नई दिल्ली से 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर मामले की सुनवाई को लेकर एक बेहद अहम और बड़ा स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि जब इस मामले की सुनवाई चल रही थी, तब उसने संशोधित या नए फॉर्म-6 पर कोई भी फैसला नहीं सुनाया था। अदालत के इस साफ रुख के सामने आने के बाद अब चुनाव आयोग के उन दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं जिनमें नए फॉर्म-6 को मंजूरी या किसी तरह की हरी झंडी मिलने की बात कही जा रही थी। आम जनता और राजनीतिक गलियारों में इस ताजा बयान के बाद चर्चाओं का दौर फिर से तेज हो गया है।
मामले की तह में जाएं तो पूरी बहस इस बात पर अटक गई थी कि क्या देश की शीर्ष अदालत ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े इस नए फॉर्म को मंजूरी दी है या इसे खारिज किया है। कानूनी जानकारों और मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से यह बात सामने आ रही थी कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का इस्तेमाल अपने पक्ष में किया जा रहा था। लेकिन अब अदालत ने खुद सामने आकर यह स्थिति बिल्कुल शीशे की तरह साफ कर दी है कि न तो इस फॉर्म को कोई मंजूरी दी गई थी और न ही इसे कानूनी रूप से खारिज किया गया था। अदालत का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब देश के अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े काम जोरों पर चल रहे हैं।
चुनाव आयोग के दावों पर अदालत का सीधा रुख
बिहार और देश के अन्य हिस्सों में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का काम प्रशासनिक स्तर पर लगातार जारी है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान फॉर्म-6 की भूमिका बहुत ही अहम होती है, जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम जुड़वाने या सुधार करवाने के लिए किया जाता है। चुनाव आयोग की तरफ से जब इस बारे में दलीलें दी गईं तो ऐसा लगा कि कोर्ट ने इस पर मुहर लगा दी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की दो टूक टिप्पणी ने यह साबित कर दिया है कि अदालत ने अपने फैसले में किसी भी नए फॉर्म-6 का जिक्र तक नहीं किया था क्योंकि उस वक्त ऐसा कोई नया फॉर्म अस्तित्व में ही नहीं आया था। इस खुलासे के बाद अब चुनाव अधिकारियों को भी जमीनी स्तर पर अपनी कार्यप्रणाली में और अधिक पारदर्शिता लानी होगी।
दूसरी तरफ, देश के अन्य राज्यों जैसे पंजाब से भी मतदाता सूची में बदलाव की बड़ी खबरें सामने आ रही हैं। हालिया आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में एसआईआर प्रक्रिया के बाद करीब तेरह लाख से ज्यादा मतदाता कम हुए हैं और फाइनल सूची में दो करोड़ से अधिक वोटर दर्ज किए गए हैं। जब आम लोग अपने नाम की स्थिति जानने के लिए पोलिंग बूथ या जिला कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, ऐसे समय में अदालती आदेशों और प्रशासनिक दस्तावेजों की यह खींचतान जनता को और ज्यादा भ्रमित कर रही है। एक आम नागरिक के लिए यह समझना बेहद जरूरी हो गया है कि उसके मताधिकार पर इन कानूनी और प्रशासनिक दांव-पेंचों का आखिर क्या सीधा असर पड़ने वाला है।
कानूनी स्थिति साफ होने से प्रशासनिक हलकों में हलचल
सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा स्पष्टीकरण के बाद देश भर के चुनावी और प्रशासनिक अमले में एक बार फिर से समीक्षा का दौर शुरू हो गया है। जिला स्तर के अधिकारी अब इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या उनके यहां इस्तेमाल हो रहे फॉर्म और दस्तावेज पूरी तरह से कानूनी रूप से वैध हैं या नहीं। अदालत के इस फैसले से यह बात भी पुख्ता हो जाती है कि न्यायपालिका किसी भी प्रशासनिक दस्तावेज को बिना पूरी सुनवाई और समीक्षा के सीधे तौर पर स्वीकृति नहीं देती है। रिपोर्टर के तौर पर जब हमने जमीनी स्तर के हालातों का जायजा लिया, तो यह पाया कि स्थानीय स्तर पर अभी भी बहुत से लोगों को इस नए कानूनी पेंच की पूरी जानकारी नहीं है।
आने वाले दिनों में इस मामले की गूंज चुनाव आयोग की बैठकों और अन्य अदालती सुनवाइयों में भी साफ सुनाई देगी। विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर सरकार और चुनाव आयोग पर लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि लोकतंत्र में मतदाता सूची की पवित्रता और अदालती फैसलों की पारदर्शिता दोनों ही बहुत जरूरी हैं। जब तक हर एक नागरिक के वोट का अधिकार सुरक्षित नहीं रहता, तब तक इस तरह के कानूनी विवाद और स्पष्टीकरण सुर्खियां बनते रहेंगे। हम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेंगे और हर नया अपडेट सबसे पहले आप तक पहुंचाते रहेंगे।
आगे की प्रक्रिया और जनता के लिए जरूरी संदेश
आम जनता के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें और केवल आधिकारिक तथा कानूनी रूप से पुष्ट जानकारियों पर ही भरोसा करें। मतदाता सूची में नाम जुड़वाने या फॉर्म भरने से जुड़ी कोई भी दिक्कत होने पर सीधे अपने क्षेत्र के बीएलओ या चुनाव कार्यालय से संपर्क करना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है। सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्टीकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कानून की नजर में हर एक दस्तावेज और प्रक्रिया की वैधता कितनी ज्यादा मायने रखती है। हमारी यह स्वतंत्र फील्ड रिपोर्ट आपको लगातार जमीनी सच से रूबरू कराती रहेगी ताकि आप हर जरूरी खबर से पूरी तरह वाकिफ रहें।






