जब भी कोई डिजिटल कोड अचानक सर्च ट्रेंड्स के शीर्ष पर पहुंचता है, तो उसके पीछे कोई न कोई सामाजिक, आर्थिक या प्रशासनिक उथल-पुथल जरूर होती है। पिछले कुछ घंटों से इंटरनेट पर '539' या 'SS539' कोड अचानक सुर्खियों में है। सतह के नीचे उतरकर जब 'द फ्रीलान्स' की इन्वेस्टिगेटिंग टीम ने इसकी तह तक जाने की कोशिश की, तो एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। यह कोई साधारण संयोग नहीं, बल्कि देश के दो अलग-अलग हिस्सों से जुड़े गंभीर व्यवस्थागत संकटों का एक सांकेतिक पुलिंदा है। एक तरफ जहां शिक्षा के मंदिर खाली पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ हमारी थाली में परोसा जाने वाला भोजन धीमा जहर बनता जा रहा है।
हरियाणा की आईटीआई और खाली सीटों का भुतहा सन्नाटा
हमारी पड़ताल की शुरुआत हरियाणा के चरखी दादरी से होती है। रावलधी नोडल आईटीआई (Industrial Training Institute) के आंकड़े चीख-चीख कर प्रशासनिक दावों की पोल खोल रहे हैं। यहां तकनीकी शिक्षा के नाम पर युवाओं को कौशल संपन्न बनाने का सपना दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। संस्थान की कुल 628 स्वीकृत सीटों में से चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं—पूरे 539 सीटें आज भी खाली पड़ी हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि केवल 89 छात्र ही इन कोर्सों में दाखिला ले पाए हैं। आखिर क्यों युवाओं का मोह तकनीकी शिक्षा से भंग हो रहा है? क्या यह आधुनिक लैब और योग्य प्रशिक्षकों की कमी का नतीजा है, या फिर सरकारी तंत्र की उदासीनता? स्थानीय जानकारों का मानना है कि पाठ्यक्रम समय के साथ अपडेट न होने और प्लेसमेंट की अनिश्चितता के कारण युवा इन संस्थानों से मुंह मोड़ रहे हैं।
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रसोई की थाली पर मंडराता खतरा: हल्दी के नमूनों में चौकाने वाली फेल दर
चरखी दादरी के शैक्षणिक गलियारों से जब हमारी गाड़ी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ी, तो स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा का एक और भयावह सच सामने आया। खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन (FSDA) की हालिया रिपोर्ट ने हर किसी को सकते में डाल दिया है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में लिए गए नमूनों की गुणवत्ता बेहद निराशाजनक पाई गई है। विशेषकर भारतीय रसोई की शान और औषधीय गुणों से भरपूर 'हल्दी' पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। एफएसडीए की जांच में हल्दी के कुल 1172 नमूनों की जांच की गई, जिसमें से हैरान करने वाली बात यह है कि 539 नमूने पूरी तरह फेल हो गए। यानी जनता के स्वास्थ्य से किस हद तक खिलवाड़ हो रहा है, इसका अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है। मिलावटी हल्दी में लीड क्रोमेट और अन्य हानिकारक रंगों का इस्तेमाल आम लोगों के लिवर और किडनी पर सीधा वार कर रहा है।
नीतिगत विफलता और प्रशासनिक सुस्ती का साझा अक्स
इन दोनों घटनाओं—एक तरफ शिक्षा में खाली पड़ी 539 सीटें और दूसरी तरफ खाद्य जांच में फेल हुए 539 नमूने—के बीच एक बारीक और चिंताजनक समानता दिखाई देती है। यह समानता है—सिस्टम की जवाबदेही का अभाव। एक ओर जहां हम 'कौशल भारत' (Skill India) और 'आत्मनिर्भरता' की बात करते हैं, वहीं जमीनी स्तर पर आईटीआई जैसी बुनियादी इकाइयों में छात्रों का टोटा पड़ा है। दूसरी ओर, 'स्वस्थ भारत' के नारों के बीच हमारी रसोई में परोसी जाने वाली हल्दी जैसे मसालों में जानलेवा केमिकल धड़ल्ले से बिक रहे हैं। क्या प्रशासन तब जागेगा जब हालात पूरी तरह हाथ से निकल जाएंगे?
ग्राउंड रिपोर्टर की नजर में: आगे की राह और सुधार की उम्मीद
'द फ्रीलान्स' की यह पड़ताल इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि डिजिटल आंकड़ों और ट्रेंड्स के पीछे अक्सर गहरी सामाजिक कहानियां दबी होती हैं। यदि समय रहते हरियाणा के इन तकनीकी संस्थानों में युवाओं को आकर्षित करने के लिए व्यावहारिक बदलाव नहीं किए गए, तो हमारा जनसांख्यिकी लाभांश (Demographic Dividend) महज एक छलावा बनकर रह जाएगा। ठीक इसी प्रकार, उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में खाद्य नमूनों के फेल होने का यह सिलसिला यदि कड़े दंड के साथ नहीं रोका गया, तो आम नागरिक की सेहत भगवान भरोसे ही चलेगी। अब वक्त आ गया है कि कागजी दावों से बाहर निकलकर धरातल पर ठोस कदम उठाए जाएं।
हम इस बात पर पैनी नजर बनाए रखेंगे कि प्रशासन इन 539 खाली सीटों और 539 फेल नमूनों पर क्या सुधारात्मक कदम उठाता है। 'द फ्रीलान्स' की खोजी पत्रकारिता का यह सफर जारी रहेगा, क्योंकि सच सामने लाना ही हमारा धर्म है।





