नागोया की धरती पर सावन बरवाल का ऐतिहासिक कारनामा
खेल के मैदान से भारत के लिए एक बेहद गर्व करने वाली खबर सामने आई है। जापान के नागोया में खेले जा रहे महामुकाबले में भारतीय एथलीट सावन बरवाल ने वो कर दिखाया, जिसका पूरा देश चार दशकों से अधिक समय से इंतजार कर रहा था। पुरुष मैराथन स्पर्धा में अपनी रफ्तार का जादू बिखेरते हुए सावन ने पोडियम पर दूसरा स्थान हासिल किया और सिल्वर मेडल अपने गले में पहन लिया। इस उपलब्धि ने भारतीय एथलेटिक्स इतिहास के पन्नों में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है।
प्रतियोगिता के दौरान सावन की शुरुआत बेहद आक्रामक और आत्मविश्वास से भरी हुई थी। उन्होंने पहले किलोमीटर से ही अपने इरादे साफ कर दिए थे कि वे केवल हिस्सा लेने नहीं, बल्कि देश के लिए पदक जीतने आए हैं। शुरुआती पांच किलोमीटर के पड़ाव पर वह दूसरे स्थान पर थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी ताकत दिखाते हुए रेस में बढ़त हासिल कर ली। उनकी यह बढ़त लंबी दूरी तक कायम रही, जिससे दुनिया भर के दिग्गज धावक भी हैरान रह गए।
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शुरुआत से लेकर आखिर तक बनाई रखी मजबूत पकड़
मैराथन जैसी कठिन और लंबी दौड़ में टिके रहना किसी भी एथलीट के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। सावन बरवाल ने इस चुनौती का डटकर सामना किया और अपनी रणनीति के हिसाब से दौड़ को आगे बढ़ाया। 10 किलोमीटर के फासले तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने बाकी सभी धावकों को पीछे छोड़ते हुए बढ़त अपने नाम कर ली। इसके बाद 15 किलोमीटर और 20 किलोमीटर के चेकपॉइंट पर भी वह लगातार सबसे आगे बने हुए थे।
हाफ मैराथन यानी 21.1 किलोमीटर के पड़ाव को उन्होंने 1 घंटा 5 मिनट और 54 सेकंड में पार किया और तब भी वे लीड कर रहे थे। हालांकि, मैराथन के आखिरी चरणों में मुकाबला बेहद रोमांचक हो गया था। जापान के अनुभवी धावक इचिटाका यामाशिता ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और 30 किलोमीटर के बाद बढ़त अपने नाम करने की कोशिश की। इसके बावजूद सावन ने हार नहीं मानी और अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए दूसरे स्थान पर मजबूती से कब्जा बनाए रखा।
44 साल पुराना सूखा खत्म और नया नेशनल रिकॉर्ड
यह मेडल केवल एक पदक भर नहीं है, बल्कि भारतीय मैराथन इतिहास के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है। भारत ने एशियन गेम्स की मैराथन स्पर्धा में आखिरी पदक साल 1982 में दिल्ली में हुए खेलों के दौरान जीता था। उससे पहले 1951 के पहले एशियाई खेलों में छोटा सिंह ने गोल्ड और सूरत सिंह माथुर ने ब्रॉन्ज मेडल जीता था। इसका मतलब यह है कि नागोया में जीता गया यह सिल्वर मेडल देश के बाहर एशियन गेम्स की मैराथन में भारत का पहला पदक है।
सावन बरवाल ने इस रेस को पूरा करने के लिए 2 घंटे 11 मिनट और 37 सेकंड का समय लिया, जो कि उनका अब तक का पर्सनल बेस्ट प्रदर्शन भी है। इसके साथ ही उन्होंने अपना ही पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है। इसी साल अप्रैल के महीने में रॉटरडैम मैराथन के दौरान उन्होंने शिवनाथ सिंह के 48 साल पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त किया था और अब नागोया में अपने ही उस रिकॉर्ड से भी बेहतर समय निकालकर नया इतिहास रच दिया है।
"सावन बरवाल की यह उपलब्धि भारतीय एथलेटिक्स की बढ़ती ताकत और हमारे खिलाड़ियों के अटूट जज्बे को दर्शाती है। देश को अपने इस युवा एथलीट पर गर्व है जिसने वर्षों पुराना सूखा खत्म किया है।" — खेल विशेषज्ञ
कड़े मुकाबले में जापान और चीन के धावकों को दी टक्कर
इस रोमांचक मैराथन स्पर्धा में दुनिया भर के कई दिग्गज धावक पसीना बहा रहे थे। जापान के अनुभवी एथलीट इचिटाका यामाशिता ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 2 घंटे 10 मिनट और 49 सेकंड के समय के साथ गोल्ड मेडल अपने नाम किया। वहीं, चीन के पेइयू फेंग ने 2 घंटे 12 मिनट और 13 सेकंड का समय निकालकर ब्रॉन्ज मेडल पर कब्जा जमाया। सावन बरवाल जापानी धावक से बहुत ज्यादा पीछे नहीं रहे और महज कुछ सेकंड के अंतर से स्वर्ण पदक से चूक गए, लेकिन उनका प्रदर्शन किसी स्वर्ण पदक से कम नहीं था।
इस पूरी स्पर्धा में भारत के लिए एक और अच्छी बात यह रही कि देश के अन्य खिलाड़ियों ने भी कड़ा संघर्ष किया। मैराथन के इस कड़े मुकाबले में भाग ले रहे दूसरे भारतीय धावक कार्तिक करकेरा ने भी अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास किया और कुल 19 धावकों के बीच 17वें स्थान पर रहे। हालांकि, सारा ध्यान सावन बरवाल के ऐतिहासिक प्रदर्शन पर केंद्रित रहा, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है।
देशभर में जश्न का माहौल और भविष्य की उम्मीदें
जैसे ही सावन बरवाल के सिल्वर मेडल जीतने की खबर देश तक पहुंची, खेल प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई। सोशल मीडिया से लेकर खेल जगत के तमाम दिग्गजों ने युवा एथलीट की इस ऐतिहासिक सफलता की सराहना की। यह सफलता आने वाले समय में देश के अन्य युवा धावकों को भी लंबी दूरी की दौड़ में आगे आने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने के लिए प्रेरित करेगी। सावन ने साबित कर दिया है कि अगर दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत हो, तो किसी भी रिकॉर्ड को तोड़ा जा सकता है।








