चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा मोड़
देश के सबसे बड़े संवैधानिक पदों में शुमार मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर बने नए कानून की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट का रुख इन दिनों बेहद चर्चा का विषय बना हुआ है। अदालत के भीतर इस संवेदनशील मसले पर सुनवाई के दौरान दो जजों की बेंच के बीच वैचारिक भिन्नता खुलकर सामने आई। इस कानूनी विवाद ने एक बार फिर से इस बात पर बहस छेड़ दी है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और उनके चयन की प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए किन मानकों का पालन किया जाना चाहिए।
शीर्ष अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान कई दिनों तक लंबी बहस चली, जिसमें याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने नए कानून के विभिन्न प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत के समक्ष यह मुख्य सवाल था कि क्या संसद द्वारा बनाए गए इस कानून के जरिए चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के गठन में कार्यपालिका का प्रभाव जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है, जिससे इसकी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस गंभीर मामले पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था। जब बुधवार को इस पर निर्णय सुनाया गया, तो यह स्पष्ट हो गया कि दोनों न्यायमूर्तियों की इस मामले को देखने की दृष्टि और निष्कर्ष एक-दूसरे से भिन्न थे, जिसके चलते एक विभाजित आदेश सामने आया।
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दो जजों की राय में अंतर और संविधान पीठ का सवाल
मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ के बीच इस बात को लेकर सहमति नहीं बन पाई कि मामले को आगे किस तरह से आगे बढ़ाया जाए। बेंच के एक न्यायाधीश ने मामले को वृहद संविधान पीठ के पास भेजने के अनुरोध को उचित नहीं माना, जबकि दूसरे न्यायाधीश ने इस पर अपनी सहमति जताई और इसे संविधान पीठ के सुपुर्द करने का समर्थन किया।
फैसला सुनाते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने इस बात पर जोर दिया कि एक संस्थागत इकाई के रूप में अदालत का एक ही सुर में बोलना हमेशा बेहतर होता है, विशेषकर तब जब मामला देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़ा हो। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस मामले में पांच दिनों से अधिक समय तक विस्तृत सुनवाई की गई थी, और अलग-अलग निष्कर्षों तक पहुंचने के कारण उन्हें अपने विचार अधिक विस्तार से लिखने पड़े।
"संवैधानिक ढांचा इस बुनियादी सिद्धांत पर टिका हुआ है कि देश व्यक्तियों के शासन से नहीं बल्कि कानूनों के शासन से चलता है, और सत्ता का उपयोग करने वाले हर शख्स को कानून की सीमाओं के भीतर ही रहकर काम करना होता है।" — जस्टिस दीपांकर दत्ता, सुप्रीम कोर्ट
सीजेआई के समक्ष रखा जाएगा मामला
चूंकि दोनों जजों की राय में स्पष्ट मतभेद उभरकर सामने आए, इसलिए यह जरूरी हो गया कि इस कानूनी गतिरोध को समाप्त करने के लिए उचित कदम उठाया जाए। अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि इस चरण में यदि मामले को तीन जजों की बेंच के पास भेजा जाता है, तो इसमें अनावश्यक रूप से लंबा वक्त लग सकता है।
इस प्रक्रियागत देरी से बचने और मामले का जल्द व उचित समाधान निकालने के लिए बेंच ने इसे भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सामने रखने का निर्देश दिया है। अब मुख्य न्यायाधीश यह तय करेंगे कि इस कानूनी उलझन को सुलझाने के लिए कितनी संख्या वाली संविधान पीठ का गठन किया जाना चाहिए, जो सभी पहलुओं पर गहराई से विचार कर सके।
न्यायिक प्रक्रिया के जानकारों का मानना है कि इस तरह के मामलों में जजों की अलग-अलग राय आना न्यायिक मंथन का एक स्वाभाविक हिस्सा है, जो कानून की जटिलताओं को और अधिक स्पष्टता के साथ समझने का अवसर प्रदान करता है। हालांकि, आम जनता और राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर उत्सुकता बनी हुई है कि आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला क्या दिशा तय करता है।
कानून को चुनौती देने के पीछे के मुख्य तर्क
दिसंबर 2023 में संसद की मुहर लगने के बाद अस्तित्व में आए इस नए कानून को कई मंचों पर चुनौती दी गई है। कांग्रेस पार्टी के नेता जया ठाकुर और गैर-सरकारी संगठन 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) सहित कई अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील है कि नए कानून के तहत बनाए गए चयन पैनल से देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि इससे पैनल में सरकार यानी कार्यपालिका का बहुमत हो जाता है, जिससे चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया में निष्पक्षता और स्वतंत्रता कमजोर होती है। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में निर्देश दिया था कि चुनाव आयोग के शीर्ष पदों पर नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की उच्चस्तरीय समिति द्वारा की जानी चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
लेकिन संसद द्वारा पारित नए कानून में सीजेआई के स्थान पर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया, जिसके बाद से ही यह विवाद कानूनी गलियारों में तूल पकड़ चुका है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्य न्यायाधीश इस मामले में संविधान पीठ का गठन कब करते हैं और वह पीठ इस कानून की वैधता पर क्या अंतिम मुहर लगाती है।


