नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में एक बार फिर बड़ा मोड़ आता दिख रहा है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के ताजा बयान ने नई दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक खलबली मचा दी है। गोर ने साफ शब्दों में संकेत दिया है कि भारत पर सौ प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के मुद्दे पर अमेरिकी सरकार अगले दस दिनों के भीतर अपना अंतिम फैसला लेगी। इस पूरे मामले की जड़ में भारत द्वारा रूस से लगातार खरीदा जा रहा कच्चा तेल है, जिस पर अमेरिका लगातार अपनी नाराजगी जाहिर करता रहा है।
सर्जियो गोर ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि वाशिंगटन इस बात पर विचार कर रहा है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ किस तरह के कड़े कदम उठाए जाएं। अमेरिकी प्रशासन का यह रुख ऐसे समय में सामने आया है जब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते एक नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों का हवाला देते हुए हमेशा से स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है और रूस से तेल आयात जारी रखा है। ऐसे में अमेरिकी राजदूत की यह चेतावनी भारतीय नीति निर्धारकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।
व्यापार समझौता अंतिम चरण में, मार्को रुबियो की यात्रा से पहले ऐलान संभव
एक तरफ जहां टैरिफ को लेकर तलवारें लटक रही हैं, वहीं दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच एक बड़े व्यापार समझौते को लेकर भी सकारात्मक खबरें आ रही हैं। कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रहा व्यापार समझौता अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों की आने वाली भारत यात्रा से पहले इस अहम समझौते का आधिकारिक ऐलान किया जा सकता है। सर्जियो गोर खुद इस पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए हुए हैं और दोनों देशों के बीच संवाद को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका एक तरफ व्यापार समझौते के जरिए भारत के साथ अपने आर्थिक रिश्तों को और मजबूत करना चाहता है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ व्यापारिक रिश्तों पर लगाम कसने का दबाव भी बना रहा है। अमेरिकी प्रशासन की यह दोहरी रणनीति भारत के लिए दोतरफा परीक्षा जैसी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच पुराने संबंधों का हवाला देते हुए कूटनीतिक हलकों में यह उम्मीद भी जताई जा रही है कि बातचीत के जरिए इस गतिरोध को सुलझा लिया जाएगा।
रूस से तेल आयात पर प्रतिबंध का दबाव और भारत का कड़ा रुख
भारत ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार करते हुए हमेशा से अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखा है। भारत सरकार का पक्ष बेहद स्पष्ट है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और अपनी जरूरत के हिसाब से सबसे सस्ते विकल्प चुनना देश का अधिकार है। अमेरिकी राजदूत के इस बयान के बाद अब सबकी नजरें अगले दस दिनों पर टिकी हैं कि क्या वास्तव में ट्रंप प्रशासन कोई कठोर आर्थिक कदम उठाएगा या कूटनीतिक बातचीत से बीच का कोई रास्ता निकाला जाएगा।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल बताती है कि भारतीय वाणिज्य मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के अधिकारी इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। व्यापार समझौते के अंतिम चरण में होने के कारण दोनों देशों के बीच बैक-चैनल कूटनीति भी तेज हो गई है। आने वाले कुछ दिन भारत और अमेरिका के आर्थिक भविष्य के लिहाज से बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं, जहां एक तरफ भारी टैक्स का डर है तो दूसरी तरफ बड़े व्यापारिक समझौते की उम्मीद भी जिंदा है।




