ग्लोबल उथल-पुथल के बीच भारतीय रुपये की चाल पर गहराया संकट
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल के बढ़ते आयात बिल के कारण भारतीय करेंसी पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्तमान में रुपया गिरकर 96 के स्तर पर कारोबार कर रहा है, जिससे वित्तीय बाजारों में चिंता का माहौल है। जानकारों का कहना है कि यदि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां ऐसी ही बनी रहीं, तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है।
देश के वित्तीय बाजारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या भारतीय रुपया जल्द ही अपने अब तक के सबसे निचले पायदान की ओर बढ़ने वाला है। शेयर बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों की सुस्ती और डॉलर की मजबूती ने घरेलू मुद्रा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। आम नागरिकों से लेकर बड़े निवेशकों तक की नजरें अब रिजर्व बैंक के अगले कदमों पर टिकी हुई हैं।
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कहा जा रहा है कि 97 और 99 का स्तर साबित हो सकता है बड़ा खतरा
वित्तीय बाजार के दिग्गजों और शोध विश्लेषकों का मानना है कि रुपये की कमजोरी का यह दौर यहीं नहीं थमने वाला है। कोटक सिक्योरिटीज के करेंसी, कमोडिटी और इंटरेस्ट रेट डेरिवेटिव्स रिसर्च हेड अनिंद्य बनर्जी ने चेतावनी दी है कि रुपया जल्द ही 97 के स्तर तक लुढ़क सकता है। इसके अलावा, यदि यह अहम सपोर्ट लेवल टूट जाता है, तो इसके 99 के स्तर तक पहुंचने की पूरी आशंका है।
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, जब रुपया इस तरह के मनोवैज्ञानिक स्तरों को पार करता है, तो विदेशी मुद्रा बाजार में बिकवाली का दबाव और ज्यादा बढ़ जाता है। इसका सीधा असर आयातित वस्तुओं की लागत पर पड़ता है, जिससे देश के भीतर महंगाई दर बढ़ने का खतरा भी पैदा हो जाता है।
"रुपये पर कई मोर्चों से दबाव बना हुआ है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और महंगे होते आयात ने स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यदि दबाव और बढ़ा, तो आने वाले दिनों में और गिरावट देखने को मिल सकती है।" — अनिंद्य बनर्जी, करेंसी रिसर्च हेड, कोटक सिक्योरिटीज
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली और पूंजी निकासी से बढ़ी मुश्किलें
भारतीय रुपये में आ रही इस बड़ी गिरावट के पीछे विदेशी निवेशकों द्वारा की जा रही अंधाधुंध बिकवाली एक मुख्य वजह है। रिपोर्टों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजारों से इस महीने भारी मात्रा में पूंजी निकाली है, जिससे मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है और रुपये की स्थिति कमजोर हुई है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान देश में आए विदेशी निवेश का एक बड़ा हिस्सा वापस अपने देश लौट चुका है। हालांकि, सरकार और केंद्रीय बैंक द्वारा FCNR(B) जैसे माध्यमों से पूंजी को आकर्षित करने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन बाजार पर बाहरी दबाव इतना अधिक है कि उसका तुरंत सकारात्मक असर दिखाई नहीं दे रहा है।
कच्चे तेल की कीमतें और आयात बिल ने बढ़ाई चिंता
घरेलू मुद्रा के कमजोर होने के पीछे ऊर्जा जरूरतों और कच्चे तेल का बढ़ता आयात बिल भी एक प्रमुख कारक है। वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की ऊंची कीमतों के कारण देश को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ज्यादा अमेरिकी डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं।
जब देश का आयात बिल बढ़ता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर स्वाभाविक रूप से दबाव पड़ता है। विमानन ईंधन और डीजल जैसी जरूरी चीजों की वैश्विक कीमतें ऊंची रहने के कारण आयातकों को अधिक भुगतान करना पड़ रहा है, जो अप्रत्यक्ष रूप से रुपये को नीचे खींच रहा है।
आरबीआई की मौद्रिक नीति और बाजार में संभावित हस्तक्षेप
इस पूरी परिस्थिति के बीच बाजार की निगाहें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की आगामी रणनीतियों पर टिकी हैं। मुद्रा बाजार के जानकारों का अनुमान है कि बढ़ती महंगाई और वैश्विक विनिमय दर के दबाव को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बदलाव या बाजार में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का विकल्प चुन सकता है।
आरबीआई के पास देश के विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत सुरक्षा कवच मौजूद है, जिसका उपयोग जरूरत पड़ने पर रुपये को अत्यधिक उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए किया जाता है। हालांकि, केवल केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से ही वैश्विक स्तर पर बन रहे दबाव को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता, इसलिए निवेशकों और नीति निर्माताओं दोनों के लिए यह समय बेहद सावधानी से कदम बढ़ाने का है।








