छात्रों के बीच बढ़ता मानसिक तनाव और आत्महत्या की डरावनी तस्वीर
देश के शैक्षणिक संस्थानों से आ रही खबरें लगातार चिंता का विषय बनती जा रही हैं। युवा पीढ़ी जो देश का भविष्य तय करने वाली है, वह आज अत्यधिक मानसिक दबाव और तनाव के दौर से गुजर रही है। आलम यह है कि देश के आम स्कूलों-कॉलेजों से लेकर देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों तक में छात्र अपनी जीवनलीला समाप्त कर रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि पिछले दो दशकों में छात्रों द्वारा उठाए जाने वाले इन खौफनाक कदमों में भारी इजाफा हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़, परिजनों की उम्मीदों का बोझ और खुद को साबित करने का निरंतर दबाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। एक तरफ जहां देश विकास के नए आयाम छू रहा है, वहीं दूसरी तरफ हमारे युवा भीतर से अकेलेपन और निराशा का शिकार होते जा रहे हैं। यही वजह है कि आज हर स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर मंथन की आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि बहुमूल्य जिंदगियों को बचाया जा सके।
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दो दशकों में दोगुने से ज्यादा हुए मामले, हर दिन दर्ज हो रही हैं मौतें
सरकारी आंकड़ों की गहराई में जाएं तो स्थिति और भी ज्यादा भयावह नजर आती है। एनसीआरबी की 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया' रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2004 में देश भर में कुल 5,610 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की थी। समय के साथ यह संख्या लगातार बढ़ती गई और वर्ष 2024 तक आते-आते यह रिकॉर्ड 14,488 के आंकड़े को छू गई। पिछले एक दशक यानी 2014 से 2024 के बीच के 11 वर्षों में ही एक लाख से अधिक छात्रों ने अपनी जान गंवा दी।
मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर दिन औसतन 40 छात्र इस तरह के आत्मघाती कदम उठाते हैं। इनमें से लगभग 55 प्रतिशत लड़के और करीब 45 प्रतिशत लड़कियां शामिल हैं। यह वृद्धि दर देश की सामान्य आत्महत्या दर की तुलना में कहीं अधिक तेज गति से बढ़ रही है। इस बात की तस्दीक करती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली और सामाजिक ताने-बाने में कहीं न कहीं ऐसा गतिरोध है, जिसे समय रहते ठीक करने की सख्त जरूरत है।
आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी नहीं थम रहा खौफनाक दौर
देश के प्रीमियर इंजीनियरिंग संस्थान यानी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मेधावी छात्रों की पहली पसंद माने जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इन परिसरों से भी लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं जो किसी को भी झकझोर सकती हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, देश की सभी 23 आईआईटी में वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच पांच वर्षों के भीतर कुल 45 छात्रों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
इनमें सबसे अधिक मामले आईआईटी हैदराबाद में सामने आए, जहां सात विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। इसके अलावा आईआईटी खड़गपुर, दिल्ली और कानपुर जैसे बड़े संस्थानों में भी छह-छह मामले दर्ज किए गए। इसके अतिरिक्त विभिन्न आरटीआई और पूर्व छात्र समूहों के आंकड़ों का दावा है कि पिछले दो दशकों में आईआईटी परिसरों में लगभग 170 से अधिक अस्वाभाविक मौतें या आत्महत्याएं रिकॉर्ड की गई हैं, जिनमें से अधिकांश मामले पिछले दस वर्षों के दौरान ही सामने आए हैं।
परीक्षाओं का दबाव और अकादमिक प्रतिस्पर्धा बन रही जी का जंजाल
छात्रों द्वारा आत्महत्या किए जाने के पीछे मुख्य कारणों की पड़ताल करें तो परीक्षा में असफलता, ग्रेड कम आना और भविष्य की अनिश्चितता सबसे बड़े कारक के रूप में उभरते हैं। कुल छात्र आत्महत्याओं में से लगभग 21 प्रतिशत से ज्यादा मामलों का सीधा संबंध अकादमिक तनाव और एग्जाम के परिणाम से जुड़ा होता है। इसके अलावा पारिवारिक अपेक्षाएं, पियर प्रेशर और कैंपस का माहौल भी बड़ा असर डालता है।
आरक्षित वर्गों के छात्रों में भी इस तरह के दबाव का असर अलग रूप में देखने को मिलता है। कई रिपोर्टों में यह बात भी सामने आई है कि संस्थान के भीतर भाषाई बाधाएं, भेदभाव का डर और समायोजन न हो पाना भी छात्रों को अंदर से तोड़ देता है। जब युवा अपनी परेशानियों को किसी के साथ साझा नहीं कर पाते, तो वे घुटन महसूस करते हैं और कई बार निराशा के आगोश में आकर गलत कदम उठा बैठते हैं।
"युवाओं में बढ़ता मानसिक तनाव और अकादमिक दबाव हमारे पूरे समाज और शिक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है। हमें अंकों की दौड़ से ऊपर उठकर छात्रों की मानसिक सेहत को प्राथमिकता देनी होगी और एक ऐसा संवेदनशील माहौल बनाना होगा जहां वे अपनी हर बात खुलकर साझा कर सकें।" — शिक्षा एवं मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ
इस गंभीर संकट से निपटने के लिए क्या हैं जरूरी कदम?
इस विकट समस्या का समाधान केवल प्रशासनिक बैठकों तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव करने की आवश्यकता है। शिक्षण संस्थानों में पेशेवर काउंसलर और मनोवैज्ञानिकों की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए, जो नियमित रूप से छात्रों की काउंसलिंग कर सकें। इसके अलावा ग्रेडिंग सिस्टम को इतना खौफनाक नहीं बनाया जाना चाहिए कि छात्र उसे जीवन और मरण का प्रश्न मान लें।
अभिभावकों को भी अपने बच्चों से अंकों की बजाय उनके मानसिक स्वास्थ्य और खुशहाली को लेकर संवाद करना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि असफलता अंत नहीं है, बल्कि सीखने का एक नया अवसर है। यदि समय रहते समाज, परिवार और सरकार ने मिलकर इस दिशा में ठोस पहल नहीं की, तो यह मौतों का सिलसिला यूं ही हमारे प्रतिभाशाली युवाओं को लीलता रहेगा।


