नई दिल्ली/रियाद/दमिश्क — पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर बहुत बड़े और चौंकाने वाले बदलाव देखने को मिल रहे हैं। सऊदी अरब के ताकतवर शासक और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने यमन के हूती विद्रोहियों के बढ़ते हमलों से निपटने के लिए एक बड़ा कूटनीतिक दांव चला है। खाड़ी देशों से मिल रही गुप्त और पुख्ता जानकारियों के मुताबिक सऊदी नेतृत्व ने अब सीरिया की सरकार से सीधा संपर्क साधा है। इस कूटनीतिक पहल का मुख्य उद्देश्य हूतियों के खिलाफ इस लंबी लड़ाई में सीरियाई सैन्य और खुफिया तंत्र से सहयोग हासिल करना है। क्षेत्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सऊदी अरब अब अपनी सुरक्षा के घेरे को और अधिक मजबूत और विस्तृत करने के लिए अपने पुराने क्षेत्रीय विरोधियों के साथ भी हाथ मिलाने से पीछे नहीं हट रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान की ओर से भी एक बहुत बड़ा और खुला कबूलनामा सामने आया है। पाकिस्तानी संसद और सैन्य हलकों से बाहर आई आधिकारिक जानकारियों के अनुसार इस्लामाबाद ने आधिकारिक तौर पर यह मान लिया है कि उसकी सेना और वायुसेना के प्रशिक्षित जवान इस समय सऊदी अरब की धरती पर तैनात हैं। पिछले कई सालों से इस बात को लेकर कयास लगाए जा रहे थे और कई बार गोपनीयता बरती जाती थी कि पाकिस्तानी सैनिक सऊदी सीमाओं की सुरक्षा में मदद कर रहे हैं। अब पाकिस्तानी रक्षा अधिकारियों ने खुद इस बात पर मुहर लगा दी है कि उनके सैनिक सऊदी अरब के रणनीतिक ठिकानों और हवाई सुरक्षा व्यवस्था को संभालने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इस खुलासे के बाद दक्षिण एशिया और खाड़ी देशों के रिश्तों पर एक बार फिर से नई बहस छिड़ गई है कि क्या पाकिस्तान अपनी सेना का इस्तेमाल सीधे तौर पर यमन सीमा के पास हूतियों के खिलाफ संघर्ष में झोंक रहा है।
सऊदी अरब की रणनीति और सीरिया से मदद की गुहार के मायने
सऊदी अरब और सीरिया के बीच लंबे समय से कूटनीतिक दूरियां रही हैं, खासकर सीरियाई गृह युद्ध के दौरान कई ऐसे मोड़ आए जब दोनों देश एक-दूसरे के बिल्कुल खिलाफ खड़े नजर आए थे। लेकिन पिछले कुछ महीनों में मध्य एशिया के राजनीतिक समीकरण बहुत तेजी से पलटे हैं। सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के साथ अरब देशों के रिश्ते सुधरे हैं और अब रियाद सरकार सीरियाई अनुभव का फायदा उठाना चाहती है। हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब के तेल भंडारों, रिफाइनरियों और महत्वपूर्ण ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल से हमले करते रहे हैं। अमेरिकी और पश्चिमी देशों की मदद के बावजूद सऊदी रक्षा प्रणाली को इन हमलों को रोकने में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में सीरियाई सेना, जो सालों से कड़े गृह युद्ध और शहरी जंग का सामना करती आ रही है, उसकी रणनीतिक और मैदानी विशेषज्ञता को सऊदी शासक अपने पक्ष में भुनाना चाहते हैं।
दूसरी तरफ, पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब में अपनी फौज की मौजूदगी का सार्वजनिक रूप से कबूल करना घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से बहुत संवेदनशील मुद्दा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है और उसे सऊदी अरब से लगातार आर्थिक मदद, कर्ज और तेल के मोर्चे पर रियायतें मिलती रही हैं। ऐसे में रियाद की हर सैन्य और सामरिक जरूरत को पूरा करना इस्लामाबाद की मजबूरी भी बन चुका है। विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना की यह तैनाती केवल प्रशिक्षण या शांति रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात की गारंटी है कि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तानी सैनिक सऊदी धरती की रक्षा के लिए सीधे युद्ध के मैदान में भी उतर सकते हैं। पाकिस्तान के इस कबूलनामे से देश के भीतर राजनीतिक दलों और जानकारों के बीच इस बात पर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं कि क्या पाकिस्तान को दूसरे देशों के युद्ध में अपनी फौज को इस तरह झोंकना चाहिए।
हूती विद्रोहियों का बढ़ता खतरा और क्षेत्रीय देशों की चिंताएं
यमन के हूती विद्रोही पिछले कुछ सालों में हथियारों और तकनीक के मामले में बेहद ताकतवर हो गए हैं। उन्हें ईरान का समर्थन मिलने की बात भी समय-समय पर सामने आती रही है, हालांकि तेहरान इस बात से इनकार करता रहा है। लाल सागर और अदन की खाड़ी से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर हूतियों के हमलों ने वैश्विक व्यापार की कमर तोड़ दी है। सऊदी अरब के लिए यह बहुत बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि उसकी सीमाएं यमन से मिलती हैं और सीमान्त इलाकों में लगातार संघर्ष का माहौल बना रहता है। सऊदी नेतृत्व यह अच्छी तरह समझ चुका है कि केवल पश्चिमी हथियारों और रक्षा प्रणालियों के भरोसे हूतियों के इस हाइब्रिड युद्ध का मुकाबला नहीं किया जा सकता है। यही वजह है कि अब सऊदी अरब ने क्षेत्रीय ताकतों, सीरियाई सैन्य तंत्र और पाकिस्तानी सैनिकों के साथ मिलकर एक साझा और मजबूत मोर्चा तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
द फ्रीलान्स की इस जमीनी और कूटनीतिक पड़ताल से साफ पता चलता है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की राजनीति और अधिक जटिल होने वाली है। एक तरफ जहाँ हूती विद्रोही किसी भी दबाव में झुकने को तैयार नहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब अपने पुराने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। पाकिस्तान का यह कबूलनामा कि उसकी फौज सऊदी अरब में तैनात है, इस बात की तस्दीक करता है कि खाड़ी देशों की सुरक्षा में पाकिस्तानी सैनिकों की भूमिका बेहद अहम बनी हुई है। जैसे-जैसे सीरिया और सऊदी अरब के बीच सैन्य सहयोग की ये बातें आगे बढ़ेंगी, वैसे-वैसे ईरान, अमेरिका और यमन के राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रियाएं तेज होंगी। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इस नए और दिलचस्प मोड़ पर हमारी नजर लगातार बनी हुई है।





