दिल्ली के इंडिया गेट पर गरमाई सियासत, आम आदमी पार्टी का बड़ा प्रदर्शन
देश की राजधानी नई दिल्ली के पाश इलाके इंडिया गेट पर रविवार को उस समय राजनीतिक पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया, जब आम आदमी पार्टी (AAP) के तमाम वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए। यह पूरा विरोध प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित किया गया था। इसके साथ ही, हाल ही में कुछ महिला पत्रकारों के साथ कथित रूप से हुई बदसलूकी और दुर्व्यवहार के मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग भी इस मार्च का मुख्य एजेंडा थी।
सुबह से ही इंडिया गेट और उसके आस-पास के इलाकों में भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी गई थी। जैसे ही आप नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जंतर-मंतर की तरफ अपना मार्च बढ़ाने की कोशिश की, पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें रोक लिया। स्थिति को देखते हुए वहां तैनात सुरक्षा कर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन ने एक बड़े राजनीतिक टकराव का रूप ले लिया, जहां दोनों तरफ से तनाव साफ तौर पर महसूस किया जा रहा था।
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सौरभ भारद्वाज को हिरासत में लेने के दौरान हुआ जबरदस्त ड्रामा
इस पूरे विरोध प्रदर्शन के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज के साथ हुई कथित धक्का-मुक्की और पुलिसिया कार्रवाई की रही। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और आप नेताओं के दावों के मुताबिक, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए अत्यधिक बल का प्रयोग किया। इस दौरान सौरभ भारद्वाज को जमीन पर गिराए जाने और उनके साथ अमानवीय तरीके से पेश आने के आरोप लगाए गए।
घटना के तुरंत बाद सौरभ भारद्वाज ने खुद सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी आपबीती साझा की और पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने कैमरों की नजरों से बचाने और उनकी पहचान छिपाने के उद्देश्य से उन्हें बेहद अपमानजनक तरीके से उठाया। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां विपक्षी दल लगातार दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप मढ़ रहे हैं।
कैमरों से चेहरा छिपाने के लगे गंभीर आरोप, हवा में लहराते दिखे जूते
सौरभ भारद्वाज ने अपने एक बयान में घटना के दर्दनाक और हैरान करने वाले पहलुओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंटा गया है। उन्होंने तंज कसते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि किस तरह से उन्हें जबरन उठाकर गाड़ियों में डाला गया और इस दौरान मीडिया के कैमरों से उनका चेहरा बचाने का प्रयास किया गया।
"ये हवा में मेरे जूते हैं। आज इंडिया गेट पर दिल्ली पुलिस ने मुझे उल्टा कर दिया ताकि कैमरों में मेरा चेहरा कैद न हो सके। देश में लोकतंत्र का इससे बुरा हाल पहले कभी नहीं देखा गया है।" — सौरभ भारद्वाज, प्रदेश अध्यक्ष, आम आदमी पार्टी (दिल्ली)
वायरल हो रहे वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे सुरक्षाकर्मी प्रदर्शनकारी नेताओं को घेरकर जबरन गाड़ियों की तरफ खींचते हुए ले जा रहे हैं। इस खींचतान के दौरान कई अन्य पार्टी कार्यकर्ताओं को भी मामूली चोटें आईं और उन्हें भी हिरासत में लेकर नजदीकी थानों में भेज दिया गया। पुलिस प्रशासन का कहना था कि इस इलाके में धारा 144 और निषेधाज्ञा के नियमों का उल्लंघन किया जा रहा था, जिसके कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा।
अरविंद केजरीवाल का तीखा पलटवार, हिटलरशाही की तुलना
इस पूरे घटनाक्रम के तूल पकड़ने के बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बेहद आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया। उन्होंने सोशल मीडिया और प्रेस बयानों के जरिए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा। केजरीवाल ने कहा कि देश में तानाशाही इस कदर बढ़ चुकी है कि अब शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना और विरोध जताना भी एक बड़ा अपराध बना दिया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि जिस प्रकार से चुने हुए जनप्रतिनिधियों और आंदोलनकारियों के साथ बर्ताव किया जा रहा है, वह बेहद निंदनीय और लोकतंत्र के लिए एक काला धब्बा है। केजरीवाल ने अपनी प्रतिक्रिया में आरोप लगाया कि मौजूदा शासनकाल में असहमति की हर आवाज को कुचलने का प्रयास किया जा रहा है और देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात पैदा कर दिए गए हैं।
विपक्ष और शासन के बीच बढ़ती तकरार, आगे क्या?
इंडिया गेट पर हुई इस झड़प और गिरफ्तारियों के बाद राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति पूरी तरह से उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को लेकर लगातार आक्रामक बनी हुई है और इसे जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बता रही है, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा एजेंसियों और सत्ताधारी दल का तर्क है कि कानून-व्यवस्था को बनाए रखना प्रशासन की पहली प्राथमिकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक गहरा सकता है क्योंकि विपक्षी दल इसे एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहे हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने और महिला पत्रकारों के सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर हुए इस प्रदर्शन ने एक बार फिर केंद्र और दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी है, जिसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।








