नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश और दुनिया इस समय मौसम के एक खतरनाक चक्र से गुजर रही है। एशिया महाद्वीप पर सुपर अल नीनो का दोहरा दबाव मंडराने लगा है। मौसम विज्ञान से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि अल नीनो अब तक के इतिहास के सबसे ज्यादा तापमान पर पहुंच चुका है। इसका पारा 3.047 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया है। इस भारी गर्मी और तापमान में अचानक आए उछाल से बड़ी तबाही की आशंका जताई जा रही है। आम आदमी की जिंदगी पर इसका सीधा और बुरा असर पड़ना तय माना जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वैज्ञानिकों ने इसे 'सुपर-डुपर अल नीनो' नाम दिया है। इस खतरनाक मौसमी बदलाव से आने वाले दिनों में भीषण गर्मी का सामना करना पड़ेगा। वैज्ञानिकों की एक बड़ी चेतावनी के अनुसार इस अत्यधिक गर्मी के कारण दुनियाभर में करीब साढ़े चार लाख लोगों की जान जाने का खतरा पैदा हो गया है। भारत में भी इसका असर केवल मानसून तक ही सीमित नहीं रहेगा। कृषि, अर्थव्यवस्था और आम लोगों की सेहत पर इसके दूरगामी और घातक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
फरवरी 2027 तक बना रह सकता है अल नीनो का असर
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद और मीडिया को दिए अपने बयानों में साफ किया है कि अल नीनो का यह दौर लंबी अवधि तक खिंच सकता है। स्थिति ऐसी है कि यह मौसमी संकट फरवरी 2027 तक बना रह सकता है। हालांकि मानसून पर इसका कितना असर पड़ेगा, यह कई दूसरे स्थानीय और वैश्विक कारकों पर निर्भर करता है। लेकिन मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य से कम बारिश और समय पर बारिश न होने से किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात पैदा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।
जमीनी स्तर पर स्थिति का जायजा लेने पर पता चलता है कि खेती किसानी से जुड़े लोग पहले से ही चिंतित हैं। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण के राज्यों तक भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। पीने के पानी का संकट गर्मियों के दिनों में विकराल रूप ले सकता है। ग्रामीण इलाकों में किसानों के सामने अपनी फसलों को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। यदि समय रहते पानी के प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए तो हालात नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। सरकार अपने स्तर पर समीक्षा बैठकें कर रही है लेकिन जमीनी अमले को अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर मंडराता बड़ा संकट
अल नीनो का संकट केवल बादलों और बारिश तक सीमित नहीं है। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट बताती है कि यह संकट मॉनसून से कहीं आगे तक फैला हुआ है। अत्यधिक गर्मी और लू के थपेड़े सीधे तौर पर इंसानी शरीर पर हमला करते हैं। बुजुर्गों, बच्चों और खुले में काम करने वाले मजदूरों के लिए यह मौसम जानलेवा साबित हो सकता है। हीटस्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मामले तेजी से बढ़ने की आशंका है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ सकती है जिससे हमारी स्वास्थ्य सेवाएं भी दबाव में आ जाएंगी।
आर्थिक मोर्चे पर भी इसके बुरे परिणाम सामने आने लगे हैं। महंगाई पहले से ही आम आदमी की कमर तोड़ रही है। खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं। अगर इस बार पैदावार प्रभावित हुई तो दालें, सब्जियां और अनाज के भाव और अधिक बढ़ जाएंगे। आम आदमी की थाली से पौष्टिक भोजन दूर होता जाएगा। बाजार के जानकारों का कहना है कि सरकार को अभी से खाद्यान्न के बफर स्टॉक को लेकर सतर्क हो जाना चाहिए ताकि कालाबाजारी और कृत्रिम कमी को रोका जा सके।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और एहतियाती कदम
हमारी फील्ड टीम ने जब उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों का दौरा किया तो लोगों में एक अनजाना डर साफ दिखाई दिया। छोटे किसानों के पास सिंचाई के आधुनिक साधन नहीं हैं। वे पूरी तरह मानसून की कृपा पर निर्भर रहते हैं। अगर अल नीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ता है तो उनकी सालभर की मेहनत पर पानी फेर जाएगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि पानी की एक-एक बूंद को बचाने के लिए पारंपरिक तरीकों को फिर से जिंदा करना होगा। तालाबों की सफाई और भूजल पुनर्भरण के काम युद्ध स्तर पर करने होंगे।
अंत में स्थिति यही कहती है कि यह समय केवल चिंता करने का नहीं बल्कि ठोस कदम उठाने का है। प्रशासन को अभी से शहरी और ग्रामीण इलाकों में पेयजल आपूर्ति सुचारू रखने की योजना बनानी चाहिए। नागरिकों को भी चाहिए कि वे पानी और बिजली की बर्बादी रोकें। इस भीषण प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए सरकार और जनता दोनों को मिलकर तैयारी करनी होगी, तभी इस बड़े खतरे के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।







