उत्तर प्रदेश की सियासत में साल 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर सरगर्मी अभी से परवान चढ़ने लगी है। सभी प्रमुख दल अपनी-अपनी रणनीति को अमलीजामा पहनाने में जुट गए हैं। इस कड़ी में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने एक बड़ा वैचारिक और संगठनात्मक दांव चला है। पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने चुनावी वैतरणी पार करने के लिए उस फॉर्मूले को हथियार बनाया है, जिसे कभी उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बहुजन समाज पार्टी की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था। सपा अब केवल हवा हवाई नारों या बड़े राजनीतिक सम्मेलनों के भरोसे बैठने के बजाय सीधे जमीन पर उतरकर कैडर आधारित सोशल इंजीनियरिंग का ताना-बाना बुन रही है।
बसपा के पुराने राजनीतिक हथियार से अखिलेश का चुनावी वार
राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि समाजवादी पार्टी ने दो दशक पुरानी उस रणनीति को फिर से जीवंत किया है, जिससे कभी मायावती ने उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ कब्जा जमाया था। बसपा अपने शुरुआती और स्वर्णिम दौर में छोटी-छोटी कैडर बैठकों, स्थानीय स्तर के संवाद और बस्तियों तथा गांवों में चौपाल लगाकर अपने वैचारिक आधार को मजबूत करती थी। अब कुछ ऐसा ही रास्ता समाजवादी पार्टी ने भी चुन लिया है। पार्टी का मानना है कि केवल बड़े मंचों से भाषण देने या भीड़ जुटाने से चुनाव के दिन वह वोट में तब्दील नहीं होती, जिसके लिए स्थायी बूथ और कैडर नेटवर्क का होना बेहद जरूरी है।
इस नई कार्ययोजना के तहत सपा ने अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को कागजों से निकालकर सीधे गांवों की चौपालों और गलियों तक पहुंचा दिया है। पार्टी नेतृत्व ने साफ निर्देश दिए हैं कि हर वर्ग के बीच जाकर सीधा संवाद स्थापित किया जाए। इसके लिए उन नेताओं को आगे किया जा रहा है जिनकी अपनी जातियों और समुदायों के बीच खासी पैठ और मजबूत पकड़ मानी जाती है। यह रणनीति इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सपा इस बार चुनाव में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहती और हर मोर्चे पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है।
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सजातीय चौपालों के जरिए नेताओं को सौंपी गई बड़ी जिम्मेदारी
संगठन को बूथ स्तर तक धार देने के लिए समाजवादी पार्टी ने अपने विधायकों, पूर्व मंत्रियों, पूर्व विधायकों और जिला पंचायत अध्यक्ष स्तर के नेताओं को मैदानी जंग में उतार दिया है। हर कद्दावर चेहरे को उसकी अपनी जाति के बहुल इलाकों और विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उदाहरण के लिए, पार्टी ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों जैसे पाल, शाक्य, मौर्य, सैनी और निषाद समाज के नेताओं को खास तौर पर सक्रिय किया है। वे अपने समुदाय के लोगों के साथ गुप्त या खुली बैठकें नहीं बल्कि खुली 'पीडीए जन चौपाल' कर रहे हैं, जहां पार्टी की नीतियों के साथ-साथ उनके अधिकारों पर भी खुलकर चर्चा हो रही है।
विभिन्न जिलों में नेताओं की फौज उतारकर पार्टी ने यह सुनिश्चित किया है कि हर वर्ग के मतदाता तक सीधे सपा का संदेश पहुंचे। पार्टी के दिग्गज नेता और सांसद लगातार अलग-अलग जिलों का दौरा कर रहे हैं। इन छोटी बैठकों का मुख्य उद्देश्य जनता के मन में यह विश्वास पैदा करना है कि समाजवादी पार्टी सिर्फ एक वर्ग या समुदाय की पार्टी नहीं है, बल्कि वह समाज के हर उस शख्स की आवाज है जो हाशिए पर खड़ा है। इन चौपालों में मिलने वाले फीडबैक को सीधे पार्टी मुख्यालय तक पहुंचाया जा रहा है ताकि चुनावी रणनीति में समय रहते जरूरी बदलाव किए जा सकें।
यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर नए सामाजिक गठजोड़ की तलाश
पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी की पहचान एम-वाई यानी मुस्लिम और यादव समीकरण के इर्द-गिर्द सिमटी मानी जाती रही है। विरोधी दल भी लगातार इस मुद्दे पर सपा को घेरते आए हैं। लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने इस पारंपरिक दायरे को तोड़ने की ठोस कोशिश शुरू कर दी है। पार्टी जानती है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी केवल दो जातियों के बूते हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए राज्य के अन्य तमाम पिछड़ी जातियों और दलित उप-जातियों को अपने पाले में लाना अनिवार्य है। यही वजह है कि कुर्मी, शाक्य, कुशवाहा, प्रजापति और राजभर जैसी जातियों के स्थानीय प्रभावशाली चेहरों को पार्टी की मुख्यधारा में आगे बढ़ाया जा रहा है।
इसके साथ ही सवर्ण जातियों, विशेषकर ब्राह्मण समाज को भी जोड़ने की रणनीति पर गुप्त रूप से काम चल रहा है। पार्टी यह संदेश देने की पूरी कोशिश कर रही है कि पीडीए का दायरा बहुत व्यापक है और इसमें हर उस व्यक्ति के लिए जगह है जो बदलाव चाहता है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर जातियों को साधना और उन्हें एक वैचारिक सूत्र में पिरोना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। विभिन्न जातियों के अपने स्थानीय समीकरण और अंतर्विरोध होते हैं, जिन्हें साधना सपा के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
भीड़ को वोट में बदलना और कैडर तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती
किसी भी राजनीतिक दल के लिए भीड़ जुटाना और बात को भाषणों तक सीमित रखना आसान होता है, लेकिन उसे स्थायी कैडर और अटूट वोट बैंक में तब्दील करना बेहद कठिन काम है। समाजवादी पार्टी के सामने इस समय यही सबसे बड़ी और असली चुनौती आन खड़ी हुई है। पार्टी भले ही जन चौपालों और कैडर पंचायतों के जरिए जनता के बीच पहुंच रही है, लेकिन यह बैठकें सिर्फ मनोरंजन या औपचारिक भाषण बनकर न रह जाएं, इस पर बारीक नजर रखी जा रही है। यदि इन बैठकों से निकला जोश चुनाव के दिन तक पोलिंग बूथ तक नहीं पहुंचा, तो सारी मेहनत धरी की धरी रह जाएगी।
"समाजवादी पार्टी का यह कैडर मॉडल निश्चित रूप से एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग है। जब तक आप गांवों के भीतर जाकर लोगों के मन का डर और अविश्वास दूर नहीं करेंगे, तब तक चुनावी वैतरणी पार करना मुश्किल होगा। देखना यह है कि यह जमीनी संवाद कितनी दूर तक असर दिखाता है।" — वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
आने वाले दिनों में सपा इस अभियान को और ज्यादा आक्रामक तरीके से बढ़ाने की योजना बना रही है। पार्टी के तमाम प्रकोष्ठों को सक्रिय कर दिया गया है ताकि युवाओं और महिलाओं को भी इस कैडर बेस कैंपेन से जोड़ा जा सके। 2027 के चुनावी रण में जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि उत्तर प्रदेश का सियासी रण इस बार बेहद दिलचस्प और कांटे की टक्कर वाला होने जा रहा है, जहां हर एक वोट के लिए कड़ा संघर्ष देखने को मिलेगा।








