चुनाव आयोग की स्वायत्तता और टीएन शेषन का कड़ा रुख
भारतीय चुनाव प्रणाली के इतिहास में जब भी निष्पक्षता और सख्त प्रशासनिक सुधारों की बात होती है, तो टीएन शेषन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय लोकतंत्र में मील का पत्थर माना जाता है। उन्होंने न केवल चुनाव आचार संहिता को सख्ती से लागू किया, बल्कि इस संवैधानिक संस्था की गरिमा और स्वतंत्रता को भी पूरी तरह से पुनर्परिभाषित किया। उनके दौर से पहले चुनाव आयोग को लेकर कई तरह की प्रशासनिक निर्भरताएं थीं, जिन्हें शेषन ने एक झटके में बदल कर रख दिया।
पत्रकार के गोविंदन कुट्टी द्वारा लिखी गई जीवनी 'शेषन- एन इंटिमेट स्टोरी' और विभिन्न साक्षात्कारों के माध्यम से यह बात सामने आई है कि शेषन ने किस प्रकार आयोग के काम करने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया था। उनके कार्यभार संभालने से पहले आयोग के सरकारी दस्तावेजों, लिफाफों और लेटरहेड पर “इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया” अंकित होता था। शेषन ने इस औपनिवेशिक मानसिकता और भ्रामक परंपरा पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे तुरंत प्रभाव से हटवाने के निर्देश जारी किए।
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जब सरकारी विभागों के चंगुल से आजाद कराई गई निर्वाचन संस्था
टीएन शेषन का तर्क बिल्कुल स्पष्ट और अकाट्य था। उनका मानना था कि चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत गठित एक स्वतंत्र और स्वायत्त संवैधानिक संस्थान है। यदि इसके दस्तावेजों पर 'भारत सरकार' लिखा रहेगा, तो आम जनता और राजनीतिक दलों के मन में यह गलत धारणा बनी रहेगी कि यह केंद्र सरकार का ही एक अंग या विभाग है। शेषन ने साफ कर दिया कि स्वतंत्र भारत में चुनाव कराने वाली संस्था को किसी भी प्रकार के सरकारी नियंत्रण या प्रभाव के साये से दूर रहना चाहिए।
अपने पुराने दिनों को याद करते हुए शेषन ने एक बार साझा किया था कि उनसे पहले के मुख्य चुनाव आयुक्तों को किस तरह के हालातों का सामना करना पड़ता था। उन्होंने बताया था कि एक बार उनके पूर्ववर्ती मुख्य चुनाव आयुक्त को कानून मंत्रालय के बाहर घंटों अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था। स्थिति इतनी दयनीय थी कि एक मुख्य चुनाव आयुक्त को मात्र 30 रुपये की एक किताब खरीदने के लिए भी सरकार को औपचारिक पत्र लिखकर अनुमति मांगनी पड़ी थी। शेषन ने इन सभी परंपराओं को तोड़कर आयोग को एक स्वतंत्र ताकत के रूप में स्थापित किया।
"हमारे दफ्तर में आने वाले सरकारी लिफाफों पर 'चुनाव आयोग, भारत सरकार' लिखा होता था। मैंने तत्काल निर्देश देकर इसे हटवाया और स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग कोई सरकारी विभाग नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है।"— टीएन शेषन, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त
शक्तियों का आक्रामक इस्तेमाल और जनता का बढ़ा हुआ भरोसा
जब टीएन शेषन ने आयोग के लेटरहेड से 'भारत सरकार' शब्द हटवाया, तो वह केवल शब्दों का फेरबदल नहीं था, बल्कि एक बड़ा संदेश था। यह इस बात की घोषणा थी कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए किसी के प्रति जवाबदेह नहीं बल्कि संविधान के प्रति समर्पित है। इस बड़े बदलाव के बाद चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का आक्रामक तरीके से इस्तेमाल करना शुरू किया। मतदाताओं के पहचान पत्र यानी वोटर आईडी कार्ड की अनिवार्यता, चुनाव खर्च की सीमा तय करना और आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई करना इसी मजबूत इच्छाशक्ति का परिणाम था।
शेषन के कार्यकाल के बाद ही देश के आम नागरिकों को यह अहसास हुआ कि चुनाव आयोग एक ऐसी संस्था है जो सत्ताधारी दलों और सरकारों से भी कड़े सवाल पूछ सकती है। चुनावी कदाचार और बूथ कैप्चरिंग जैसी पुरानी और गंभीर समस्याओं पर नकेल कसने में उनके इन्हीं फैसलों ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। आज भी जब देश में चुनावी निष्पक्षता और आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर बहस छिड़ती है, तो टीएन शेषन का वह दौर हर किसी को याद आता है जब एक कड़े प्रशासक ने इस संस्था को उसकी असली ताकत और पहचान दिलाई थी।
आंतरिक व्यवस्था और वोटर लिस्ट को लेकर बदलते दौर के सवाल
समय के साथ चुनाव आयोग के कामकाज और प्रक्रियाओं में कई तकनीकी बदलाव आए हैं। वर्तमान समय में वोटर लिस्ट तैयार करने से लेकर नए मतदाताओं के पंजीकरण तक की प्रक्रिया काफी हद तक डिजिटल और केंद्रीकृत हो चुकी है। हाल ही के वर्षों में आयोग के भीतर प्रशासनिक फैसलों और तकनीकी प्रणालियों को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चाएं और आपत्तियां भी दर्ज की गई हैं। हालांकि, इन तमाम तकनीकी और प्रशासनिक परिवर्तनों के बीच यह बात पूरी तरह स्थापित हो चुकी है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और पारदर्शिता ही देश के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
संविधान ने इस संस्था को जो अधिकार दिए हैं, उनका उद्देश्य निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करना है। चाहे वह टीएन शेषन का दौर रहा हो या आज का आधुनिक डिजिटल युग, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इस बात पर टिकी होती है कि वह सत्ता और प्रशासन के प्रभाव से कितनी दूर रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब इस संस्था ने अपनी स्वायत्तता के लिए कड़े कदम उठाए हैं, तब-तब देश की लोकतांत्रिक जड़ें और अधिक मजबूत हुई हैं।



