नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — यूक्रेन युद्ध के मैदान में एलोन मस्क की कंपनी स्टारलिंक के इस्तेमाल को लेकर दुनिया भर में चल रही चर्चा अब भारत तक पहुंच गई है। इस बीच संसद में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भारत सरकार को एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा है कि यूक्रेन में सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क से जुड़े जो सुरक्षा खतरे सामने आए हैं, वे भारत के लिए एक बड़ा सबक हैं। देश में हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाएं देने के लिए अब कई विदेशी कंपनियां अपने कदम बढ़ा रही हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह स्थिति चिंताजनक हो सकती है।
यूक्रेन के मोर्चे पर पिछले कुछ महीनों में यह देखा गया है कि कैसे सैटेलाइट संचार प्रणालियों पर नियंत्रण युद्ध की दिशा बदल सकता है। जब किसी देश की पूरी सैन्य और नागरिक संचार व्यवस्था किसी एक निजी विदेशी कंपनी के हाथों में होती है, तो संप्रभुता पर बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है। प्रियंका चतुर्वेदी ने इसी बात पर जोर दिया है कि भारत जैसे विशाल और रणनीतिक रूप से संवेदनशील देश को अपनी डिजिटल और अंतरिक्ष आधारित संपदा की सुरक्षा के लिए बहुत सतर्क रहना चाहिए। विदेशी हाथों में डेटा और नेटवर्क का नियंत्रण होना भविष्य में आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए भारी पड़ सकता है।
विदेशी सैटेलाइट कंपनियों पर बढ़ती निर्भरता
भारत में इस समय सैटेलाइट ब्रॉडबैंड या अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट सेवाओं को लाने की होड़ मची हुई है। दुनिया की कई बड़ी कंपनियां भारत के दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट पहुंचाने के नाम पर लाइसेंस पाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन जानकारों का मानना है कि इन सेवाओं के आने से केवल व्यापारिक फायदा नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके छिपे हुए खतरों का भी आकलन होना चाहिए। यूक्रेन में जिस तरह से युद्ध के दौरान इंटरनेट सेवाओं को लेकर अनिश्चितता बनी रही, उसने यह साबित कर दिया है कि निजी कंपनियां संकट के समय अपने व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता दे सकती हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और देश की सुरक्षा एजेंसियों के सामने अब यह एक बड़ी चुनौती बन गई है कि वे विदेशी कंपनियों के नियम और शर्तें कैसे तय करें। देश का आंतरिक डेटा भारत के भीतर ही स्टोर किया जाए और किसी भी आपात स्थिति में सरकार के पास नेटवर्क का पूरा नियंत्रण होना चाहिए। सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी इसी बात को उठाया है कि अगर समय रहते मजबूत नीतियां नहीं बनाई गईं, तो भारत का डिजिटल ढांचा विदेशी ताकतों के रहमो-करम पर निर्भर हो जाएगा, जो देश की सुरक्षा के साथ बड़ा समझौता होगा।
भारत के नीति निर्माताओं के लिए कड़ा संदेश
यह पूरा मामला केवल इंटरनेट की स्पीड या तकनीक से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह देश की संप्रभुता और डिजिटल आजादी का सवाल है। भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर ही तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दिया है। ऐसे में अंतरिक्ष और संचार क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को असीमित छूट देना आत्मनिर्भर भारत अभियान के खिलाफ जा सकता है। आने वाले दिनों में संसद में इस मुद्दे पर और तीखी बहस होने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि विपक्ष लगातार सरकार से यह जानना चाहता है कि वह विदेशी उपग्रह संचार कंपनियों के नियमों को लेकर कितनी सख्त है।
आम जनता और स्थानीय उपयोगकर्ताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उसके साथ खतरे भी उतने ही बड़े होते जा रहे हैं। सस्ते और तेज इंटरनेट के लालच में देश की सुरक्षा दांव पर नहीं लगाई जा सकती। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जब भी कोई विदेशी कंपनी भारत में अपनी सेवा शुरू करे, तो देश के सुरक्षा मानक सबसे ऊपर हों। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से साफ है कि यूक्रेन की घटनाएं सिर्फ एक देश की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए डिजिटल युग में संप्रभुता बनाए रखने की एक बड़ी परीक्षा है।
भविष्य की रणनीतियां और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने खुद के उपग्रह संचार तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है। किसी भी बाहरी कंपनी पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय देश के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा विकसित प्रणालियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकार को इस दिशा में कड़े नियम बनाने चाहिए ताकि डेटा लीक या नेटवर्क ठप होने जैसी किसी भी आपात स्थिति से आसानी से निपटा जा सके। प्रियंका चतुर्वेदी की इस चेतावनी ने एक बार फिर से नीति निर्माताओं को नींद से जगाने का काम किया है।











