सरकारी तंत्र की लापरवाही और उदासीनता का एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है, जहां जीवित इंसानों को कागजों में मृत घोषित करके उनके हक का राशन छीन लिया गया था। उत्तर प्रदेश के संभल जिले के सौंधन की मिलक गांव में रहने वाले आठ गरीब परिवार पिछले कई सालों से अपने ही जीवित होने का सबूत देने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे। हैरानी की बात यह है कि सिस्टम की फाइलों में इन सभी को मृत मान लिया गया था, जिसके चलते इनके राशन कार्ड से नाम और यूनिट काट दिए गए थे।
लेकिन, जब मीडिया ने इस गंभीर प्रशासनिक चूक और संवेदनहीनता को प्रमुखता से उठाया, तो जिम्मेदारों की नींद खुली। जांच के बाद न सिर्फ जीवित लोगों के नाम दोबारा राशन कार्ड में जोड़े गए, बल्कि इस पूरी धांधली में शामिल राशन डीलर के परिजनों पर भी सख्त कार्रवाई की गई। इस घटना ने एक बार फिर राशन वितरण प्रणाली और सत्यापन प्रक्रिया में मौजूद बड़ी खामियों को उजागर कर दिया है.
सालों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे पीड़ित, कागजों में हो चुके थे 'अमर'
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब गांव में राशन कार्ड का सत्यापन किया जा रहा था। सत्यापन प्रक्रिया के दौरान प्रेम शंकर, योगेंद्र, सत्येंद्र, प्रमोद, बनी सिंह, सुभाष, विजय प्रताप और गोविंद राय नाम के आठ लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दिखा दिया गया। नियम और प्रक्रिया के तहत इन सभी के नाम डेटाबेस से हटा दिए गए। इनमें से कई परिवार बेहद गरीब और भूमिहीन हैं, जिनके लिए राशन कार्ड ही जीवनयापन का मुख्य सहारा है।
नाम कटने के बाद से ही ये सभी लोग कभी कोटेदार तो कभी पूर्ति विभाग के दफ्तरों के चक्कर काटने लगे। लेकिन सरकारी फाइलों में 'मृत' दर्ज हो चुके इन लोगों की बात सुनने वाला कोई नहीं था। चूंकि सिस्टम में उनकी मौत दर्ज हो चुकी थी, इसलिए नया नाम जुड़वाने या यूनिट बहाल करवाने की कोई भी ऑनलाइन या ऑफलाइन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही थी। पीड़ित परिवार हर जगह गुहार लगाकर थक चुके थे, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी सामने नहीं आ रहा था.
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मीडिया की रिपोर्ट के बाद जागा प्रशासन, अखबार ने खोली पोल
जब आम जनता की इन समस्याओं की सुनवाई कहीं नहीं हुई, तो मीडिया ने इस मामले को गहराई से उठाया। इस लापरवाही को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया, जिसमें बताया गया कि कैसे सरकारी सिस्टम में जीवित इंसानों को मृत दिखाकर उनके हक का राशन छीना जा रहा है। इस खबर के प्रकाशित होते ही प्रशासन में हड़कंप मच गया। उच्चाधिकारियों ने तुरंत मामले का संज्ञान लिया और संबंधित अधिकारियों को मामले की तत्काल जांच के आदेश दिए।
पूर्ति विभाग की टीम ने गांव में जाकर दस्तावेजों की फिर से पड़ताल की। जांच में यह साफ हो गया कि जिन लोगों को मृत दिखाया गया था, वे सभी जीवित हैं और असलियत में भयानक गरीबी का सामना कर रहे हैं। यह सत्यापन प्रक्रिया में की गई एक बड़ी और अमानवीय भूल थी, जिसे तुरंत सुधारा गया।
"अभिलेखों में जो कमियां थीं, उन्हें दूर कर सभी संबंधित लोगों के नाम राशन कार्ड में जोड़ दिए गए हैं। राशन डीलर के पति और बेटे के नाम दर्ज अवैध अंत्योदय कार्ड से उनके नाम हटा दिए गए हैं। अब सभी पात्रों को नियमित रूप से खाद्यान्न मिलेगा।"
— राजेंद्र कुमार, पूर्ति निरीक्षक
राशन डीलर के परिवार पर भी गिरी गाज, अवैध कार्ड से कटे नाम
इस पूरी जांच के दौरान एक और बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया। जिस राशन डीलर के जरिए गांव में वितरण का काम हो रहा था, उसी डीलर के परिवार ने नियमों को ताक पर रखकर बड़ा फायदा उठाया हुआ था। राशन डीलर गंगावती के पति दौलतराम और उनके बेटे शिव कुमार के नाम पर अंत्योदय राशन कार्ड बना हुआ था, जबकि वे इस श्रेणी में आने के योग्य नहीं थे।
जांच के बाद पूर्ति विभाग ने न केवल गरीबों के नाम बहाल किए, बल्कि राशन डीलर के पति और बेटे के नाम भी अंत्योदय कार्ड से हमेशा के लिए हटा दिए। इस कार्रवाई से स्थानीय लोगों में राहत की सांस ली है, क्योंकि उन्हें अब समझ आ गया है कि सिस्टम में पारदर्शिता लाने के लिए आवाज उठाना कितना जरूरी है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सत्यापन पर खड़े हुए बड़े सवाल
इस घटना ने देश भर की राशन वितरण और ई-केवाईसी प्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह उठता है कि बिना किसी पुख्ता मृत्यु प्रमाण पत्र के, सिर्फ मौखिक या फर्जी रिपोर्ट के आधार पर जीवित इंसानों को मृत कैसे घोषित कर दिया जाता है? क्या जमीनी स्तर पर सत्यापन करने वाले कर्मचारियों ने कभी इन परिवारों के घर जाकर हकीकत जानने की कोशिश नहीं की?
जानकारों का मानना है कि सरकारी योजनाओं में इस तरह की गड़बड़ियां अक्सर भ्रष्टाचार और मिलीभगत की ओर इशारा करती हैं। अपात्र लोग कोटेदारों की मदद से सरकारी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं और असली हकदार अपने ही हक के लिए दर-दर भटकते हैं। संभल की इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि अगर मीडिया और सतर्क नागरिक समय पर आवाज न उठाएं, तो आम आदमी का सिस्टम से पिस जाना तय है। फिलहाल, सभी आठ पीड़ित परिवारों के चेहरे पर अब खुशी लौट आई है क्योंकि उन्हें उनका हक वापस मिल गया है.






