि कागजों की इस कागजी लड़ाई में कर्मचारी की पेंशन रोक दी गई। महीनों तक वह विभाग के चक्कर काटते रहे, बाबुओं की मेजें खटखटाते रहे, अधिकारियों के सामने हाथ जोड़ते रहे, लेकिन हर जगह से उन्हें सिर्फ नए दस्तावेजों के संशोधन की बात कहकर टाल दिया जाता था। इस पूरी प्रक्रिया में एक साल का लंबा वक्त बीत गया। इस दौरान उन्हें एक भी रुपया पेंशन के रूप में नहीं मिला, जिससे उनके सामने घर चलाने का गंभीर आर्थिक संकट पैदा हो गया।
एक कर्मचारी का दर्द नहीं, व्यवस्था का गंभीर आईना
यह अकेली किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। उसी विभाग के एक अन्य चौकीदार स्तर के कर्मचारी के साथ भी ऐसा ही हादसा हुआ। उनकी सर्विस बुक में नाम की वर्तनी में अंग्रेजी के एक अक्षर का अंतर था। इस एक अक्षर की गलती को सुधरवाने में भी उन्हें महीनों का समय लग गया। राज्य के विभिन्न विभागों में इस प्रकार की छोटी-छोटी गलतियों के कारण बुजुर्ग कर्मचारियों का उत्पीड़न आम बात हो गई है।
कर्मचारी यूनियनों और जानकारों का कहना है कि जब कोई कर्मचारी विभाग में प्रवेश करता है, तभी से उसके सभी दस्तावेजों का मिलान क्यों नहीं किया जाता? रिटायरमेंट के ठीक वक्त पर इन कमियों को उजागर करना और महीनों तक फाइलें दबाए रखना सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है। एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया और सुशासन की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर एक बुजुर्ग को अपने ही हक के पैसे पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
"सर्विस बुक और आधार समेत अन्य दस्तावेजों में अंतर को समय से दूर कराना अधिकारियों की भी बराबर जिम्मेदारी है। केवल कर्मचारी पर दोष मढ़कर विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। अकेले एक खंड में 80 से अधिक सेवानिवृत्त कर्मचारी इस तरह की समस्याओं से जूझ चुके हैं।" — रूपेश कुमार श्रीवास्तव, अध्यक्ष, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद
अधिकारियों का रुख और सिस्टम की मजबूरी
जब इस पूरे मामले ने तूल पकड़ा और उच्चाधिकारियों तक शिकायत पहुंची, तो जांच के आदेश तो दे दिए गए, लेकिन अंततः परिणाम ढाक के तीन पात वाला ही रहा। संबंधित खंड के अधिकारियों का कहना है कि नियमों के दायरे में रहते हुए ही काम किया जा सकता है। जब तक दस्तावेजों में संशोधन नहीं हो जाता, तब तक सरकारी पोर्टल पर भुगतान जारी करना तकनीकी रूप से संभव नहीं था।
हालांकि, सवाल यह उठता है कि जब कर्मचारी पिछले 35 सालों से उसी नाम से विभाग में काम कर रहा था और उसी नाम पर उसका वेतन बन रहा था, तो अचानक रिटायरमेंट के वक्त वह नाम गलत कैसे हो गया? क्या विभाग के अधिकारियों और वेतन बांटने वाले बाबुओं की यह जिम्मेदारी नहीं थी कि वे सेवाकाल के दौरान ही इन विसंगतियों को दूर करवा लेते? लेकिन सिस्टम की फितरत यही रही है कि गलती चाहे किसी की भी हो, सजा अंततः आम आदमी और निचले स्तर के कर्मचारी को ही भुगतनी पड़ती है।
सुधार की जरूरत और आगे की राह
इस तरह की घटनाएं हमारे प्रशासनिक ढांचे की संवेदनहीनता को उजागर करती हैं। जरूरत इस बात की है कि सरकार और संबंधित विभाग रिटायरमेंट से कम-से-कम एक साल पहले कर्मचारियों के सभी दस्तावेजों की प्री-ऑडिट और जांच प्रक्रिया शुरू कर दें। यदि कोई त्रुटि है, तो उसे समय रहते सुधारा जाए ताकि कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के दिन से ही उसकी पेंशन मिलने में कोई बाधा न आए।
बुढ़ापे में जब शरीर और आर्थिक स्थिति दोनों कमजोर हो जाते हैं, तब इस प्रकार की मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना किसी भी नागरिक के लिए बेहद कष्टदायक होती है। समय आ गया है कि डिजिटल व्यवस्था को इंसानी संवेदनाओं के साथ जोड़ा जाए, ताकि 'सिस्टम' की भूल का खामियाजा किसी रामलखन को अपनी जिंदगी की गाढ़ी कमाई रोककर न चुकाना पड़े।






