पेंशन बहाली की मांग खारिज होने के बाद शुरू हुआ नया विवाद
देशभर में शिक्षा जगत से जुड़े कर्मचारियों के लिए जीवनभर की मेहनत के बाद मिलने वाली पेंशन ही उनके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा होती है। लेकिन जब दशकों से मिल रही इस सामाजिक सुरक्षा को अचानक रोक दिया जाए, तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती है, इसका अंदाजा इन दिनों संकट का सामना कर रहे शिक्षकों की हालत को देखकर लगाया जा सकता है। राज्य के अनुदान प्राप्त महाविद्यालयों में लंबे समय तक अपनी सेवाएं देने वाले प्राध्यापक, अधिकारी और कर्मचारी इन दिनों भारी मानसिक और आर्थिक परेशानी के दौर से गुजर रहे हैं। मामला उस वक्त गंभीर हो गया जब सरकार की एक उच्च स्तरीय बैठक में कर्मचारियों की एक मांग को अस्वीकार किए जाने के बाद विभाग ने ऐसा कदम उठाया, जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी।
हाल ही में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में शिक्षकों और कर्मचारियों की ओर से एक प्रस्ताव रखा गया था। इस प्रस्ताव में मांग की गई थी कि कर्मचारियों को उस वेतनमान के आधार पर पेंशन दी जाए, जिस वेतनमान पर वे अपनी सेवा पूरी करके सेवानिवृत्त हुए हैं। सरकार ने लोकहित और वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए इस नई मांग को फिलहाल स्वीकार करने से इनकार कर दिया और इसे खारिज कर दिया। सरकार के इस फैसले के बाद लगा था कि स्थिति जस की तस बनी रहेगी और पहले से मिल रहा लाभ जारी रहेगा। लेकिन इसके ठीक विपरीत, प्रशासनिक मशीनरी ने इस निर्णय का ऐसा अर्थ निकाला जिसने सबको सकते में डाल दिया।
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मंत्रिपरिषद के फैसले की गलत व्याख्या का गंभीर आरोप
विवाद की असली जड़ प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसलों की व्याख्या को लेकर है। प्रादेशिक सेवानिवृत्त प्राध्यापक संघ और सेवारत शिक्षकों के संगठनों ने इस पूरी कार्रवाई के खिलाफ अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। संघ के प्रमुख पदाधिकारियों ने एक प्रेस वार्ता के दौरान साफ तौर पर आरोप लगाया कि उच्च शिक्षा विभाग ने मंत्रिपरिषद के आदेशों को मनमाने और गलत तरीके से समझा है। उनका कहना है कि सरकार ने केवल नई और बढ़ी हुई दरों के अनुसार पेंशन तय करने की नई व्यवस्था को स्वीकृति देने से मना किया था, न कि पहले से वर्षों से चली आ रही नियमित पेंशन को ही पूरी तरह बंद करने का कोई निर्देश दिया था।
पदाधिकारियों के मुताबिक, मंत्रिपरिषद के आधिकारिक कार्यसूची विवरण में केवल इतना स्पष्ट था कि संशोधित अथवा अंतिम वेतनमान के आधार पर पेंशन पुनरीक्षण की नई व्यवस्था को फिलहाल हरी झंडी नहीं दी जा रही है। इसका सीधा अर्थ यह था कि व्यवस्था पुरानी तर्ज पर ही चलती रहनी चाहिए थी। इसके बावजूद, विभाग के अधिकारियों ने नियमों की मनगढ़ंत व्याख्या करते हुए सितंबर महीने में ताबड़तोड़ ऐसे आदेश जारी कर दिए, जिन्होंने न केवल सेवानिवृत्त हो चुके लोगों के खातों में आने वाली राशि रोक दी, बल्कि भविष्य में रिटायर होने वाले कर्मचारियों की ग्रेच्युटी और पेंशन पात्रता पर भी तलवार लटका दी।
37 वर्षों से चली आ रही परंपरा पर अचानक लगा विराम
यह पूरा घटनाक्रम इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि राज्य में अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों के शिक्षकों और कर्मचारियों को पेंशन और ग्रेच्युटी का लाभ कोई कल या आज से नहीं मिल रहा है, बल्कि यह परंपरा पिछले लगभग 37 वर्षों से चली आ रही थी। पूर्व में जारी हुए शासनादेशों के तहत इन महाविद्यालयों के कर्मियों को तय नियमों के मुताबिक पांचवें वेतनमान के आधार पर पेंशन और चौथे वेतनमान के आधार पर ग्रेच्युटी का भुगतान नियमित रूप से किया जा रहा था। दशकों पुरानी इस व्यवस्था के अचानक ठप पड़ जाने से उन बुजुर्ग शिक्षकों के सामने जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है, जिन्होंने अपनी जवानी का अधिकांश समय शिक्षण कार्य और छात्रों के भविष्य को संवारने में समर्पित कर दिया था।
शिक्षक नेताओं का कहना है कि पेंशन किसी भी कर्मचारी के लिए भीख या कोई अनुग्रह राशि नहीं होती है, बल्कि यह उसकी पूरी जिंदगी की ईमानदारी भरी सेवा के बदले मिलने वाला कानूनी अधिकार और सामाजिक सुरक्षा का वह कवच है जो उसे बुढ़ापे में सम्मान के साथ जीने का संबल देता है। इतने लंबे समय से सुचारू रूप से चल रही व्यवस्था को अचानक एक झटके में समाप्त कर देना न केवल प्रशासनिक तानाशाही को दर्शाता है, बल्कि यह उन बुजुर्गों के साथ सीधा अन्याय है जिन्होंने अपनी पूरी कार्यकुशलता के साथ राज्य की शिक्षा प्रणाली को सींचा है।
सेवारत और सेवानिवृत्त शिक्षकों का फूटा गुस्सा, आंदोलन की चेतावनी
इस पूरे मामले को लेकर शिक्षक समुदाय में गहरी नाराजगी व्याप्त है। वर्तमान में लगभग चार सौ से अधिक प्राध्यापक, अधिकारी और कर्मचारी ऐसे हैं जो सीधे तौर पर इस संकट की चपेट में आ चुके हैं। इसके अलावा जो शिक्षक अभी अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उनके मन में भी भविष्य को लेकर भारी असुरक्षा की भावना घर कर गई है। संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि इस मनमाने फैसले को जल्द से जल्द वापस नहीं लिया गया तो राज्यभर के शिक्षक और कर्मचारी सड़कों पर उतरकर बड़ा आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने राज्य के मुख्यमंत्री, उच्च शिक्षा मंत्री और मुख्य सचिव से इस गंभीर मामले में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने की पुरजोर अपील की है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि सरकार इस मामले में पूरी मानवीय संवेदना और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए तत्काल प्रभाव से पुराने आदेशों को दुरुस्त करेगी और पेंशन भोगियों को उनका हक सुरक्षित रूप से दिलाएगी।
"उच्च शिक्षा विभाग ने मंत्रिपरिषद के निर्णय की पूरी तरह से गलत और मनमाने ढंग से व्याख्या की है। सरकार ने केवल वेतनमान संशोधन की नई मांग को टाला था, न कि पहले से मिल रही पेंशन को बंद करने का आदेश दिया था। 37 साल की सेवा के बाद शिक्षकों के साथ ऐसा सलूक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि तुरंत राहत नहीं मिली तो हम बड़े आंदोलन का रास्ता चुनेंगे।" — प्रो. डीएन शर्मा, महासचिव, प्रादेशिक सेवानिवृत्त प्राध्यापक संघ


