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सऊदी-इजरायल गुप्त बैठकें और बदलता मिडिल ईस्ट: कूटनीतिक गलियारों में पाकिस्तान क्यों पड़ रहा अलग-थलग?

मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। सऊदी अरब, जॉर्डन और मोरक्को के साथ इजरायली नेतृत्व की संभावित बैठकों और कूटनीतिक चालों के बीच पाकिस्तान क्षेत्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ता नजर आ रहा है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•1 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•40
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सऊदी-इजरायल गुप्त बैठकें और बदलता मिडिल ईस्ट: कूटनीतिक गलियारों में पाकिस्तान क्यों पड़ रहा अलग-थलग?
📷 सऊदी-इजरायल गुप्त बैठकें और बदलता मिडिल ईस्ट: कूटनीतिक गलियारों में पाकिस्तान क्यों पड़ रहा अलग-थलग? — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। सऊदी अरब, जॉर्डन और मोरक्को के साथ इजरायली नेतृत्व की संभावित बैठकों और कूटनीतिक चालों के बीच पाकिस्तान क्षेत्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ता नजर आ रहा है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

मध्य-पूर्व यानी मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में एक बार फिर भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। पश्चिम एशिया के कूटनीतिक गलियारों से छनकर आ रही खबरें बताती हैं कि सऊदी अरब, जॉर्डन और मोरक्को जैसे प्रभावशाली देश इजरायल के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की जुगत में हैं। हालांकि एक तरफ जहां खाड़ी के देश अपने राष्ट्रीय हितों को साधने के लिए कड़े तेवर अपना रहे हैं और इजरायल को गंभीर परिणामों की चेतावनी भी दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गुप्त बैठकों और पर्दे के पीछे की कूटनीति का दौर तेजी से परवान चढ़ रहा है। द फ्रीलान्स की विशेष पड़ताल में यह बात सामने आई है कि इस पूरी बिसात पर इस्लामाबाद की नीतियां उसे धीरे-धीरे पूरी तरह अलग-थलग करती जा रही हैं।

नेतन्याहू के तीखे बोल और पाकिस्तान की दोहरी कूटनीति

हाल ही में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक कड़े बयान में पाकिस्तान पर सीधा हमला बोला। नेतन्याहू ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने अतीत में अमेरिका और इजरायल के बीच दूरियां और दुश्मनी पैदा करने की कोशिश की थी। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान का यह दोहरा रुख अब वैश्विक मंचों पर बेनकाब हो चुका है। एक तरफ जहां मुस्लिम जगत में खुद को रहनुमा साबित करने की होड़ मची है, वहीं पाकिस्तान की आंतरिक आर्थिक बदहाली और विदेश नीति की विफलता उसे पश्चिमी और खाड़ी देशों के बीच अप्रासंगिक बनाती जा रही है। इसके विपरीत, आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता के मुद्दों पर भारत की संतुलित और मजबूत कूटनीति ने वैश्विक मंचों पर नई लकीर खींच दी है, जिसकी सराहना खुद इजरायली प्रधानमंत्री जैसे नेता कर रहे हैं।

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सऊदी अरब, जॉर्डन और मोरक्को का बदला हुआ रुख

भले ही गाजा संघर्ष और फिलिस्तीन के मुद्दों पर सऊदी अरब समेत तमाम खाड़ी देश इजरायल की आक्रामक नीतियों की खुलकर आलोचना कर रहे हैं और गंभीर परिणामों की चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन कूटनीति के जानकारों का मानना है कि बंद कमरों में 'अब्राहम Accords' की तर्ज पर नए समीकरण बुने जा रहे हैं। जॉर्डन और मोरक्को की सामरिक स्थिति ऐसी है कि वे पश्चिमी देशों और इजरायल के साथ पूरी तरह संबंध नहीं काट सकते। सऊदी अरब का विजन 2030 भी क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक विकास की मांग करता है, जिसके चलते रियाद अब पारंपरिक मजहबी नारों से आगे बढ़कर व्यावहारिक विदेश नीति पर जोर दे रहा है। ऐसे में, पाकिस्तान का पुराना और कट्टर नैरेटिव खाड़ी देशों के नए विजन में फिट नहीं बैठता।

वैचारिक चरमपंथ और मौलानाओं के बयानों से बढ़ रही असहजता

सऊदी अरब की धरती पर हाल ही में पाकिस्तानी मौलानाओं द्वारा दिए गए बयानों ने भी खाड़ी देशों को असहज किया है। यमन के हूती विद्रोहियों को लेकर दिए गए बयानों और धार्मिक मंचों पर राजनीतिक बयानबाजी ने खाड़ी देशों की आंतरिक सुरक्षा और शांति को प्रभावित करने की कोशिश की है। सऊदी प्रशासन इस तरह की हरकतों को लेकर बेहद सख्त हो चुका है। रियाद में बैठकर क्षेत्रीय स्थिरता के खिलाफ माहौल बनाने वाले तत्वों के कारण पाकिस्तानी कूटनीति को भारी झटका लगा है और खाड़ी देशों में पाकिस्तानी नागरिकों और संगठनों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जाने लगी है।

भविष्य का असर: क्षेत्रीय राजनीति में हाशिए पर इस्लामाबाद

इन तमाम घटनाओं का दूरगामी परिणाम यह होगा कि मध्य-पूर्व के देश अब धर्म के चश्मे से बाहर निकलकर विशुद्ध रूप से आर्थिक और सामरिक हितों के आधार पर फैसले लेंगे। इजरायल के साथ व्यापारिक, तकनीकी और सामरिक समझौतों के नए द्वार खुल रहे हैं, जिसमें भारत जैसी उभरती हुई वैश्विक शक्तियां अहम भूमिका निभा रही हैं। इसके उलट, आंतरिक कलह, आर्थिक दिवालियापन और कूटनीतिक अदूरदर्शिता के चलते पाकिस्तान इस नई व्यवस्था में कहीं ठहरता नजर नहीं आ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस्लामाबाद अपनी पुरानी नीतियों से तौबा कर नई वास्तविकताओं को स्वीकार करता है या फिर मिडिल ईस्ट के इस भू-राजनीतिक बदलाव में पूरी तरह हाशिए पर चला जाता है।

'कूटनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। खाड़ी के बदलते समीकरण इस बात की गवाही दे रहे हैं कि जो देश वक्त के साथ नहीं बदलेंगे, वे इतिहास के पन्नों में पीछे छूट जाएंगे।'
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