वोटिंग के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
देशभर की मतदाता सूचियों में संशोधन और विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) की चल रही प्रक्रिया के बीच न्यायपालिका की तरफ से बेहद अहम बयान सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान दो टूक कहा कि ऐसा कोई भी प्रशासनिक कदम या प्रक्रिया स्वीकार नहीं की जा सकती, जिसका परिणाम लाखों भारतीय नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करना हो। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेताया कि इस तरह के तौर-तरीके संविधान की मूल भावना पर सीधा प्रहार करते हैं।
यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के कई राज्यों में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच तीखी बहस छिड़ी हुई है। हैदराबाद की प्रतिष्ठित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित एक विशेष समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा पर विशेष जोर दिया। उनका यह संबोधन इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे चुनावी पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों की बहस को एक नया कानूनी आयाम मिला है.
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संविधान दो तरह के नागरिकों की अनुमति नहीं देता
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज ने भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि देश का संविधान किसी भी सूरत में दो अलग-अलग श्रेणियों के नागरिकों का प्रावधान नहीं करता है। एक तरफ वे नागरिक जिनके पास मताधिकार सुरक्षित है और दूसरी तरफ वे लोग जिन्हें किसी प्रक्रियागत खामी या मनमानी के चलते इस अधिकार से बेदखल कर दिया जाए। ऐसा विभाजन देश के मूल लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर करता है।
"अगर किसी प्रोसेस का नतीजा लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों को उनके वोट देने के अधिकार से वंचित करना है यानी उन्हें अपने ही देश में सेकंड क्लास नागरिक बनाना है, तो ऐसा प्रोसेस असल में मनमाना है। कोई भी बात इसे सही नहीं ठहरा सकती। ऐसा प्रोसेस संविधान की आत्मा पर हमला करता है।" — जस्टिस उज्जल भुइयां, न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट
उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण जनता का एक बड़ा हिस्सा मतदान से दूर हो जाता है, तो वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 14 का खुला उल्लंघन है। समानता के अधिकार और वयस्क मताधिकार के सिद्धांतों से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता है।
आजादी के संघर्ष और बलिदान से जुड़ा है मताधिकार
न्यायाधीश ने याद दिलाया कि भारत के आम नागरिकों को जो वोट देने का अधिकार मिला है, वह कोई खैरात नहीं है बल्कि इसके पीछे विदेशी शासन के खिलाफ सदियों का लंबा संघर्ष और अनगिनत बलिदान शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह अधिकार हमारी स्वतंत्रता की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। संविधान के अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ या मनमानी को देश की कोई भी वैधानिक संस्था या अदालत बर्दाश्त नहीं कर सकती है।
उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कानून की नजर में कोई भी अथॉरिटी या संस्थान संविधान से ऊपर नहीं है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह अनिवार्य है कि हर एक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहे और उसे अपने मताधिकार का प्रयोग करने से न रोका जाए।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल
हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल, बिहार समेत देश के कई अन्य हिस्सों में एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) अभियान को लेकर बड़ा राजनीतिक घमासान देखने को मिला है। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि इस प्रक्रिया के नाम पर गरीबों, प्रवासियों, मजदूरों और हाशिए के लोगों के नाम चुपचाप मतदाता सूचियों से हटाए जा रहे हैं। विपक्षी दलों का दावा है कि दस्तावेज जुटाने की जटिल शर्तों के चलते वास्तविक मतदाताओं को भी परेशान किया जा रहा है।
इस पूरे विवाद के बीच जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी बेहद प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने कानूनी प्रक्रिया का जिक्र करते हुए साफ किया कि किसी मृत व्यक्ति के मामले को छोड़कर, एक बार मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम आ जाने के बाद उसे बिना उचित नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए बाहर नहीं किया जा सकता। मनमाने ढंग से नाम काटा जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की रीढ़
विशेष विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि न्यायपालिका की ओर से समय-समय पर इस तरह की टिप्पणियां चुनावी प्रणाली में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक हैं। चुनाव आयोग का जहां यह तर्क रहा है कि सूची को त्रुटिहीन बनाने के लिए मृत, स्थानांतरित और फर्जी मतदाताओं के नाम हटाना जरूरी है, वहीं यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस प्रक्रिया में कोई भी असली मतदाता अपने बुनियादी अधिकार से वंचित न हो।
अंततः, लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देश का हर एक योग्य नागरिक बिना किसी डर, बाधा या मनमाने नियमों के अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव कर सके। सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्ट संदेश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारतीय संविधान के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकार सर्वोच्च हैं और उनके संरक्षण के लिए न्यायपालिका पूरी तरह सतर्क है।








